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पर्यटन - पुरातत्व हाड़ौती के प्राचीन मन्दरगढ़ की अज्ञात  पुरासम्पदा

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20 Jul 26
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पर्यटन - पुरातत्व  हाड़ौती के प्राचीन मन्दरगढ़ की अज्ञात  पुरासम्पदा

राजस्थान के दक्षिण पूर्व में स्थित हाड़ौती संभाग के कोटा जिले में प्राचीन मन्दिरों की एक ऐसी पुरातात्त्विक कला सम्पदा स्थित है जो आज तक पुरातत्त्व विभाग, पर्यटन विभाग और शौधार्थियों की दृष्टि से अछूती रही है। यह पुरा सम्पदा बीहड़ जंगल के बीच और दूरस्थ कच्चे पथरीले मार्ग पर स्थित होने के कारण यहाँ तक खोजी इतिहासकार भी पहुँच नहीं पाये। केवल मात्र पिकनिक मनाने वाले और यू-ट्यूब पर विडियो बनाने वाले युवक-युवतियों ने एक कहानी बनाकर इसे मोबाइल के माध्यम से प्रचारित किया। कोटा के इतिहास, पुरातत्त्व और पर्यटन की किसी भी पुस्तक में इस पुरास्थल की कलासम्पदा का कही कोई वर्णन अभी तक देखने, पढ़ने में नहीं आया है।
 कोटा मुख्यालय से दक्षिण में बस मार्ग पर 33 किमी दूर मण्डाना नामक ग्राम स्थित है। इस ग्राम से पश्चिम दिशा की ओर 8 किमी दूर एक छोटा ग्राम रांवठा है। इस ग्राम से 7 किमी दूर उत्तर की ओर कच्चे तथा पथरीले मार्ग पर स्थित मुकुन्दरा पर्वत की गोद में दो पहाड़ियों के मध्यभाग में बने है मन्दरगढ़ के प्राचीन मन्दिर। जनाशुति के अनुसार कभी यहाँ 108 मन्दिर थे इस कारण इस स्थल को आज ग्रामीण लोग मन्दरगढ़ के नाम से पुकारते हैं। यहाँ के मन्दिरों का सामुख्य कला अध्ययन निम्न प्रकार है -
विष्णु मन्दिर1 - मुकुन्दरा की यहाँ दो पहाड़ियों में से बायीं ओर की पहाड़ी पर एक भग्न प्राचीन मन्दिर के कला अवशेष है। भूतल से यह मन्दिर 30 फीट की ऊँचाई पर निर्मित तथा शिखर विहिन एवं प्रदक्षिणा रहित है। मन्दिर में केवल अन्तराल, द्वारशाखा और गर्भगृह शेष है। अन्तराल का दाहिनां भाग भी भग्न है। बायें भाग की भित्ति के अन्दर एक चौकोर रिक्त स्थान है। जबकि छत की नक्काशी में गहरे कटाव वाले षट्कोण और चौकोर कलात्मक पाषाण खण्ड है जो मन्दिर की प्राचीनता के प्रमाण है। इन पाषाण खण्डों के नीचे तीनों ओर कलात्मक सुघड़ पाषाण पट्टिका है जिस पर लघु तिकोनी आकृतियों के मध्य चौकोर आकृतियों के अंकन है। अन्तराल के पश्चात् मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार है जिसकी दायीं-बायीं द्वार शाखा पर 4-4 बड़े गोलाकार व बलदार अलंकृत पुष्पों की वल्लरियों का सुन्दर अंकन है। इस अंकन के निकट ही एक दूसरे के शीर्ष पर दोनो ओर 13-13 चौकोर कलात्मक पाषाण अंकन है। द्वार शाखा के निम्न भाग में दाहिनीं ओर द्विभंग मुद्रा में अपने बायें हाथ में जलकलश लिये एक नारी का अंकन है जिसके बायें पैर के नीचे मकर मुख