समीक्षक: डॉ.प्रभात कुमार सिंघललेखक एवं पत्रकार कोटा "तो ऐसी है उन सबकी साठ-पार की ज़िन्दगियाँ खुशियों से भरीं जिसमें उन्हें अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने की पूरी आजादी है, अवकाश है और पूरे अवसर, न नौकरी का बंधन न कमाने की चिन्ता और न ही परिवार की जिम्मेदारी।

वे खुले दिल से, खुले विचारों से, जीवन को सार्थकता से जीने के लिए आगे बढ़ते रहते हैं चरैवेति-चरैवेति। उनको देखकर लगता ही नहीं कि बुढ़ापा बोझ है।

वे जिन्दादिली से, युवा-मन से जीते हैं, खिलखिलाते हैं और ज़िन्दगी के हर पल का भरपूर आनंद लेते हैं।" पृष्ठ 128 सशक्त कहानीकार डॉ.ऊषा गोयल की कहानी " साठ के पार, खुशियाँ अपार " का यह आशय कहानी का मुख्य सूत्र है।

स्वयं साठ के पार होने से "जीवन - रस की रोचक कहानियाँ" पुस्तक की इस 13 वीं कहानी को सबसे पहले पढ़ा, कि आखिर इसमें क्या है ?

कहानी का तानाबाना डॉ. विमल की निर्धन मरीजों की निशुल्क सेवा - उपचार ,उनके परिवारों की मदद, विदेश में रह रहे बेटों को साठ की पार उम्र के पड़ाव में स्वदेश बुलाने के लिए पत्नी सुरेखा के तार्किक वार्तालाप, उम्र के पड़ाव और स्वास्थ्य कारणों से सीनियर सिटीजन की टाउनशिप में फ्लैट लेकर रहने और सभी के साथ मिल कर खूब एंजॉय करने के इर्दगिर्द घूमती है।

कहानी निर्धन मरीजों के प्रति दया, करुणा, मानवीय और सकारात्मक भावनाएं रखने, बच्चों को उनकी स्वतंत्रता प्रदान करने , उन पर बोझ न बन कर खुशी से अपना जीवन जीने और जीवन का हर परिस्थिति में आनंद लेने का संदेश देने में सफल रही है।

इस कृति की चौदह कहानियाँ ऐसे ही संदेशों और दृष्टिकोण को दर्शाती हैं कि "जीवन को पल - पल जीयें, खुशी से जीयें, अच्छा करें" यही लेखिका का उद्देश्य भी है।

लेखिका प्रख्यात लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंध " शिरीष के फूल " से गहराई से प्रभावित हैं और इसी विषय पर प्रथम कहानी है "फिर खिले शिरीष के फूल" है ।

शिरीष का फूल विषम परिस्थितियों में फूलों से लदा रहता है। इसे प्रतीक मान कर इन्होंने जीवन की मस्ती भरी लालसा के विविध पहलुओं को जोड़ कर मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया है।

“ स्वाति सोच रही थी आकाश, मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारी बेटी हमसे छिनती जा रही है, दूर होती जा रही है। हमारा प्यार का संसार लुट रहा है। बाहर की दुनिया चाहे दिखने में कितनी ही हरी-भरी लगती हो लेकिन मन में सूनेपन की कसक हमेशा सालती रहती है, मैं तो टेक्नोलोजी की इस मशीनी दुनिया में, इस कार्पोरेट लाइफ से भी थक चुकी हूँ।"

"हाँ, स्वाति ! मैं भी कुछ दिनों से यह महसूस कर रहा हूँ कि इतना पाकर भी हम बहुत कुछ खो रहे हैं, मन का सुकून और खुशी गायब होती जा रही हैं।

'अर्ली सक्सेज' का सपना 'इमोशनल डेडलाइन' बन रहा है। इस मशीनी दुनिया में बिजी रहते हुए हम फुर्सत से हँसना और प्यार से बोलना ही भूलते जा रहे हैं।

शारीरिक-मानसिक थकान, नींद की कमी और तनाव से परेशानी बढ़ रही है। अब आगे और अधिक कीमत हम अपने एचीवमेन्ट्स की नहीं चुका सकते।

असली पूँजी तो हमारी प्यारी बेटी है, वही छिन जाए तो बचा ही क्या है? प्यार ही तो जीवन का मूल रस है, उसके बिना जीवन का क्या मूल्य है?

