" आज चिंता का विषय यही है कि जीवन में मानवीय मूल्यों की निरंतर कमी हो रही है। मानवीय संवेदना मर चुकी है, हमारे जीवन मूल्य खोखले हो रहे हैं। बच्चे परिवार के साथ में खिलखिलाना भूल गए हैं ,वृद्धजन के साथ परिवार में बतियाने को कोई नहीं है। ऐसे नाजुक दौर में उपजी स्थिति को हमारी कलम ही दूर कर सकती है ,ऐसा लिखा जाए जो हमारी आत्मा को झिझोंड़ दें। आज आपका लिखा कब मुखर हो कर सामने आ जाएगा कह नहीं सकते। नेगी ने एक उद्बोधन के दौरान अवगत कराया कि हिंदी की प्रख्यात लेखिका ऊषा प्रियंवदा जी ने सन साठ के आस पास वृद्धजन की पीड़ा को सामने रखकर वापसी शीर्षक से एक कहानी लिखी थी ,जो आज वृद्ध विमर्श की एक महत्वपूर्ण रचना के रूप में पहचान बना चुकी है। यह कलम की ही ताकत है। लेखक के शब्द कालजई बन जाते हैं। महिला रचनाकार परिवार में आई संवाद शून्यता, राष्ट्र एवं समाज को आईना दिखाने के लिए कलम उठाएं"" ये विचार पिछले दिनों कोटा में आयोजित संभागीय महिला रचनाकार सम्मेलन में जयपुर से आए वरिष्ठ साहित्यकार सूरज सिंह नेगी ने मुख्य अतिथि पद से संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुझे उनके विचारों ने प्रभावित किया। समारोह में ही समय निकाल कर उनके रचनाकर्म पर उनसे साक्षात्कार लिया जिसके अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
चर्चा उनके उद्बोधन की इस बात से शुरू हुई कि आपने परिवार में आ गई संवाद शून्यता को दूर करने में लेखन की तरफ इशारा किया है, क्या आपकी कृति में इस दृष्टि से लेखन किया है ? कहने लगे आपने मेरे लेखन के मर्म को पकड़ लिया है। पिछले दिनों ही मेरा नया उपन्यास "भावेश जो कह न सका ,..." आया है। यह परिवार में संवाद शून्यता , जन्म लेते ही माता-पिता के सपनों के भार से छिनता बचपन , बच्चे मन की बात नहीं कह पाते जैसे प्रश्नों की दशा,दिशा और संभावनाओं को उजागर करता है। इसका तानाबाना कुछ इस तरह से बुना गया है कि लगता है हर घर में भावेश है। आज परिवार व्यवस्था ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां माँ बाप बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोप रहे हैं, बच्चें एवं बुजुर्ग कुछ कह नहीं पा रहे हैं। कुछ बच्चें संवेदनशील मन के होते हैं जो दौड़ में चल नहीं पाते और भावुकता में ऐसा कदम उठा लेते हैं कि परिवार और समाज को नासूर बन कर दर्द दे जाते हैं। ज्यादा तो क्या कहूं बस इतना ही , उपन्यास माँ बाप और युवा किशोरों के लिए चिंतन का धरातल देता है और आँखें खोलता है, समस्या का हल भी सुझाता है, जिसे पढ़ कर ही महसूस किया जा सकता है।
लेखन की प्रेरणा कैसे मिली और कैसे लिखना शुरू किया पूछने पर वे अपने बचपन के दिनों में खो से गए और यादें ताज़ा कर कहने लगे साहब क्या दिन थे। माँ को धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हुए देखते थे तो मैं भी पढ़ने लगा। अल्मोड़ा जिले के गांव नैकाना में पढ़ने के लिए दो तीन किलोमीटर पैदल जाना होता था। वहां की पहाड़ियां, उतार चढ़ाव वाले रास्ते, झरने, पगडंडियां , पेड़ पौधे, पक्षी, जानवर आदि नैसर्गिक सौंदर्य ने प्रभावित किया और बड़ा सुकून भी मिलता था। धार्मिक किताबों को पढ़ने और प्राकृतिक सौंदर्य से नजदीकी से ही लिखने का शोक बचपन में ही हो गया। मन में उमड़ती भावनाएं और विचार शब्दों का रूप लेने लगे। यही कोई ग्यारह साल का था जब लिखना शुरू कर दिया था। बड़े हुए स्कूल में पहुंचे तो कहानी लिखने लगे। बड़ी कक्षा में गए तो सिलसिला नाटक लिखने तक पहुंच गया। स्कूल में नाटक खेलने भी लगे। कहने लगे ऐसे ही साहित्य की विधाओं से अनुराग उत्पन्न हो गया। लेखन को अपना शोक बना लिया जो आज तक प्रशासनिक और घरेलू व्यस्ताओं के बीच भी जारी हैं।
