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तुलना करना हिंसा से कम नहीं

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11 Jun 26
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तुलना करना हिंसा से कम नहीं

हिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक चोट पहुँचाना नहीं है। हिंसा वह भी है जो किसी व्यक्ति के मन, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को आहत करे। दुर्भाग्य से हमारे समाज में एक ऐसी मानसिक हिंसा तेजी से बढ़ रही है। जिसे सामान्य व्यवहार मान लिया गया है। वह है-तुलना की हिंसा।
आज निजी कंपनियों, स्कूलों, कोचिंग व संस्थानों और यहाँ तक कि परिवारों में भी तुलना को प्रेरणा का माध्यम माना जाता है। लेकिन यह प्रेरणा कम और मानसिक दबाव अधिक पैदा करती है। किसी कर्मचारी से कहना कि "देखो, तुम्हारा सहकर्मी कितना अच्छा प्रदर्शन कर रहा है", किसी विद्यार्थी से कहना कि "तुम्हारे मित्र ने तुमसे अधिक अंक प्राप्त किए हैं" या किसी बच्चे को उसके भाई-बहन से कमतर बताना केवल एक टिप्पणी नहीं है। यह व्यक्ति के आत्मसम्मान पर किया गया ऐसा प्रहार है जिसके घाव अक्सर दिखाई नहीं देते।
वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है। विद्यार्थियों में तनाव, चिंता और अवसाद बढ़ रहे हैं। कॉर्पोरेट जगत में मानसिक थकान और कार्यस्थल का दबाव नई चुनौतियाँ बनकर उभरे हैं। इन समस्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन निरंतर तुलना का दबाव उनमें एक महत्वपूर्ण कारण है।
कोचिंग संस्थानों में रैंक और परिणामों की होड़ ने लाखों विद्यार्थियों को ऐसी प्रतिस्पर्धा में खड़ा कर दिया है जहाँ उनकी पहचान केवल अंकों से तय होने लगी है। निजी स्कूलों में भी अक्सर बच्चों का मूल्यांकन उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा और रुचियों के बजाय दूसरों से तुलना करके किया जाता है। वहीं कॉर्पोरेट क्षेत्र में कर्मचारियों को लगातार एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर प्रदर्शन मापा जाता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति स्वयं को एक इंसान नहीं बल्कि एक आंकड़ा समझने लगता है।
यह प्रश्न लाजमी है कि क्या किसी व्यक्ति की गरिमा को बार-बार ठेस पहुँचाना भी एक प्रकार की मानसिक हिंसा नहीं है?
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी विभिन्न अवसरों पर मानवीय गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा मान चुका है। ऐसे में यदि कार्यस्थल, विद्यालय या कोचिंग संस्थान ऐसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं जहाँ व्यक्ति लगातार तुलना, अपमान और मानसिक दबाव का सामना कर रहा है, तो यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय है।
 ज्ञात रहे कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और अपमानजनक तुलना में अंतर है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है जबकि तुलना यह संदेश देती है कि उसका मूल्य किसी दूसरे से कम है। प्रेरणा व्यक्ति को आगे बढ़ाती है, तुलना उसे भीतर से तोड़ती है।
समाज, परिवार, शिक्षक और संस्थान सभी को इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन करना होगा। हमें बच्चों को यह सिखाना होगा कि सफलता का अर्थ किसी और से आगे निकलना नहीं बल्कि स्वयं का बेहतर संस्करण बनना है। कर्मचारियों को यह महसूस कराना होगा कि उनकी पहचान केवल लक्ष्य और आंकड़ों से नहीं बल्कि उनके योगदान और मानवीय गरिमा से भी जुड़ी है।
अब समय आ गया है कि सरकार, शिक्षा नियामक संस्थाएँ, मानवाधिकार आयोग और न्यायपालिका इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। विद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और कार्यस्थलों में होने वाली अपमानजनक तुलना के मानसिक प्रभावों का अध्ययन कराया जाए तथा ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ जो व्यक्ति की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सकें।
आज देश मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने की बात कर रहा है, तब तुलना की इस अदृश्य हिंसा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि यह हिंसा कानून की पुस्तकों में अपराध के रूप में दर्ज न हो लेकिन इसके दुष्परिणाम समाज में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं और आगे भयानक होंगे।
यदि किसी बच्चे का आत्मविश्वास टूट रहा है, किसी युवा की उम्मीदें बिखर रही हैं या कोई कर्मचारी स्वयं को निरर्थक महसूस करने लगा है तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था की भी विफलता है।
तुलना को प्रेरणा का साधन मानने की सोच पर पुनर्विचार करने का समय आ चुका है। क्योंकि हर व्यक्ति अद्वितीय है और उसकी तुलना किसी दूसरे से नहीं केवल उसके अपने विकास से की जानी चाहिए। यही मानवीय गरिमा का सम्मान है और यही एक संवेदनशील समाज की पहचान भी।


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