लेकिन स्वाति ! कॅरियर - प्रोफेशन भी जरूरी है, जीने के लिए।

अभी घर-गृहस्थी की हमारी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं हुई हैं। हम क्या कर सकते हैं?" पृष्ठ 29 इस कहानी का कथानक स्वाति,आकाश और उनकी बेटी पिंकी के परिवार के कश्मकश के आसपास घूमता है ।

पति - पत्नी दोनों अपने काम और करियर बनाने की होड में पिंकी को पहले तो पूरे दिन मेड के भरोसे छोड़ते हैं जो उसका पूरा ध्यान नहीं रखती है। चार वर्ष की बच्ची को एक हॉस्टल के हवाले कर दिया जाता है।

अपने काम और कैरियर बनाने तथा अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा समय बीतने के साथ - साथ उन्हें अपनी बेटी से दूर कर देता है। बेटी भी हॉस्टल संचालक गुप्ता जी और उनकी पत्नी को ही अपनी नई मम्मी - पापा मान लेती हैं।

जब माता - पिता को अपनी गलती का एहसास होता है तो वे अपने काम को सीमित कर पिंकी को घर ले आते हैं। यही है वह शिरीष का फूल जो उनकी बगिया में फिर से खिलने - महक ने लगता है।

बच्चें फूल जैसे कोमल होते हैं , अपने जीवन के कैरियर और ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की कीमत पर इन फूलों को मुरझाने नहीं दें , केरियर बनाना और धन कमाना ही सब कुछ नहीं है वरन पारिवारिक जिम्मेदारी और प्रेम जैसे मानवीय मूल्यों की ज्यादा जरूरत है।

यही इस कहानी का मुख्य मर्म और समाज को संदेश है।

"जीवन रस से भरा आंगन " कहानी धन का अहंकार और अनावश्यक दिखावा नहीं करने, परिस्थिति कैसी भी हो अपने पारिवारिक आदर्शो और संस्कारों को न भूलने, पारिवारिक एकता और समरसता को बनाए रखने, बच्चों को संस्कारवान बनाने का संदेश प्रदान कहानी है।

परिवार के मुखिया रामनाथ जी का व्यक्तित्व प्रत्येक परिवार के लिए प्रेरक और अनुकरणीय है जो आधुनिकता से समन्वय कर अपनी सूझबूझ और संस्कार से परिवार को एक सूत्र में बांधे रखते हैं और उनके आंगन में हमेशा जीवन रस की मधुरिमा बनी रहती है।

जीवन में अच्छे संस्कारों के महत्व के लिए प्रेरित करती कहानी पाठकों को पसंद आएगी।

" प्रेम के सफर में ये कैसा मोड" एक ऐसी विवाहित महिला शिवी की कहानी है जो मौज - मस्ती के लिए अपने साथ काम करने वाले साथी के प्रेम जाल में पड़ कर पति का घर छोड़ कर चली जाती है।

प्रेमी मोहित अचानक पिता की सीरियस तबियत की बात कर गांव चला जाता है और शिवी अपनी फास्ट फ्रेंड सुरभि के घर आ जाती हैं। सुरभि प्रमाण सहित शिवी को बताती है कि मोहित बईमान, बदचलन और लफंगा आदमी है तो शिवी की आँखें खुलती हैं और पछताती है।