है। संभवतः यह गंगा का अंकन है। इसके निकट एक पुरूष परिचारक की मूर्ति है। बायीं ओर द्विभंग मुद्रा में एक नारी अपने दाहिनें हाथ में जलकलश लिये अंकित है। इसके दाहिनें पैर के नीचे कच्छप है। संभवतः यह यमुना का अंकन है। इसके निकट ही एक परिचारक का अंकन है। इस द्वारशाखा के नीचे भाग के मध्य में दो हंसो की आकृति का अंकन है जो एक-एक पद्म पर बैठे हुए विपरित मुख किये है तथा अपनी चोंच से अपने ऊपर उठे पंखों को स्पर्श किये है। इस अंकन के दायें-बायें दो सिंह मुख तथा इनके निकट दो गजों का अंकन है। इस पट्टिका के नीचे एक अर्द्धगोलाकार एवं नीचे से पुष्प पत्तियों से अलंकृत उदुम्बर है। द्वार शाखा के शीर्ष पर एक कलात्मक पट्टिका है। इस पट्टिका के मध्य में दो गोल कलात्मक रथिकाओं के मध्य ध्यानस्थ विष्णु का पद्मासन में चतुर्भुजी स्वरूप का लघु अंकन है। विष्णु के दोनो अधोकर उनके पद्मासन स्वरूप में उनकी जंघा और चरणों पर स्थित है। उनके नीचे एक आसन है जिसके दोनो ओर से लटकती अर्द्धचन्द्राकार माला है। विष्णु के दोनो उर्ध्वकरों में से बायें कर में शंख का स्पष्ट अंकन है तथा दाहिनां कर भग्न है। मूर्ति में विष्णु के शीश पर चौकोर अलंकृत मुकुट, कर्ण कुण्डल एवं देह पर यज्ञोपवीत है। शीर्ष भाग पर एक अर्द्धचन्द्राकार आभामण्डल है। ललाट बिम्ब की इस मुख्य मूर्ति के दाहिनीं तथा बायीं ओर के भाग में पुष्प तथा उसके ऊपर 7-7 कमल पत्रों का अंकन है। इस पट्टिका में दाहिनी ओर कलात्मक गोल रथिकाओं के मध्य स्थानक विष्णु के व्यूह स्वरूप की मूर्ति है। विष्णु के इस स्वरूप को 24 व्यूह स्वरूपों में से एक केशव स्वरूप माना जाता है। मूर्ति के इस स्वरूप में विष्णु के शीश पर कीरीट मुकुट, कर्ण कुण्डल, यज्ञोपवीत, कटि प्रदेश में सुन्दर कलावलंकरण युक्त बन्धन, भुजाओं पर केयूर, दोनों कन्धों से चरणों के ऊपर तक अंकित वनमाला का अंकन है। विष्णु के इस चतुर्भुज केशव स्वरूप की मूर्ति में उनके दाहिनें अधोकर में पद्म, उर्ध्व दाहिनें कर में शंख के साथ उर्ध्व बायें कर में चक्र और बायें अधोकर में गदा का अंकन है। इसी प्रकार इस पट्टिका की बायीं ओर विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप का अंकन है। इसमें विष्णु के इस चतुर्भुज स्वरूप में उनके दाहिनें अधो कर में पद्म, उर्ध्व दाहिनंे कर में गदा के साथ बायें उर्ध्वकर में चक्र और बायें अधोकर में शंख का अंकन है। मूर्ति में विष्णु के इस त्रिविक्रम स्वरूप में वे उक्त वर्णित केशव रूप की भांति ही समग्र अलंकरण धारण किये है। मूर्ति के बायें चरण के निकट एक मानव की बोनी आकृति का अंकन है। उक्त दोनो मूर्तियों की लाक्षणिक पहचान के बारे में लेखक ने पुरातत्त्वविद् ‘पद्मश्री’ डॉ. नारायण व्यास से विमर्श किया था। डॉ. व्यास के अनुसार2 ये दोनो मूर्तियाँ रूप मण्डन के मूर्ति शिल्प नियम के अनुसार निर्दिष्ट है। जबकि पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग जयपुर की तकनीकी अधीक्षक डॉ. धर्मजीत कौर के अनुसार यह मन्दिर 12वीं सदी के परमारकाल का है जिसमें इस प्रकार के अंकन प्राप्त होते है।