आपने सृजन में कुछ नवाचार भी किया होगा ? यह अच्छा प्रश्न किया आपने। मैं जब टोंक जिले के पीपलू उपखण्ड में एसडीएम था तो स्कूलों के निरीक्षण पर जाया करता था। मन में विचार आया कि शिक्षक बच्चों को पढ़ा कर अपने शिक्षण दायित्व का निर्वहन करते हैं। इसके इतर शिक्षक देश के एक जिम्मेदार नागरिक भी हैं। समाज और राष्ट्र के प्रति भी उनकी अपनी सोच भी होती है। क्यों न इस चिंतन को लेखन का आधार बनाया जाए। इस विचार के आते शिक्षकों से बच्चों के नाम पाती अर्थात चिट्ठी लिखवाने का नूतन प्रयोग किया। इसकी सफलता को देखते हुए कई प्रकार की पाती लिखवाई, लोग इनमें खूब रुचि लेने लगे, लोगों को उनकी भावना और विचार प्रस्तुत करने का एक मौका मिला। जैसे-जैसे नए विषय आते गए पत्र लेखन अभियान बन गया। बाकायदा एक व्हाट्सएप समूह पाती अपनों को बनाया गया। लुप्त होती पाती लेखन विधा को पुनर्जीवित करने में डॉ नेगी के साथ उनकी पत्नी डॉ मीना सिरोला भी कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। डॉ. मीना सिरोला बनस्थली विद्यापीठ के शिक्षा संकाय में प्रोफेसर के रूप में कार्य कर रही हैं। प्राप्त पत्रों में से चयनित पत्रों का संकलन कर पुस्तकों का प्रकाशन करवाया जिससे समाज को आईना दिखाने वाले विचारों से पाठक भी रूबरू और प्रेरित हो सकें।
आप आज राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं काम की बहुत व्यस्तताएं रहती हैं लेखन के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं ? कहने लगे अक्सर सुना होगा हमारे पास तो काम इतना है कि सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। इसके विपरीत मेरी सोच है अगर कुछ करने की इच्छाशक्ति हो तो आदमी हजारों व्यस्तताओं में भी समय निकाल सकता है। प्रशासनिक व्यस्तताओं में कई काम ऐसे होते हैं जिनके बीच के समय का पूरा उपयोग अपने लेखन के लिए कर सकते हैं। व्यवस्था और कार्य प्रबंधन के साथ समय प्रबंधन भी हो तो समय की कोई कमी नहीं है।
डॉ. नेगी मुख्य रूप से गद्य में कहानी, नाटक, उपन्यास ,संस्मरण ,आलेख और पत्र लेखन आधारित सृजन करते हैं । आपने कई पुस्तकें लिखी और कई पुस्तकों का संपादन किया है । आपकी पुस्तकों का अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। आपके साहित्य की समाज के लिए उपयोगिता इसी से आंकी जा सकती है कि इनके साहित्य पर दो शोधार्थियों ने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की हैं ,पांच विद्यार्थी लघु शोध कर चुके हैं एवं वर्तमान में 10 शोधार्थी शोध कर रहे हैं। देश के विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में और साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित होती हैं और आकाशवाणी से प्रसारित। जयपुर दूरदर्शन से भी समय समय पर कार्यक्रम, साक्षात्कार प्रसारित होते रहे हैं।आपने डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं की हैं और दो दर्जन से अधिक साक्षात्कार लिखे हैं। देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक कहानी,आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।
साहित्य सृजन :
***********
आपके साहित्य सृजन पर दृष्टिपात करें तो
स्वलिखित पुस्तकों में पापा फिर कब आओगे (कहानी संग्रह) 2016, रिश्तों की आँच ( उपन्यास )2016, वसीयत (उपन्यास) 2018, नियति चक्र (उपन्यास) 2019 , ये कैसा रिश्ता (उपन्यास) 2020, सांध्य पथिक, (उपन्यास)2022 एवं मेरी ईजा (संस्मरण) 2023 और भावेश जो कह न सका,(उपन्यास) 2025 में प्रकाशित हुई हैं।
पत्र विधा पर आधारित 15 संपादित पुस्तकें माँ की पाती बेटी के नाम 2019, पत्र पिता के 2020 , बच्चों के पत्र 2020 , एक पाती मीत को 2021, प्रकृति की पुकार 2021, शिक्षक को पत्र 2021, बापू की चिट्ठी (मेरी जुबानी ) 2020,माटी की पुकार 2022, पाती स्मृतियों के झरोखों से ,पाती डाकिए को 2023, लिख दी पाती बाबुल को 2023, गौरैया की पुकार 2024, लिख दूँ पाती यादों के गलियारे से 2024, बच्चों की पाती मतदाताओं के नाम 2024, मैं बाबुल की परछाई (बेटियों के पत्र) 2024 प्रकाशित हुई हैं। कहानी विधा पर आधारित पुस्तक सांझ के दीप 2020 में तथा अन्य संपादित पुस्तकें जीवन एक संघर्ष, 2022 एवं भविष्य की उड़ान, 2023 में प्रकाशित हुई हैं। आपकी पुस्तक रिश्तों की आंच उपन्यास का उर्दू में ,नियति चक्र उपन्यास का बगत रो फेर शीर्षक से राजस्थानी में तथा ये कैसा रिश्ता’ (उपन्यास) का ‘या केवो संबंध’ शीर्षक से गुजराती भाषा में एवं इसी उपन्यास का मराठी भाषा में भी अनुवाद किया गया है। आपकी रचनाओं को केंद्र में रखकर गुजरात और हरियाणा के लेखकों ने दो पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। आपकी 5 अप्रकाशित मास्टर जी (नाटक), चन्द्र शेखर आजाद(नाटक), शहीद भगतसिंह (नाटक), दुर्योधन की प्रतिज्ञा (नाटक) एवं नील कुमारी (बाल उपन्यास) पुस्तकें भी हैं।
