भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व और परंपरा के पीछे कोई न कोई गहरा सामाजिक, धार्मिक और स्वास्थ्य से जुड़ा संदेश छिपा होता है। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण परंपरा है शीतला सप्तमी और अष्टमी जिसमें ठंडा और एक दिन पहले बनाया हुआ भोजन करने का रिवाज है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन आधुनिक जीवनशैली में धीरे-धीरे लोग इसे भूलते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप एक ओर हमारी पारंपरिक समझ कमजोर हो रही है। वहीं दूसरी ओर समाज ऐसे खाद्य पदार्थों का आदी बनता जा रहा है जो महीनों तक पैक होकर रखे रहते हैं और जिनमें पोषण बहुत कम होता है।
शीतला सप्तमी और अष्टमी के दिन माता शीतला की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले तैयार किया हुआ ठंडा भोजन खाया जाता है। इसमें पूरी, पकौड़ी, मीठा चावल, दही, लापसी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है। बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य और अनुशासन का संदेश भी छिपा है।
पहले के समय में लोग इस दिन चूल्हे को विश्राम देते थे, जिससे घर और रसोई की साफ-सफाई पर ध्यान दिया जाता था। साथ ही यह भी एक तरह का सामाजिक संदेश था कि भोजन को व्यर्थ न करें और सीमित साधनों में संतुलित जीवन जीना सीखें। एक दिन पुराना भोजन, यदि स्वच्छता और सावधानी से रखा गया हो तो वह शरीर के लिए हानिकारक नहीं होता। बल्कि यह हमें भोजन के प्रति सम्मान और संयम की शिक्षा देता है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि आज के आधुनिक दौर में हम अपनी इस सार्थक परंपरा को भूलते जा रहे हैं। लोग शीतला सप्तमी–अष्टमी पर ठंडा भोजन खाने की परंपरा को “बासी” कहकर छोड़ रहे हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर महीनों पुराने पैकेटबंद खाद्य पदार्थ बड़े चाव से खा रहे हैं। बाजार में मिलने वाले केक, ब्रेड, बिस्किट, नमकीन और अन्य पैक्ड फूड कई-कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए रसायनों और प्रिज़र्वेटिव से भरे होते हैं। इनमें पोषण बहुत कम होता है और नियमित सेवन से स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
यह एक विडंबना ही है कि हम अपनी परंपराओं के वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व को समझे बिना उन्हें पुराना कहकर छोड़ रहे हैं। लेकिन बाजार के प्रभाव में आकर ऐसे खाद्य पदार्थों को अपना रहे हैं जो वास्तव में शरीर के लिए अधिक हानिकारक हैं। हमारी संस्कृति में भोजन को “अन्नपूर्णा का प्रसाद” माना गया है इसलिए इसे सम्मान और संतुलन के साथ ग्रहण करने की शिक्षा दी गई है।
समय की आवश्यकता है कि हम अपनी परंपराओं को अंधविश्वास मानकर त्यागने के बजाय उनके पीछे छिपे संदेश को समझें। शीतला सप्तमी और अष्टमी जैसी परंपराएँ हमें सादगी, संयम और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देती हैं। यदि हम अपनी संस्कृति के इन मूल्यों को फिर से अपनाएँ तो न केवल हमारी परंपरा जीवित रहेगी बल्कि समाज भी अधिक स्वस्थ और संतुलित जीवन की ओर बढ़ सकेगा।