3 मन्दिर के गर्भगृह में केवल मुख्य देवता की मूर्ति प्रतिष्ठा का ऊँचा चौकोर भग्न आसन शेष है जहां तक पहुँचना अब असंभव है। गर्भगृह के अन्दर तीनों ओर केवल पाषाण खण्ड है।
 इस मन्दिर के बाहरी भाग में तीनों ओर जंघा भाग तक सुन्दर कलात्मक पाषाण खण्डों तथा उसके ऊपर छोटी ईटों का जमाव है जो भग्न शिखर भाग तक है। मन्दिर के तीनों बाहरी भाग पूर्णतया भग्न हैं। जंघा भाग पर कुछ पाषाण खण्ड है जिनमें से तल भाग पर दो-दो लम्बी और चौकोर रथिकाओं के मध्य शतरंजीय चौकोर ज्यामितीय आकृतियाँ है। ये पाषाण भूरे रंग के है और इसी के निकट लाल पाषाण पट्टिका पर इसी प्रकार के लघु अंकन है। इनके ऊपर इसी रंग के कलात्मक पाषाण खण्डों पर नीचे सुन्दर जलघट तथा उनमें से दोनो ओर निकलकर नीचे की ओर आती पुष्प लताएँ है। इन खण्डों के मध्य में कुछ पौधों के तने और उनमें से निकलती बलदार पत्तियों का अंकन है। दक्षिण के एक कलात्मक खण्ड पर जलघट और पत्र आकृतियों के नीचे सपाट पाषाण खण्ड पर दो पंक्तियों का एक अभिलेख है जो अपठित है। इस जलघट के ठीक ऊपर बने एक प्रकोष्ठ में एक स्त्री अपने बायें पैर मोड़कर और दाहिने पैर को नीचे टिकाकर अपने बायें हाथ में गोलपात्र थामें उसे अपने मुख से स्पर्श कर रही है मानों वे उस पात्र में भरी तरल वस्तु का पान कर रही है। उसका दाहिनां हाथ उसके हृदय तक है। मन्दिर के पृष्ठभाग की जंघा पर जलघट के ऊपर एक प्रकोष्ठ में एक बौना व्यक्ति अपना बायां पैर आगे और दाहिनां पैर पीछे मोड़कर बैठ हुआ अपने बायें हाथ से एक वृक्ष की शाख के ऊपरी सिरे को पकड़े हुए है। मन्दिर के इस दक्षिणी पृष्ठ भाग के जंघा भाग के ऊपर दो-दो रथिका युक्त रिक्त प्रकोष्ठ है। इस भाग से ऊपर का भाग पतली ईटों द्वारा निर्मित है जो शिखर तक है परन्तु शिखर वाला भाग पूर्णतया नष्ट है। यहाँ का आमलक भाग नीचे के भूतल पर पड़ा हुआ है। मन्दिर के उत्तरी भाग में कंटीली झाड़ियाँ होने से वहाँ तक पहुँचना असंभव है।
गोरा जी मन्दिर4:- उक्त मन्दिर के नीचे कोटा राज्यकालीन एक लघु कक्ष है जिसके गुम्बद पर कोटा राज्यकालीन धारियाँ बनी है। इस कक्ष में पाषाण खण्ड पर गोराजी की मूर्ति है अतः इसे गोरा जी मन्दिर कहा जाता है। इसके बायीं ओर के पाषाण पर काल भैरव, दायीं ओर बटुक भैरव की सामान्य मूर्तियाँ सुपूजित है। गोराजी मन्दिर के पीछे एक राज्यकालीन जलकुण्ड है। इसके निकट एक चबूतरे पर प्राचीन और 1फीट ऊँचा शिवलिंग स्थापित है। इसके आगे एक कलात्मक नन्दी की प्राचीन मूर्ति स्थापित है। यह परमारकालीन है। नन्दी का मुख आगे से भग्न है परन्तु उसके शीश पर रस्सीदार चैन, और ऊपर उठे पान के पत्ते की भाँति कान, ग्रीवा में रस्सी के मध्य गोल अंकन, ग्रीवा से पीठ तक कलात्मक घुंघरमाल है जो पीठ से नन्दी के पिछले भाग तक अंकित है तथा मध्य मे लटकती घण्टिका का अंकन कलात्मक है। नन्दी की बायीं पीठ पर एक जूटधारी पुरूष का अंकन है जिसने अपने दाहिनें हाथ को ऊपर उठाकर उसमें एक चंवर धारण किया हुआ है। 