सम्मान :
*******
साहित्यिक सेवाओं और उत्कृष्ट लेखन के लिए आपको विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित भी किया गया है। फाकिर एजाजी अवार्ड ,
डॉ. दुर्गालाल सोमानी पुरस्कार, मनुस्मृति सम्मान, मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य सम्राट पुरस्कार, उपेन्द्र नाथ अश्क पुरस्कार, चन्द्रपाल शर्मा ‘रसिक हाथरसी’ स्मृति पुरस्कार, ‘हिन्दी भाषा विभूषण सम्मान, उपन्यास वसीयत पर गेापाल राम गहमरी पुस्तक सम्मान, सावित्री बाई फुले सामाजिक समरसता पुरस्कार, जयपुर साहित्य संगीति विशेष साहित्य सम्मान,साहित्य श्री सम्मान, उपन्यास ‘ये कैसा रिश्ता’ पर आचार्य विद्यानुग स्मृति सम्मान, मां. धनपति देवी स्मृति - कथा साहित्य सम्मान, जनक दुलारी मिश्रा साहित्य भूषण सम्मान,
सलीला विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया गया। उत्कृष्ट राजकीय सेवा निर्वहन के लिए आपको वर्ष 2023 में महामहिम राज्यपाल महोदय राजस्थान द्वारा राज्य स्तर पर सम्मानित करने के साथ - साथ
गणतंत्र दिवस पर दो बार जिला स्तरीय सम्मान एवं उपखण्ड स्तरीय सम्मान से सम्मानित किया गया।
परिचय :
********
सामाजिक कुरीतियों , विद्रूपताओं और समस्याओं के प्रति सामाजिक जागृति उत्पन्न करने वाले दूरदृष्टा साहित्यकार डॉ. सूरज सिंह नेगी का जन्म 17 दिसंबर 1967 को उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के नैकाना ग्राम में पिता स्व. इन्द्र सिंह नेगी एवं माता स्व. लक्ष्मी देवी के परिवार में हुआ। आपने प्रथम श्रेणी में
एम.कॉम.एवं एम.फिल. कर ‘ए क्रिटिकल अप्रेजल ऑफ इण्डस्ट्रियल डवलपमेन्ट ऑफ राजस्थान‘ विषय पर वर्ष 1994 में राजस्थान
विष्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। आपका विवाह डॉ. मीना सिरोला से हुआ ये इनके लेखन में भी पूर्ण सहयोग करती हैं और पाती अपनों को मुहिम की सह संयोजिका भी हैं। इनकी रचनाओं की न केवल प्रथम पाठिका हैं,अपितु इन्हें रचनाकर्म के दौरान सुझाव भी देती हैं। पत्र आधारित पंद्रह प्रकाशित पुस्तकों के संपादन में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। आपके दो पुत्र तन्मय और शिवांग अध्ययनरत हैं। आप वर्तमान में जयपुर में सहकारिता एवं नागरिक उड्डयन विभाग स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री के विशिष्ठ सहायक के रूप में सेवा रत हैं और लेखन कर्म में सतत् क्रियाशील हैं।
Headlines
ईजा (मां) और प्रकृति से प्रेरित एक प्रशासक का साहित्यिक सफर...........
डॉ. सूरज सिंह नेगी
Related stories
KOTA MILITARY STATION ORGANISES KOTA GANDIV MARATHON 1.0 AS PART OF GANDIV GOLDEN JUBILEE CELEBRATIONS
Jaipur: As part of the Gandiv Golden Jubilee Celebrations, Kota Military Station organised the Kota Gandiv Ma…
Diver Victory Presentation’ Brings History Alive at Vidya Bhawan Polytechnic’s Meljol Mela
Udaipur: The life and reign of Maharana Pratap offer an inspiring example of good governance, financial manag…
Maternal and Child Health, Nutrition Top Government Priorities: Kharadi
Udaipur: The three-day Angan Seva Milan programme, organised under the Viksit Bharat–Jan Seva Abhiyan, conclu…
EXERCISE TARANG SHAKTI 2026: POWER IN PARTNERSHIP
Following the inaugural ceremony held yesterday, the Indian Air Force (IAF) is set to commence the operationa…