उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में बुधवार को आयोजित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने नवपद आराधना के चौथे दिन उपाध्याय पद की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन की सच्ची सार्थकता केवल उम्र बढ़ने में नहीं, बल्कि अपने दोषों को घटाने और सद्गुणों को बढ़ाने में है।

आत्मा की शुद्धि, विनय और दूसरों के प्रति वात्सल्य का भाव ही धर्म आराधना का वास्तविक उद्देश्य है।साध्वीश्री ने कहा कि उपाध्याय जिनशासन के युवराज हैं।

साधु-साध्वी भगवंतों को धर्मज्ञान प्रदान करने और संघ को मार्गदर्शन देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उपाध्याय का सबसे प्रमुख गुण विनय है।

आचार्य अर्थ का बोध कराते हैं, जबकि उपाध्याय सूत्रों का अध्ययन कराते हैं। उपाध्याय पद की तीन प्रमुख विशेषताएं वात्सल्य, विनियोग और विवेक हैं।

वात्सल्य का भाव ऐसा होना चाहिए, जो दूसरों के गुणों को अपनाने और सभी के प्रति स्नेह रखने की प्रेरणा दे।उन्होंने कहा कि आंख में कांटा चुभने पर तुरंत पीड़ा होती है, लेकिन अपने भीतर के दोष और पाप हमें क्यों नहीं खटकते?

स्वाध्याय से व्यक्ति को अपने दोषों का बोध होता है, जबकि प्रतिक्रमण उन्हें दूर करने का मार्ग दिखाता है। इसलिए बाहरी स्वच्छता के साथ आत्मा की स्वच्छता पर भी ध्यान देना चाहिए।

धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी और साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भक्ति गीत प्रस्तुत किया।