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माँ का गाँव और बचपन * बचपन की यादों से जुड़ कर ग्राम्य संस्कृति का परिचय कराती उम्दा कृति

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14 Mar 26
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माँ का गाँव और बचपन *  बचपन की यादों से जुड़ कर ग्राम्य संस्कृति का परिचय कराती उम्दा कृति

चिंता रहित खेलना खाना 
और विचरण यूं स्वच्छंद 
कैसे भूला जा सकता है 
बचपन का अतुलित आनंद
विख्यात कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की उक्त पंक्तियां लेखिका श्वेता शर्मा की कृति के संस्मरण आलेखों के अंतर्विषय दृष्टि के भावों पर सटीक प्रतीत होती हैं, जिसमें गांव की सोंधी माटी की गंध है और उस से जुड़ी ज़हन में रमी बचपन की यादें हैं। वो स्मृतियां जो दिल और दिमाग पर कभी न भूलने वाली यादों की मानिंद छाई हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित यह कृति केवल लेखिका की गांव से जुड़ी स्मृतियां ही नहीं हैं वरन पाठक को भी उसके गांव की याद दिला जाती हैं। पढ़ते समय पाठक भी गांव से जुड़ी अपने बचपन की यादों में खो जाता है और वो यादें एक - एक कर चलचित्र की भांति दिमाग में उभरती दिखाई देती हैं। ऐसा प्रभावी वर्णन किया है लेखिका ने।  लगता है लेखिका के साथ-साथ पाठक भी इन घटनाओं और प्रसंगों के साथ यात्रतीत हो रहा है। यही लेखिका के सृजन का प्रभाव और सफलता कही जा सकती हैं। भाषा अत्यंत सहज,सरल और प्रवाहपूर्ण हैं। गांव की बोली के शब्दों को ज्यों का त्यों लिया जाना सृजन कौशल को बताता है। लेखन में कहीं कोई कृत्रिमता ,बोझिलता और जटिलता नहीं है।
    अध्योपांत पढ़ने पर लेखों की महत्वपूर्ण खूबी लिखने का रोचक अंदाज लगा । लेख कथात्मक शैली लिए हैं। पाठक पढ़ना शुरू करता है तो उपन्यास जैसी रुचि जागृत होती है और पूरा लेख पढ़ने को बाध्य हो जाता है। हर अध्याय में विषयनुरूप वर्णन अद्भुत है। प्रसंग को लिखते समय अपने बचपन की स्मृतियों को पुष्ट करने करने के लिए अपनी माँ श्यामा शर्मा जी की यादों को भी बड़ी कुशलता से समायोजित किया गया है। माँ की लेखिका के बचपन की स्मृतियाँ लेख को अधिक प्रभावी , तथ्यपरक एवं रोचक बनाने में सहायक बनती हैं । प्रभावित करने वाला तथ्य है कि लेखिका ने जहां-जहां भी अपनी माँ के प्रसंगों का सहारा लिया ईमानदारी से उनके नाम का उल्लेख भी किया है। यह ईमानदारी प्रायः कम ही देखने को मिलती है।
     प्रथम अध्याय ' माँ के गाँव का चित्रण' की ये पंक्तियां , "  गाँव के बाहर बड़े-छोटे होद बने हुए हैं। उनमें कपड़े रंगाई का और घर पर कपड़ा छपाई का काम होता था। मैं बड़े ही कोतूहल से कपड़े छपाई का काम देखती थी। बहुत सी बार में नीलगरों की बा से कहती थी, "बा मैं भी छापकर देखूं।" तब बा कहती थी, "पहले पुराने कपड़े पर छाप।" बा छापा कपड़े पर रख देती थी। मैं उसे हथेली से दबा देती थी। वह आनन्द भी अलग ही था। " 
" दरवाजे के बाहर कुआँ था इसके पास ही इमली का पेड़ था, इस इमली के पेड़ के नीचे मैंने सारा बचपन बिताया था। इमली के पेड़ पर से कटारे खोऱ्या यानी (कच्ची इमली व फूल) की चटनी बांटते थे और चपातियाँ घर से ले जाते थे। उन चपातियों के साथ बड़े मजे से खोऱ्या की चटनी के चटखारे लेकर खाते थे। अब कहाँ हैं वैसे दिन।" ये प्रसंग बचपन की यादों की रंगीन दुनिया से कम नहीं हैं।
     "बैलगाड़ी से शादी में जाना और स्त्रियों व पुरुषों का श्रृंगार" में गांव में बारात का बैलगाड़ी से जाना,बेलों और गाड़ियों के साथ घर में महिला और पुरुषों का शृंगार करने की प्रक्रियाएं और बन्नी के गीतों को दर्शाया गया है। जानकर आश्चर्य होता है उस समय गालियां भी गाई जाती थी। एक बानगी देखिए......
"  कांकड़ से अब घर बहुत ज्यादा दूर नहीं था। कुछ समय बाद ही घर पहुँच गये। ब्याव का घर था। हमारे घर पहुँचे ही घर के अन्दर से ब्याण सगी जवांई भाई पाहुने प्हीर एक के बाद एक बाहर निकल आये। गाने बजानें में नानीजी, मामीजी, माँ भी कम थोड़ी थी। अब दोनों ओर से ब्याण सगी धड़ाधड़ गालियाँ गाने लगी। तो सबका हंस हंसकर पेट दर्द करने लगा। अब इधर से तीनों मिलकर जमकर गालियाँ गाने लगीं।
अरै लाड़ी की माई मूडै तो बोल म्हें कांई नतकै ई आवां छा न्ह बोलै न्ह बोलै सीगडा पै बैठ म्हें कांई नतकै ई आवां छा।