सुरभि दोनों में सुलह के लिए उसके पति आयुष को अपने घर बुला कर सच्चाई बताती है।

शिवी अपने को रोक नहीं पाती और फफक फफक कर रोते हुए आयुध के दोनों हाथ पकड़ कर कहती है , "आयुष ! मुझसे भारी अपराध हुआ है, मैं भटक गई थी, बहक गई थी, अपनी महत्वाकांक्षाओं में पागल हो गई थी।

तुम बहुत नेक दिल इन्सान हो, प्लीज मुझे माफ कर दो, मैं तुमसे बेहद प्यार करती हूँ तुम्हारे बिना नहीं रह सकती, तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी।

एक आँधी आई और उसमें मैं बह गई लेकिन अब तुम्हारे प्यार के मजबूत तने का सहारा लेकर, घनी छाँह में मैं इस रिश्ते की मर्यादा सदा रखूँगी, मेरा वादा पक्का.... मेरा विश्वास करो मुझे बचा लो नहीं तो मैं बिखर कर टूट जाऊँगी, खतम हो जाऊँगी, सुसाइड कर लूँगी, मर..." आयुष, ऐसी भूल फिर कभी नहीं होगी।

मैं तुमसे प्रॉमिस करती हूँ। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी।

प्लीज़, प्लीज हमारा यह रिश्ता बना रहे।" वह गिड़गिड़ाई। "आयुष कुछ पल मौन रहा सोचता सा, फिर बोला- "तो फिर आओ, अपने घर चलें।" इस तरह दोनों के बीच आँधी आई और उड़ गई, प्यार के रिश्ते की फसल लहराने लगी।

खुशियों की खुशबुओं से उस युगल की जीवन-वाटिका महकने लगी, साथ ही पूरा परिवार भी बासन्ती हवाओं से भर गया।" कहानी का संदेश है कि पर पुरुष के प्रेम जाल में न फंस कर अपने परिवार की बगिया को महकाएं।

संग्रह की अंतिम कहानी " पल - पल जीयें, खुशी से जीयें, अच्छा करें", " ये भगवान की मुझ पर कृपा ही तो है। मेरे बेटे-बहू, पोते-पोती कितने अच्छे हैं, सबसे कितना प्यार मिल रहा है मुझे।

मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ मेरा दिल-दिमाग दुरुस्त है, अपने हाथ से खाना खाता हूँ, लिख लेता हूँ आँखों से पढ़ लेता हूँ और हृदय से भगवान का स्मरण करता रहता हूँ और क्या चाहिए मुझे ?" कितनी सकारात्मक सोच है उनकी एवं रचनात्मक कामों में अद्भुत लगन और सक्रियता।

जीवन की धारा को जिधर मोड़ना चाहें हम मोड़ सकते हैं। जीवन में आनंद और सार्थकता से जी रहे हैं वे पल-पल।

वे गुनगुनाते रहते हैं......... हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िन्दगी।

छाँव है, कभी है धूप ज़िन्दगी, हर पल जीयो, जी भर जीयो खुशी से जीयो, अच्छा करो।

ऐसी ही भावनाप्रधान, आदर्श, मार्मिक कथानक लिए संग्रह की अन्य कहानियाँ चिलकती धूप में भी समरसता, उजड़ा उपवन, धर्म का प्रवाह मानवता में, कुहांसे से फैला उजियारा, हमदर्दी, इज्जत, उजली किरणों का महत्व, अनोखा बंधन, सबसे बड़ा उपहार किसी न किसी जीवन मूल्य का संदेश देती हैं और पठनीय हैं।

सभी कहानियाँ कसावट लिए हैं । कथानक आपके - हमारे और समाज के बीच का ही प्रतिबिंब हैं।

कहानी में पाठक को कहीं न कहीं आसपास का परिवेश दिखाई देता है। पात्रों के विचार और चिंतन मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण हैं जो पाठक को झकझोरते हैं और उसके दिल में गहराई तक सीधे उतर कर उसकी बंद आँखे खोलते हैं।

