बांसवाड़ा। निवृत्ति सभी कर्मों से विरत होकर कर्म सन्यास का मार्ग है किन्तु प्रवृत्ति सभी कर्मों के फल से विरक्ति भाव रखने का मार्ग है। मतलब कार्य करो मगर तटस्थ भाव से बिना उसके फल या परिणाम से संलिप्त हुए। गीता इसी प्रवृत्ति मार्ग की सिफारिश करती है।

*कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन* भगवान् भागवत गीता के दूसरे अध्याय के ४७ श्लोक में कहा है कि कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं।

ऐसा करेंगे और ऐसा नहीं करेंगे, शास्त्र से विरुद्ध काम नहीं करेंगे‒इसमें तो स्वतन्त्रता है। पर दुःख दायी और सुख दायी परिस्थिति तो आयेगी ही। आप चाहो तो आयेगी न चाहो तो भी आयेगी।

यह कहना है श्री भक्ति आश्रम वैष्णव स्वामी महाराज का।

वो आज शनिवार प्रगति नगर स्थित जांगिड धर्मशाला में अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत भक्ति संघ (इस्कॉन बांसवाड़ा) के तत्वाधान में भागवतम् महोत्सव कार्यशाला में सायं आयोजित धार्मिक समारोह में बोल रहे थे।

*सनातनी त्रिवेणी भारतीयता, जीवन मूल्यों में सेवा भाव,सहयोग, निश्छल प्रेम* उन्होंने कहा कि विश्व भर में इस्कॉन जोकि कृष्ण भावनामृत भक्ति साधना युक्त होकर सनातनी त्रिवेणी भारतीयता, जीवन मूल्यों में सेवा भाव,सहयोग, निश्छल प्रेम को हर जगह प्रस्फुटित, प्रज्ज्वलित कर रहा हैं। यही कृष्ण प्रेम आम जन में विश्वास, विश्व में शान्ति भाईचारा स्थापित करेगा ।

प्रत्येक भारतीय को जीवन में गुणात्मकता की वृद्धि और सुख दुख में समभाव रखने की क्षमता उत्पन्न करने के लिए गीता को मनोयोग से पढ़ना चाहिए और साथ ही भारत में सनातन धर्म संस्कृति और जीवन मूल्यों की आधार रेखा गीता भागवत को स्कूली शिक्षा में गुणात्मकता ओर भारतीयता के उत्तरोत्तर विकास में अहम भूमिका योगदान हेतु पढ़ाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शास्त्रों में सार्थक जीवनयापन ओर पुरुषार्थ के दो मार्ग प्रवृत्ति और निवृत्ति के मार्ग बताए गए हैं । निवृत्ति सभी कर्मों से विरत होकर कर्म सन्यास का मार्ग है किन्तु प्रवृत्ति सभी कर्मों के फल से विरक्ति भाव रखने का मार्ग है।

मतलब कार्य करो मगर तटस्थ भाव से बिना उसके फल या परिणाम से संलिप्त हुए। गीता इसी प्रवृत्ति मार्ग की सिफारिश करती है।

प्रवृत्ति मार्ग बस कर्म करते रहने की अनिवार्यता पर बल देता है कर्मफल में अनुरक्तता और उसके परिणामों से सर्वथा असम्बद्ध रहते हुए बस कार्य को करते रहने का दर्शन ही है गीता भागवत का सार।

उन्होंने बताया कि राजा जनक प्रवृत्ति मार्ग के ही पुरोधा थे। प्रवृत्ति मार्ग की पुरजोर समर्थन करती गीता इसलिए ही गृहस्थों के लिए एक आदर्श रिकमेंडेड आध्यात्मिक पुस्तक है।

हालांकि आम ही नहीं बहुत से कथित खास लोगों के लिए भी गीता की ग्राह्यता थोड़ी मुश्किल है एक तो यह संस्कृत में है दूसरे कहीं कहीं भाव भी बहुत गूढ़ गहन है। जिसे सरलता से इस्कॉन समझाती हैं।

बहुत से लोग सोचते हैं कि रामायण गीता बुढ़ापे का ग्रन्थ है। जब सब कुछ काम धाम निपट जाये तो गीता की पोथी खोलकर पन्ने पलटते जाइए मोक्ष मिल जाएगा -अरे भाई तब तो आपको गीता का एक शब्द भी समझ नहीं आएगा -आपको तो युवावस्था से ही गीता प्रेमी बनना होगा।

अध्यात्म भाव और शब्दावली से परिचित होना होगा -तब जाकर धीरे धीरे भाव हृदयंगम होने लगेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ क्यों है?

गीता में जीवन जीने के अनेक गुर हैं। यह एक कालजयी ग्रन्थ है। यह आपको कर्तव्य पथ पर डटे रहने की सीख देती है।

*गीता में जीवन जीने के अनेक गुर हैं जिसमें आप कोई नियंता नहीं बल्कि निमित्त मात्र है* अनावश्यक कर्मकांडों को निरर्थक बताती है, विरोध करती है। अट्ठारह अध्यायों में बार बार यही समझाती है कि आप कोई नियंता नहीं बल्कि निमित्त मात्र है।

*बिना कर्मफल की चिन्ता किये स्वधर्म निर्देशित अनवरत कार्य निष्पादन करते रहना गीता का मुख्य विवेच्य है* आपका अधिकार बस कर्म करने तक ही सीमित है, फल आपके अधिकार से बाहर है।

