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वायलिन- दिलरुबा की जुगलबंदी पर झूमे और ओडिसी पर थिरके मन

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21 Feb 26
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वायलिन- दिलरुबा की जुगलबंदी पर झूमे और ओडिसी पर थिरके मन

उदयपुर। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर की ओर से से शिल्पग्राम में चल रहे तीन दिवसीय ‘ऋतु वसंत’ उत्सव के दूसरे प्रसिद्ध वायलिन वादक गुलजार हुसैन और दिलरुबा वादक ने कर्नाटक संगीत पद्धति के राग हंस ध्वनि में जुगलबंदी कर शास्त्रीय संगीत के रसिकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। वहीं, कविता द्विवेदी एंड ग्रुप ने आेडिसी नृत्य में शिव-सती अौर कामदेव के प्रसंगों को मुक्ताकाशी मंच पर जीवंत कर माहौल में क्लासिकल के साथ-साथ आध्यात्मिकता के रंग भी घोल दिए, जो दर्शकों के दिल को छू गए।
देश-विदेश में अपने संगीत से छा चुके जयपुर के वायलिन वादक गुलजार हुसैन और प्रदेश के ख्यातनाम दिलरुबा वादक मोहम्मद उमर ने वायलिन-दिलरुबा की दिमाग से दिल तक उतरी जुगलबंदी पेश कर शिल्पग्राम में शनिवार शाम संगीतमयी बना दिया। इस कर्णप्रिय जुगलबंदी में इन मशहूर मूसीकारों (संगीतकार) ने कर्नाटक संगीत का सुमधुर राग हंस ध्वनी के विभिन्न अंगों को पेशकर श्रोताओं के दिलों को छू लिया
इन्होंने अालाप के बाद राग हंस ध्वनी की पहली बंदिश मध्यलय झपताल 10 मात्रा में प्रस्तुत की तो शास्त्रीय संगीत के रसिक वाह-वाह कर उठे। फिर जब इस राग की बहुत प्रसिद्ध बंदिश ‘लागी लगन सखी पति संग...’ मध्यलय तीन ताल में पेश की। इस बंदिश के दौरान शिल्पग्राम सुधी श्रोताओं की करतल ध्वनि से कई बार गूंज उठा। पेशकश के अंतमें जब इन्होंने दिलरुबा, वायलिन ओर तबले की द्रुतलय में जुगलबंदी की तो इसमें कई जगह मुक्ताकाशी मंच तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इनके साथ तबले पर मेराज हुसैन और ज़यान हुसैन ने संगत करते हुए प्रस्तुति के दौरान कई जगह पर वाहवाही लूटी।


ओडिसी नृत्य में प्रेम और आध्यात्मिकता हुई जीवंत-

इसके साथ ही मशहूर कथक नृत्यांगना कविता द्विवेदी के निर्देशन में ओडिसी नृत्य की तीन भावपूर्ण कड़ियां प्रस्तुत की गईं, जिनमें भक्ति और प्रेम के शिव व कामदेव से जुड़े प्रसंगों को मंच पर साकार कर दिया। इस पेशकश में शास्त्रीय नृत्य, संगीत और भारतीय पौराणिक परंपरा का सुंदर समन्वय साक्षात हुआ। नृत्य का आगाज “ॐ नमः शिवाय” से हुआ, इस पंचाक्षरी मंंत्र के  पंचाक्षरों यथा न, म, शि, वा और य को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्वों से जोड़ते हुए गहन दार्शनिक अर्थ में प्रस्तुत किया तो दर्शक दाद दिए बगैर नहीं रह सके।
दूसरी प्रस्तुति “अनंग रंग” वसंत और प्रेम के देवता कामदेव की कथा पर आधारित रही। शिव के क्रोध से कामदेव के भस्म होने और पुनर्जन्म के माध्यम से प्रेम के पुनर्सृजन की कथा ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। वहीं, अंतिम प्रस्तुति “जय मां यमुना” रही, जिसमें यमुना नदी के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया। श्रीमद् शंकराचार्य के यमुनाष्टकम से प्रेरित इस प्रस्तुति में भगवान कृष्ण से जुड़ी लीलाओं- वस्त्रहरण और कालिया दमन — को प्रतीकात्मक शैली में दर्शाया गया। प्रस्तुति ने प्रेम, करुणा और आध्यात्मिक शांति का संदेश दिया। इसकी अवधारणा एवं नृत्य निर्देशन गुरु श्रीमती कविता द्विवेदी का रहा, संगीत रचना एवं गायन श्री सुरेश कुमार सेठी तथा लय रचना श्री रामचंद्र बेहरा द्वारा की गई। इस नृत्य शृंखला की अवधारणा एवं निर्देशन कविता द्विवेदी व सहायक पुष्पांजलि मोहंती का रहा। वहीं, संगीत संयोजन सुरेश सेठी, विजय तांबे और जी. रामप्रसाद ने किया।
इसमें कविता द्विवेदी के साथ अर्पिता देबाश्री, आकांक्षा मोहराना, जान्हवी गांधी, नेहा भारद्वाज, राशि गुप्ता, श्वेतलीना मोहंती, तीस्ता गांगुली, निखिल बोरा, पुष्पांजलि मोहंती ने दर्शकों का दिल जीत लिया।

कार्यक्रम में प्रसिद्ध कोरियोग्राफर संतोष नायर, एनएसडी के पूर्व निदेशक प्रो. सुरेश शर्मा एवं कलाविद प्रेम भंडारी सहित कला क्षेत्र के कई स्थापित हस्ताक्षर मौजूद रहे।

रविवार के आकर्षण-

पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के निदेशक फुरकान खान ने बताया कि उत्सव के तीसरे और अंतिम  दिन रविवार को प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक जयतीर्थ मेवुंडी का गायन होगा। अंत में प्रसिद्ध कोरियोग्राफर दिल्ली के संतोष नायर के निर्देशन में ऊर्जा से ओतप्रोत ‘नृत्य प्रवाह’ पेश किया जाएगा। इस प्रस्तुति में विभिन्न शास्त्रीय नृत्यों का अनूठा संगम दिखेगा। 
 


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