 गोराजी मन्दिर के दाहिनीं ओर चबूतरे पर एक चौरस पट्टिका रखी है, इस पट्टिका के मध्य एक शिवलिंग का योनिपट्ट है। इस पट्ट पर गोल चपटा काला पाषाण रखा है और योनिपट्ट में सीमेन्ट जमा हुआ है। इसके चारो ओर अनेक अंकन है। पट्ट के शीर्ष पर मध्य में दायीं ओर मुख निकाले हुए चार पैरों वाले कछुए का अंकन है जो चलायमान मुद्रा में है। इसके मुख के समक्ष सूर्य का मुख और प्रभामण्डल तथा उसके निकट कलात्मक गदा का अंकन है। कछुए के पीछे बायीं ओर चन्द्रमा का मुख तथा उसके निकट गोल आवरण युक्त चक्र का अंकन है। योनिपट्ट के मध्य भाग में दाहिनीं ओर दो युगल चरण चिह्न तथा इनके नीचे एक पुष्पित नाल युक्त कमल तथा उसके नीचे एक श्वान का अंकन है। इसी के बायीं ओर ऊपर दो युगल चरण तथा उनके नीचे शंख तथा उसके नीचे पंख युक्त गतिमान मत्स्य का स्पष्ट अंकन है। इस चौकोर पट्टिका के ऊपर तथा दायें-बायें किनारे पर कुछ लघु लेखों का अंकन है जिनका वाचन निम्न प्रकार है:-
पट्टिका के ऊपरी भाग पर  - ‘‘ध र ब की ा स की नो’’
पट्टिका के बायीं ओर - ‘‘गुसाई श्री सयामपुरी जी ाा या जाणे श्री कण-
    संबत 1760 बदे’’
पट्टिका के दाहिनीं ओर - ‘‘मा ती गुसई तीरथपुरी जी देवपुरी - आ स हो इ क रा ही ा स ता’’ अंकित हैं। इन शब्द अंकन से ऐसा प्रतीत हाता है कि संवत 1760 (ई. सन् 1703) में इस स्थान पर गुसाई साधुओं का स्थल रहा होगा। चूंकि पट्टिका में वैष्णव चिह्नों के साथ कछुवा, मत्स्य और श्वान का अंकन होना उक्त गुसाई साधुओं की साधना क्रिया का अंग रहा होगा।
 उक्त मन्दिर के ठीक सामने पूर्व की ओर पहाड़ी पर 3 छत्रियाँ बनी है जिन पर कोटा राज्यकालीन स्थापत्य की झलक परिलक्षित होती है। इनमें से प्रथम छत्री का एक मात्र भग्न चबूतरा शेष है। द्वितीय और तृतीय छत्रियाँ एक ऊँचे चबूतरे पर चार-चार स्तम्भों पर खड़ी है। ये सभी स्तम्भ 8-8 फीट ऊँचे है जो नीचे से चौकोर, मध्य में षट्कोणीय है तथा उनके ऊपर चार-चार कलात्मक बलदार पाषाण खण्ड तथा उनके ऊपर 2-2 फीट के चारों ओर छज्जे लगे है। इनके ऊपर चारो ओर चौकोर देहरी बनी है तथा उसके शीर्ष पर अण्डाकार धारीदार गुम्बद और कलश बने हुए है। देहरी भाग के चारो ओर कोटा राज्यकालीन पुष्पों की आकृतियों का अंकन है। दोनों छत्रियों के मुख्य चबूतरे का मध्यभाग खुदा हुआ है तथा वहाँ ना तो चरण पगलिये है ना ही कोई अभिलेख है। 