प्रस्तुतीकरण ज्यादातर वार्तालाप शैली में है। भाषा सहज, सरल, बोधगम्य और प्रवाह बनाए हुए है, कहीं कोई उलझन नहीं, सीधी और सपाट बोल चाल की बोली।

विशेषता यह भी है कि अंत तक कहानी में पाठक की जिज्ञासा बराबर बनी रहती हैं।

कहानियों में संस्मरणों, प्रसंगों, घटनाओं में कैसे अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए शिरीष के अवधूत की भाँति स्थिर रहकर, जीवन का रस खींचा जा सकता है और कैसे हम खिलते रहें शिरीष के फूल जैसे और सुगन्ध फैलाते हुए अपने जीवन को सार्थक बनायें, यही इन कहानियों के लेखन का मूल अभिप्राय है।

आमुख - आलेख " शिरीष का फूल हमसे बहुत कुछ कहता है " में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंध शिरीष का फूल के कई प्रसंगों की व्याख्या कर उसके परिपेक्ष्य में लेखिका लिखती है, " आज के विषम और जटिल वातावरण में मनुष्य को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

कई बार हम देखते-सुनते हैं कई दुर्घटनाओं को, तो हमारा मन बहुत दुखी हो जाता है।

मैं भी विचलित हो जाती हूँ जब अखबारों में, सोशल मीडिया में आए दिन दुखद खबरें जानने को मिलती हैं- कभी किसी की हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, हिंसक प्रतिशोध, दुखद तलाक, दरकते रिश्ते और टूटते मानवीय मूल्य आदि निराशा और अवसाद की घटनाएँ, तब मैं सोचती हूँ कि मनुष्य की जिजीविषा- जीने की इच्छा और शक्ति कैसे बनी रहे ?

मुझे याद आता है शिरीष का फूल। अपने आप याद नहीं आता, बल्कि एक जागरूक साहित्यकार याद दिलाते हैं अपने निबन्ध 'शिरीष के फूल' के द्वारा वे उपकारी मनीषी हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।

जागरूक लेखक यही तो करते हैं आपकी सोई हुई चेतना को जगाकर सही कर्म की ओर प्रवृत्त करने का काम। द्विवेद्वी जी ने अपने लेखन द्वारा कई प्रकार से ये काम किए और मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया उनके 'शिरीष के फूल' ने।

मुझे लगा कि आज की कठिनाइयों में शिरीष सही सलाह दे रहा है, सही समय पर सही तरीके से आस्था जगा रहा है, सही कर्मशीलता की ओर उत्प्रेरित कर रहा है।" पुनः लिखती हैं ," मुझे लगता है कि आज के तकनीकी युग में हम खुद एक तकनीक मशीन बनते जा रहे हैं।

सवाल यह है कि तकनीक हमारे लिए है या हम तकनीक के लिए ? तकनीक हमारी तरक्की के लिए है या हम तकनीक की तरक्की के लिए ?

यह साध्य और साधना का जो झमेला है उसमें घपला ही घपला हो रहा है। साधन साध्य और साध्य साधन बनता जा रहा है।

यहाँ भी यही बात लागू होती है-"अति सर्वत्र वर्जयेत्' ।

तकनीकी विकास द्वारा भौतिक समृद्धि के साथ यदि हम आन्तरिक रस भी बनाए रखते हैं, मानवीय भाव-संवेदनाएँ और मूल्य बचाए रखते हैं तो हम भी शिरीष की भाँति भयंकर लू के समय में भी कोमल तन्तु-जाल और सुकुमार केसर उगा सकते हैं और खिले-फूले रह सकते हैं।

शिरीष की विशेषताएँ सोच-सोचकर मुझे ऐसी ही अनुभूतियाँ मनुष्य के जीवन के लिए भी होती हैं कि वह अच्छे संस्कारों और गुणों से अपने जीवन को अधिक से अधिक निखार सकता है।