अब ब्याण सगी का ओर सूं भी बढ़िया जमके जवाब आया।

मोड़ी आई रै दारी मोड़ी आई रे दारी हरीचन्द जी हाळी मोड़ी आई है।

हंसी ठट्ठों के साथ ही हम बैठक में पहुँचे गये। हमारे महिलाओं के अंदर पहुँचते ही पुरुष सब बाहर आ गये। हम सब आँगन में पहुँच गये। इतना बड़ा आँगन भी महिलाओं से खचाखच भरा हुआ था। महिलायें गाने बजाने में मगन थीं। मुझे तो मजा आ रहा था। आधी महिलाऐं गालियाँ, आधी दादरा ख्याल गाने में मगन थीं तो आधी नाच रही थी। नाचने व नाच देखने का तो मुझे बचपन से ही शोक है। मैं भी मगन होकर नाचने लगी।" ये प्रसंग बताता है उस समय विवाह जैसे मांगलिक उत्सवों पर भी कितना देसी मनोरंजन होता था। लेख बताता है ब्यूटी पार्लर का काम नायन कितनी जिम्मेदारी से करती थी।
   "काला हलवा" अध्याय गांव की अतिथि सत्कार की उस परम्परा का प्रतीक है जब चीनी का उत्पादन कम होता था और गांवों में मेहमान के लिए गुड का हलवा बनता था। इस का रंग काला होने से काला हलवा पुकारा जाता था। इसे सीरा भी कहा जाता है और यह नाम आज तक प्रचलन में है। काले हलवे को लेकर रोचक प्रसंग लिखे हैं और अतिथि सत्कार के लिए इसका महत्व प्रतिपादित किया गया है। एक प्रसंग देखिए........
" नानीजी ने उस दिन जीम कर आते ही पूछ लिया, "भाया, क्या खाकर के आया रे।" अशोक भाई सा ने कहा, बा (दादी) काला काला पता नहीं क्या खिला दिया। मीठा-मीठा था। मुझे तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। एक दो कोर ही खाये। मैंने तो पुड़ी-सब्जी से ही पेट भर लिया। काकीजी बार-बार सीरा सीरा कह रही थी।" नानीजी ने हमसे पूछा तो मैंने कहा, "अरे ! नानीजी गुड़ का हलवा बनाया था। नानीजी अब हम तो जीमने नहीं जायेगें। गुड़ का हलुआ खा-खाकर और पुआ-पकौड़ी खा-खाकर परेशान हो गये हैं। अशोक भाई तो बहुत ज्यादा परेशान हैं। पन्द्रह दिन तक कैसे खायेगें इस गुड़ के हलवे को।" अब तो अशोक भाई सा ने गुड़ के हलवे का नामकरण कर दिया, भसंडा सीरा। अब तो जीमकर आते ही कोई भी पूछता कि अशोक क्या खाया। तो वो कहते, अरे ! क्या खाया। वही भसंडा काला कट्टु गुड़ का सीरा। अब यह आ गई कि अशोक भाई सा ने कहा, "बा ( दादी) विनायक किसी और को बना दो। मैं जीमने नहीं जाऊँगा।" नानीजी व मौसीजी ने बहुत देर तक समझाया कि, "बेटा एक-दो कोर ही खा लेना पर चला जाना। अच्छा नहीं लगता ऐसे।"