चतुर्भुजनाथ मन्दिर5:- इस स्थल के आगे पहाड़ी पर लगभग 25 फीट ऊँचा पूर्वाभिमुखी चतुर्भुजनाथ का मन्दिर है। यह एक विशाल जगती पर निर्मित है। मन्दिर के पूर्वी प्रवेश द्वार तक जाने के लिये सीढ़ियाँ बनी है, जहाँ मध्य में एक प्राचीन शिवलिंग है जो नीचे से षट्कोण तथा मध्य व ऊपर से गोलाकार है। इन सीढ़ियों के दायें-बायें प्राचीन अंकन युक्त पाषाण खण्ड जड़े है। प्रवेशद्वार में मण्डप के अग्रभाग के दोनो चबूतरों पर दो दिक्पालों की लाल पाषाण की मूर्तियाँ लगी हुई है। 12वीं सदी की इन मूर्तियों में दायें भाग की पूर्वाभिमुखी मूर्ति वायुदेव की है। वायु उत्तर पश्चिम दिशा के स्वामी है। द्विभंग मुद्रा की इस स्थानक मूर्ति में चतुर्बाहू वायु के दाहिनंे उर्ध्वकर में ध्वज पताका दण्ड, अधोकर में अक्षमाला तथा बायें उर्ध्वकर में गदा समान आयुध और अधोकर में जलघट है। उनके बायें पैर के नीचे वाहन हरिण का स्पष्ट अंकन है। उनके शीश पर मुकुट, कानों में घुंघरू युक्त पेण्डिल, ग्रीवा में तीनों लड़ियों का मोतीहार, वक्ष के दोनों ओर मोती माला, कटिप्रदेश से घुटनों तक अलंकृत कमरबन्ध के साथ अलंकृत मालाएँ और घुटनों के नीचे तक कमलगुट्टो की माला है। उनके चारों करों में गोलकड़े और दोनो बाहुओं में से आगे की ओर निकलता उत्तरीय है। इसी क्रम में मण्डप प्रवेशद्वार के दूसरे चबूतरे पर दक्षिण दिशा के स्वामी दिक्पाल यम की मूर्ति का अंकन है। मूर्ति में यम मुकुट, ग्रीवाहार, कर्णकुण्डल, यज्ञोपवीत, वक्षमाला, कमरबन्ध से अलंकृत है। उनके बायें उर्ध्वकर में कुक्कुट, बायां अधोकर भग्न है। उनका दाहिनीं उर्ध्वकर भग्न है तथा दाहिनें अधोकर में अक्षयमाला तथा नीचे उनके वाहन महिष का स्पष्ट अंकन है। यद्यपि उक्त दोनों मूर्तियाँ उक्त मन्दिर के पूर्वी चबूतरे पर लगी है जो दिक्पालों की दिशा के नियम के अनुकूल नहीं है। प्रतीत होता है ये जीर्णोद्धार के समय यहाँ बेमेल रूप में चुन दी गई थी। मन्दिर का गोल मण्डप मध्यकालीन है जो 12 चौकोर स्तम्भों पर टिका हुआ है। दक्षिणी स्तम्भ के बायें भाग पर पश्चिम दिशा के दिक्पाल वरूण की चतुर्भुजी मूर्ति लगी हुई है। वरूण के शीश पर जटा मुकुट के मध्य एक मणि का अंकन है। वे ग्रीवा में पेण्डिल वाला हार, वक्षमाला, कमर से जंघा तक लटकन माला, कर्णकुण्डल तथा हाथों में कंगन धारण किये है। उनके दांये उर्ध्वकर में पाशदण्ड, अधोकर में जलघट, बायें उर्ध्वकर में पुष्पकलिका और अधोकर में अक्षयमाला का अंकन है। उनके चरणों के पृष्ठ में अस्पष्ट सा अंकन है। बहुत सम्भव है वह उनका वाहन मकर हो। मन्दिर का अन्तराल सादा है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार की ललाट पट्टिका के मध्य शिव की ललितासन में मूर्ति है। इसमें वे दाहिनें उर्ध्वकर में त्रिशूल, अधोकर वरदमुद्रा में तथा बायें उर्ध्व कर में नाग व अधोकर में जल कमण्डल धारण किये है। उनके शीश पर जटाजूट, कानों में