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रंगों में सजी विश्व विरासतःउदयपुर में अंतरराष्ट्रीय आर्ट फेस्टिवल का भव्य आगाज

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18 May 26
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रंगों में सजी विश्व विरासतःउदयपुर में अंतरराष्ट्रीय आर्ट फेस्टिवल का भव्य आगाज

उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर में कला, संस्कृति और विश्व विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब भारतीय लोक कला मंडल में आर्ट पिवोट संस्था द्वारा आयोजित चार दिवसीय “वल्र्ड हेरिटेज इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल-2026” का भव्य शुभारंभ हुआ। दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुए इस समारोह में भारतीय लोक कला मंडल के निदेशक डॉ. लईक हुसैन, आयोजक राजेश यादव, टॉमी बार, डॉ. गोपाल प्रसाद तथा विभिन्न देशों से आए कलाकारों ने सहभागिता निभाई।
फेस्टिवल ने पहले ही दिन कला प्रेमियों को अपनी विविध रंगों और रचनात्मक अभिव्यक्तियों से मंत्रमुग्ध कर दिया। भारत, जापान, उत्तरी आयरलैंड, बांग्लादेश सहित कई देशों के कलाकार अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत को चित्रों और कलाकृतियों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रदर्शनी में बनारस शैली की मिनिएचर पेंटिंग विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, जिसकी सूक्ष्मता और पारंपरिक सौंदर्य ने दर्शकों का मन मोह लिया।
फेस्टिवल की खास बात यह रही कि कलाकारों ने वेस्ट मटेरियल को रचनात्मकता से जोड़कर उसे कला का नया स्वरूप दिया। बेकार वस्तुओं से तैयार कलाकृतियां पर्यावरण संरक्षण और सृजनात्मक सोच का अनूठा संदेश दे रही हैं।
आर्ट पिवोट संस्था के संस्थापक राजेश यादव ने बताया कि वर्ष 2009 में स्थापित संस्था अब तक विश्व के 65 देशों के साथ कला और संस्कृति के आदान-प्रदान हेतु अनेक अंतरराष्ट्रीय फेस्टिवल आयोजित कर चुकी है। यह फेस्टिवल का चैथा संस्करण है और वर्ष के अंत में भारतीय कलाकार इंडोनेशिया जाकर भारतीय कला परंपरा का प्रदर्शन करेंगे।
फेस्टिवल में चित्रकारों, मूर्तिकारों, फिल्ममेकर, फोटोग्राफरों और आर्टिजन्स को एक मंच पर लाकर वैश्विक संस्कृति को जोड़ने का प्रयास किया गया है। आने वाले समय में संस्था लुप्त होती भारतीय धरोहर, शिलालेखों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और प्राचीन उपयोगी वस्तुओं के संरक्षण पर भी कार्य करेगी।
इंडोनेशिया की रामायण आधारित कठपुतली कला, मंदिरों और देवी-देवताओं की कलात्मक प्रस्तुतियां भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। समारोह के दौरान अगले वर्ष जापान में आयोजित होने वाले फेस्टिवल के लिए जापान को भारतीय ध्वज भी सौंपा जाएगा। उदयपुर में सजे इस अंतरराष्ट्रीय कला महोत्सव ने यह साबित कर दिया कि कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि विश्व संस्कृतियों को जोड़ने वाला एक जीवंत सेतु है।


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