  " पटिये के नीचे साँप," अध्याय के शीर्षक की घटना को रोचक रूप से प्रस्तुत किया है। एक अंश देखिए ,  " इतने बड़े साँप को देखकर माँ ने कहा, "अरे! अभी तो मेरी पाली पोसी लड़की को साँप खा जाता। कैलाशी जो तू नहीं आती, तो मेरी पाली पोसी छोरी हाथ से गई थी।" इतने में ही नानाजी पोल के आंगन को बुहार कर आ गये थे। वो बोले कंचन "आज सवेरे सवेरे लट्ठ लेकर कैसे खड़ी है।" माँ बोली "पिताजी यहाँ बहुत बड़ा साँप है, इधर मत आना पोल में ही रहना।" उसने बड़ी बहन से कहा, "कावेरी तू उधर नानाजी के पास पोल में चली जा। और छोरी कैलाशी तू दौड़कर तेरे
पिताजी को जल्दी से ले आ।" जीजीबाई कैलाशी दौड़कर दादा गोपाल को ले आई। माँ ने मेरी फ्राक पकड़कर मुझे नानाजी के पास कर दिया। दादा गोपाल ने साँप देखकर कहा "जीजीबाई मेरे बस की बात नहीं है इस साँप को मारने की।" माँ ने कहा फिर क्या करें। उसने कहा "सांई बाबा को बुलाना पड़ेगा।" साँई बाबा के आते ही साँप सरपट-चलकर जूते चप्पलों के बीच में जा घुसा। माँ ने हमसे कहा "लड़कियों किवाड़ लगा लो।" नानाजी ने भी किवाड़ लगा लिये पर एक छोटी सी जगह बना ली जिसमें वो देखते रहे साँप किधर जा रहा है।" 
    गांव से जुड़ी बचपन की स्मृतियों को 15 छोटे-छोटे आलेखों के अन्य अध्याय धूनियाँ लोककथाओं की परंपरा, खेतों में पानसी तोड़ने जाना, करवाड़ गाँव की दीपावली, मेरे नाना जी का श्राद्ध, जब माँ चाँदी की अठन्नी निगल गई, मौसी की शादी के लड्डू, सेठ जी की बेटी की शादी, गूंगी लड़की, नदी का स्नान, वह भी क्या दिन थे में लेखिका ने बचपन की यादों को खूबसूरती से समेटा है। 
  अपनी बात में लेखिका लिखती हैं," स्मृतियाँ हमारी जिंदगी का बहुत बड़ा खजाना है। हर एक का अपना बचपन होता है और अलग ही स्मृति कोश, आज कल के बच्चों का क्या बचपन, हमारी पिछली पीढ़ियों का बचपन बहुत शानदार रहा है। वो बालपन अनुशासनबद्ध और संस्कारों से भरपूर होता था।  प्रस्तुत है कृति "माँ का गाँव और बचपन" इसमें गाँव करवाड़ और ग्राम्य संस्कृति के शानदार चित्रण हैं। इन संस्मरणों से हाड़ौती अंचल के गाँवों के तत्कालीन परिवेश को समझा जा सकता है। कितना सुखद था वो बैलगाड़ी युग, सभी संतोष से मिलजुल कर रहा करते थे। ये संस्मरण एक तरह से युगीन दस्तावेज है। ये संस्मरण हमारी बदलती संस्कृति को बताते हैं एवं बाल मनोवृत्ति और मनोविज्ञान को भी रूपायित करते हैं।" उन्होंने यह कृति श्रद्धा स्वरूप अपनी दादी समाज सेविका श्रीमती कमला देवी शर्मा और माँ श्यामा शर्मा को समर्पित की है। आवरण पृष्ठ किसी पेंटिंग जैसा बहुत आकर्षक है


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