जो व्यक्ति ऐसा कर रहे हैं वे खुश-संतुष्ट रहते हैं और सभी को खुशियाँ देते रहते हैं और जीवन को सार्थक बनाते हैं।"

कहानियों के संदर्भ में फ्लैप का यह उद्धरण भी महत्वपूर्ण है, " जीवन कितना अजीब है। आसमान में रंग-बिरंगे सपने चमकते हुए सितारों के समान झिलमिलाते रहते हैं, उन्हें छूने के लिए ऊँची- ऊँची उड़ाने भरने का मन करता है।

हिम्मत से उड़ भी लो तो जमीन पर वापिस आना पड़ता है। लेकिन यहाँ पग-पग पर कितनी रुकावटें आती हैं।

यहाँ रहकर कुछ सपने साथ लेकर नहीं चल सकते क्या? माना, राह आसान नहीं है पर बिना चले भी क्या कभी किसी को अपनी मंजिल मिली है?

कोमल भावनाएँ होती हैं लेकिन आगे बढ़ने के लिए कठोरता की भी जरूरत होती है।"

अपनी बात में डॉ. ऊषा गोयल लिखती हैं, "पुस्तक को लिखने के पीछे मूल उद्देश्य है कि मेरा-आपका-सबका जीवन बाहरी आंतरिक रूप से खुशहाल बने।

यह कोई तथाकथित मोटिवेशनल या प्रेरक उपदेशपरक उद्देश्य को लेकर लिखी गई कृति नहीं है, लेकिन इसमें संस्मरणात्मक व अन्य कहानियों के माध्यम से विविध रंगों के बीच उजाले की कुछ किरणें फैलाने की कोशिशें मैंने जरूर की हैं।

इनमें 'पल-पल जीयें, खुशी से जीयें, अच्छा करें', भाव-सूत्र गुँथे हुए हैं।

इस पुस्तक की कोई बात यदि पाठक के मन को छू जाए, जिसे अपनाकर वह किसी भी प्रकार की खुशी का अनुभव कर पाए और दूसरों को खुशी देने के लिए आगे बढ़े तो मेरा लिखना सार्थक हो सकेगा।" संपर्क : 95825 24332 पुस्तक : जीवन - रस की रोचक कहानियाँ विधा : कहानी लेखिका : डॉ. ऊषा गोयल प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर मूल्य : 275 रुपए ISBN : 978-93- 5947- 943-3 लेखिका परिचय डॉ.उषा गोयल राजस्थान साहित्य अकादमी की सदस्य रही ।

इनका जन्म 20 मार्च 1948 को पिता विश्वेश्वर नाथ गुप्त ' मधुर ' एवं माता प्रेम देवी टाटीवाला के परिवार में जयपुर में हुआ। एमए . हिन्दी में कर , पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

चैतन्य महाप्रभु : संस्कृति और साहित्य नामक इनके शोध ग्रंथ का विमोचन तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ . शंकरदयाल शर्मा द्वारा उपराष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में किया गया ।

हिन्दी , राजस्थानी , अंग्रेजी , ब्रजभाषा का ज्ञान है और गद्य - पद्य विधाओं में कविता , निबन्ध , आलोचना , संस्मरण , कथा , यात्रा - वृत्तांत आदि लिखती हैं।

न्यूयॉर्क,अमेरिका में आयोजित आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में राजस्थान सरकार के प्रतिनिधि - मंडल के सदस्य के रूप में भाग लिया। पब्लिक रिलेशन्स सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित इन्डो थाई कॉन्फ्रेन्स बैंकाक, थाईलैण्ड में भाग लिया।

अनेक अज्ञात प्राचीन पांडुलिपियों की खोज की है। शताधिक रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

इनकी मौलिक 12 एवं संपादित 11 कृतियां प्रकाशित हुई हैं। आपको अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

वर्तमान में विगत 10 वर्षों से गुरुग्राम में निवास कर साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।

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