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झीलों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का संरक्षण उदयपुर के भविष्य के लिए अनिवार्य : पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सतीश श्रीमाली

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22 Jul 26
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झीलों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का संरक्षण उदयपुर के भविष्य के लिए अनिवार्य : पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सतीश श्रीमाली

 

उदयपुर। राजस्थान के पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक एवं वरिष्ठ टाउन प्लानिंग विशेषज्ञ सतीश श्रीमाली ने उदयपुर की ऐतिहासिक झीलों, आयड़ नदी तथा प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के संरक्षण के लिए समन्वित और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा है कि अनियोजित शहरीकरण, अतिक्रमण और बढ़ता प्रदूषण शहर की पारिस्थितिकी, जल सुरक्षा और पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।

डॉ. मुनेश अरोड़ा को दिए एक साक्षात्कार में श्रीमाली ने कहा कि मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा विकसित उदयपुर की जल संरक्षण प्रणाली पारंपरिक नगर नियोजन का उत्कृष्ट उदाहरण है। झीलों, नहरों और प्राकृतिक जल प्रवाह मार्गों का ऐसा परस्पर जुड़ा नेटवर्क तैयार किया गया था, जिससे वर्षा जल का अधिकतम संरक्षण हो, पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित रहे, सिंचाई को समर्थन मिले और भूजल स्तर लगातार रिचार्ज होता रहे।

उन्होंने बताया कि फतहसागर, पिछोला, रंगसागर, स्वरूपसागर और गोवर्धन सागर सहित प्रमुख झीलों को प्राकृतिक जल प्रवाह मार्गों और ओवरफ्लो संरचनाओं के माध्यम से वैज्ञानिक ढंग से एक-दूसरे से जोड़ा गया था। आसपास की पहाड़ियों और कैचमेंट क्षेत्रों से आने वाला वर्षा जल क्रमबद्ध रूप से एक झील से दूसरी झील तक पहुंचता था, जिससे सदियों तक शहर की जल आवश्यकताओं की पूर्ति होती रही।

श्रीमाली ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि तेज़ी से फैलते शहरीकरण, होटल, रिसॉर्ट, फार्म हाउस और अन्य निर्माण गतिविधियों के कारण झीलों के कैचमेंट क्षेत्र लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। इससे जल संग्रहण क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि यदि उदयपुर को भविष्य में जल संकट से बचाना है तो झीलों की सीमा और उनके कैचमेंट क्षेत्रों का कड़ाई से संरक्षण करना होगा।

उन्होंने बताया कि झीलों के अनेक कैचमेंट क्षेत्रों को पहले ही 'नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन' घोषित किया जा चुका है तथा राजस्थान उच्च न्यायालय भी समय-समय पर अतिक्रमण रोकने के निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद कई स्थानों पर झीलों की पाल, जलग्रहण क्षेत्रों और प्राकृतिक जलमार्गों में अवैध भराव एवं निर्माण गतिविधियां जारी हैं।

श्रीमाली ने शहर के छोटे तालाबों और जलाशयों के संरक्षण को भी समान रूप से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2006 की विनाशकारी बाढ़ के बाद हुए सर्वेक्षण में लगभग 42 से 45 तालाबों की पहचान प्राकृतिक वर्षा जल संग्रहण एवं बाढ़ नियंत्रण प्रणाली के रूप में की गई थी। यदि इन जलाशयों को संरक्षित रखा जाए तो भूजल स्तर बनाए रखने के साथ-साथ शहरी बाढ़ की समस्या को भी काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

उन्होंने झीलों और आयड़ नदी में बिना उपचारित सीवरेज छोड़े जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे शहर की जल गुणवत्ता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को लगातार नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने व्यापक सीवर प्रबंधन, सीवरेज लाइनों की नियमित निगरानी तथा अपशिष्ट जल को झीलों और नदी में जाने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता बताई।

अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभव का उल्लेख करते हुए श्रीमाली ने कहा कि पेरिस और कोपेनहेगन जैसे शहरों ने सुव्यवस्थित शहरी नियोजन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और कड़े पर्यावरणीय नियमों के माध्यम से अपनी नदियों और जल निकायों का सफल संरक्षण किया है। उन्होंने कहा कि उदयपुर भी अपनी ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए ऐसे मॉडल से सीख ले सकता है।

आयड़ नदी के संबंध में श्रीमाली ने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान थूर से उदयसागर तक लगभग 26 किलोमीटर लंबी आयड़ रिवरफ्रंट योजना तैयार की गई थी। इस विस्तृत योजना में नदी के मूल प्रवाह मार्ग का सर्वेक्षण, सरकारी भूमि का सीमांकन, अतिक्रमणों का दस्तावेजीकरण, सड़क नेटवर्क का एकीकरण तथा नदी संरक्षण के लिए दीर्घकालिक उपायों का विस्तृत खाका तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा कि यह योजना तत्कालीन शहरी सुधार न्यास (यूआईटी) के दौरान तैयार की गई थी, जिसे अब उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) के रूप में पुनर्गठित किया जा चुका है। उनके अनुसार उस समय तैयार किए गए विस्तृत सर्वेक्षण, नक्शे और अभिलेख आज भी उपलब्ध हैं और उनका उपयोग करते हुए यूडीए कानूनी प्रक्रिया के तहत नदी क्षेत्र का पुनर्विकास और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रभावी ढंग से कर सकता है।

श्रीमाली ने कहा, "योजना और आधारभूत तैयारी पहले ही पूरी की जा चुकी है। अब आवश्यकता केवल प्रशासनिक निरंतरता और उसे लागू करने की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की है।"

उन्होंने कहा कि उदयपुर की झीलों, नदियों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का संरक्षण केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि शहर के आर्थिक और सामाजिक भविष्य से जुड़ा हुआ है। यदि इन जल स्रोतों को सुरक्षित रखा जाता है तो पर्यटन को मजबूती मिलेगी, जल सुरक्षा सुनिश्चित होगी, भूजल स्तर संरक्षित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए उदयपुर की पहचान 'झीलों की नगरी' के रूप में अक्षुण्ण बनी रहेगी।


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