उदयपुर। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव में श्रद्धालु श्रीकृष्ण भक्ति के दिव्य रस में सराबोर हो गए। कथा पंडाल में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, उनके अवतार के उद्देश्य तथा धर्म स्थापना के संदेशों का ऐसा भावपूर्ण वर्णन हुआ कि पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। कथा के दौरान आयोजित मटकी फोड़ महोत्सव एवं नौकाविहार में विराजित लला के दिव्य दर्शन की झांकी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही।
कथावाचक ने भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का वर्णन करते हुए कहा कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान स्वयं अवतार लेकर भक्तों की रक्षा करते हैं। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं के दर्शन करने स्वयं भगवान शंकर भी गोकुल पधारे थे। कथा में पूतना उद्धार, बकासुर वध, तृणावर्त एवं शकटासुर के संहार की लीलाओं का मार्मिक वर्णन किया गया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
कथावाचक ने कहा कि अभिमान मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण है। जिस व्यक्ति के जीवन में अहंकार प्रवेश कर जाता है, उसका विवेक नष्ट होने लगता है। मन अत्यंत चंचल है, लेकिन जो साधक अपने मन पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, उसके भीतर विवेक, वैराग्य और भक्ति का प्रकाश स्वतः प्रकट हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस नश्वर संसार में भगवान के अतिरिक्त कोई भी वास्तविक तारणहार नहीं है। प्रभु की शरण, नाम-स्मरण और सत्संग ही जीवन को सफल बनाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
समाज अध्यक्ष एडवोकेट हेमेन्द्र पण्डियार ने बताया कि कथा महोत्सव में समाज की समस्त छह बैठकों के अध्यक्षों एवं कार्यकारिणी सदस्यों द्वारा पूज्य गुरुदेव का भावपूर्ण स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। महामंत्री कन्हैयालाल नेणावा ने विभिन्न समाजों से पधारे पदाधिकारियों एवं अतिथियों का स्वागत किया।
कोषाध्यक्ष भरत पचलोडिया ने बताया कि समाजबंधु पुरुषोत्तम मास के इस पुण्य आयोजन में तन, मन और धन से सहयोग कर रहे हैं, जिससे धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को नई ऊर्जा मिल रही है। कथा संयोजक जगदीशचंद्र पण्डियार ने बताया कि मटकी फोड़ महोत्सव बड़े उत्साह, उमंग और भक्तिभाव के साथ संपन्न हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
पूरे आयोजन के दौरान जय श्रीकृष्ण के जयघोष, भजनों की मधुर स्वर लहरियों और कथा के आध्यात्मिक संदेशों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का श्रवण कर अपने जीवन को धन्य महसूस किया।