यह सीख मनुष्य को परिणाम निरपेक्ष करके उसे मानसिक संकटों से मुक्त कर सकती है। बिना कर्मफल की चिन्ता किये स्वधर्म निर्देशित अनवरत कार्य निष्पादन करते रहना गीता का मुख्य विवेच्य है।

*स्वधर्म क्या है?* गीता के अठ्ठारहवें अध्याय में इसकी सुन्दर सुस्पष्ट व्याख्या है। आपका स्वभाव ही आपके कर्म स्वरुप का निर्धारण करता है।चार वर्ण स्वभाव गत कर्म के आधार पर ही, न कि जन्म के आधार पर विभाजित हैं। आप स्वभावतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र होते हैं। जन्म से नहीं।

*भारतीय को जीवन में गुणात्मकता की वृद्धि और सुख दुख में समभाव रखने की क्षमता उत्पन्न करने के लिये गीता को मनोयोग से पढ़ना जरूरी* आश्चर्य है विद्वान ब्राह्मण भी गीता के इस सुचिंतित भाव की अनावश्यक मीमांसा करने लग जाते हैं। अनावश्यक व्यासीय विवेचन करने लग जाते हैं। प्रत्येक भारतीय को जीवन में गुणात्मकता की वृद्धि और सुख दुख में समभाव रखने की क्षमता उत्पन्न करने के लिए गीता को मनोयोग से पढ़ना चाहिए।

इससे पहले श्री भक्ति आश्रम वैष्णव स्वामी महाराज की अगुवाई में कृष्ण भावनामृत भक्ति साधना युक्त होकर भजन कीर्तन सत्संग, नृत्य किया गया और तुलसी नृसिंह आरती अभिषेक पूजा विधान विभिन्न सुगंधित द्रव्यों पंच गव्य अबीर, गुलाल,इत्र, दूध दही, शहद सहित गंगाजल से साधक साधिकाओं श्रद्धालुओं ने किया ।

इस अवसर पर राधे कृष्ण भजनों ,गरबों पर श्रद्धालुओं ने देर तक झूमते हुए भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण को रिझाया।

साधिका श्रीमति रचना अरुण व्यास ने बताया कि भागवतम् महोत्सव कार्यशाला में आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव से मुक्त होकर आनन्द दाईं हर्षौल्लास से जीने हेतु भगवान् भागवतम के कर्म योग सिद्धान्त पर व्याख्यान में वैदिक मंत्रों को श्री भक्ति आश्रम वैष्णव स्वामी महाराज जी ने सरलतम जीवन मूल्यों के उदाहरण से समझाया ।

जिसमें भगवान् योगेश्वर श्रीकृष्ण भावनामृत भक्ति साधना युक्त होकर राजी खुशी से जीवन सूत्रों की व्याख्या वैदिक मंत्रों को सरलतम स्वरूप से व्याख्या की गई इससे पूर्व आचार्य अभय गौरांग दास एवम् अभिनंदन निमाई दास की अगुवाई में विभिन्न साधक साधिकाओं श्रद्धालुओं ने अतिथियों का स्वागत किया और इस्कॉन केन्द्र बांसवाड़ा की गतिविधियों का परिचय दिया।

आचार्य विश्व आत्मा दास, हितेंद्रीय साक्षी दास , श्री राधावल्लभ दास, एवम् कुशाग्र निमाई दास के सानिध्य में साधक, साधिकाओं ने बताया कि भगवान् योगेश्वर श्री कृष्ण, बलराम जी, राधा रानी , गौर निताई , श्रील प्रभुपाद जी के जीवन से सीख ले कर जीवन को तनाव रहित आनन्द दाईं बनाने हेतु विभिन्न गतिविधियों को वर्ष पर्यन्त विभिन्न योजनाओं को प्राथमिकता से अमलीजामा पहनाया जा रहा हैं जिसमें भक्त प्रहलाद गुरुकुल वैदिक शिक्षा हेतु पाठ्य शाला,नशामुक्ति, वृक्षारोपण अभियान, सत्संग संकीर्तन भजन के मासिक आठों कार्यक्रम, नाम जप विधान, तुलसी अभिषेक पूजा आरती भोग लगाने की सनातनी प्रवृति का व्यापक प्रचार कर रहे हैं।

*आध्यात्मिक चेतना के साथ दिन की शुरुआत करने पर जोर* इस अवसर पर आध्यात्मिक चेतना के साथ दिन की शुरुआत करने हेतु भागवतम महोत्सव कार्यशाला में शाम 5 बजे से हरिनाम संकीर्तन, भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक, तुलसी आरती, जप सत्र, दर्शन आरती, गुरु पूजा और गीता भागवत भागवतम क्लास, वैदिक सूत्रों का सरलतम जीवन परिचय, दीक्षा कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

इस अवसर पर कार्यशाला में कृपाली भट्ट, पुनित कुशल, डिम्पल,सुनील, अरुण व्यास, सुरेश, नैमिष, अक्षी, जगन्नाथ शर्मा,शाबुनी मंडल,दीपिका, विभा, अर्चना अनिता, भारती, चैतन्य, खुशी त्रिवेदी, चरण वंदना दासी, श्रीमति रचना व्यास, मानस, पंड्या, कुशाग्र,ओड्रिला, शिल्पा, शुभम,वारिश, वंशी, रतन देवी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कार्यशाला के विभिन्न सत्रों में भाग लिया।

संचालन अभिनन्दन निमाई दास ने किया ओर आभार प्रदर्शन पुनीत प्रभु ने ज्ञापित किया।