कुण्डल, ग्रीवा में माला, बायें स्कन्ध पर यज्ञोपवीत तथा चारो करों में कंगन का अंकन है। यह मूर्ति 12वीं सदी की है। इस मूर्ति के ऊपर एक अलंकृत पाषाण पटिटका है तथा उसके ऊपर दो-दो रथिकाओं के मध्य 17 चौकोर शक्करपारेनुमा आकतियों के अंकन है। द्वार की दायीं तथा बायीं ओर द्विशाखा युक्त द्वार पट्टिका पर घंटियों और लहरदार गोल आकृतियों का अंकन है। पट्टिकाओं के नीचे दोनो ओर द्विभंग मुद्रा में जलघट धारण किये मुकुटधारी गंगा-यमुना की मूर्तियाँ है तथा उनके निकट त्रिशूलधारी द्वारपालों का अंकन तथा उनके निकट एक-एक मोरछलधारी स्त्री आकृतियों का अंकन है। इसके नीचे तीन कीर्तिमुख तथा दोनो ओर गजो पर आक्रमण करते सिंहाकृतियाँ है। इनके नीचे अर्द्धचन्द्राकार उदुम्बर है जिसके दोनो ओर कलश का अंकन है। मन्दिर के बाह्य भाग में शीश पर कलश एवं आमलक प्राचीन है। उसके नीचे तीनों ओर शिखर भाग पर 3-3 उरूशृंग बने है तथा तीनो ओर पट्टिकाओं पर सिंह आकृतियाँ है। मन्दिर के दक्षिणी जंघा भाग के गोल रथिका युक्त गवाक्ष में एक अतिसुन्दर 12वीं सदी की श्वेत पाषाण से निर्मित नन्दी पर विराजमान शिव पार्वती की भग्न परन्तु अलंकरणों से शोभित मूर्ति लगी है। मूर्ति में शिव की वामावर्ती जंघा पर पार्वती विराजमान है। शिव के शीश पर अलंकृत मुकुट तथा शीश पृष्ठ में गोलाकार आभामण्डल है। वे भुजाओं में अलंकृत केयूर, ग्रीवा तथा वक्ष पर मौक्तिक हार, यज्ञोपवीत तथा पैरों में कड़े धारण किये हैं। मूर्ति में शिव के सभी कर अर्द्धभग्न है। पार्वती का मुख और कर भग्न है तथा कटिभाग पर चार बन्धन का अंकन है। शिव का बांया भग्न कर पार्वती के वामावर्ती स्तन को स्पर्श किये हुए है। मूर्ति के ऊपर दायें-बायें ब्रह्मा तथा विष्णु एवं नीचे नन्दी के दायें-बायें दो-दो परिचायक है परन्तु सभी अंकन अर्द्धभग्न है। मन्दिर के पश्चिम भाग की जंघा पर एक गवाक्ष में दो गोल रथिकाओं के मध्य लाल पाषाण से निर्मित दक्षिण दिशा के दिक्पाल यम की मूर्ति लगी है। मूर्ति में यम के बायें उर्ध्वभाग में कुक्कुट अधोकर उनकी जंघा पर है। उनके दाहिनें उर्ध्वकर में दण्ड है तथा दायें पैर के नीचे वाहन महिष का अंकन है। यम के शीश पर मुकुट, बन्धन, कर्णकुण्डल, ग्रीवा में एकावली हार तथा यज्ञोपवीत, कटिप्रदेश से घुटनों तक अलंकृत लटकन का अंकन है। इस मूर्ति के ठीक नीचे लाल पाषाण का एक कला खण्ड लगा है जिसके दाहिनीं ओर दो गोल रथिका के मध्य स्थानक मुद्रा की एक जैन तीर्थंकर मूर्ति है। बायीं ओर की दो गोल रथिका के मध्य एक पीठिका पर ध्यानमुद्रा में पालथी मारकर दोनो हाथ रखे एक तीर्थंकर की मूर्ति है जिनके नीचे दो सिंह की आकृतियाँ है। तीर्थंकर मूर्ति के ऊपर एक छत्र है जिसके शीर्ष पर एक लघु मुख अंकन है। इन दोनो मूर्तियों के मध्य गोल लता आकृतियाँ है। 
शिव मन्दिर6:- इसी मन्दिर के नीचे स्थित मैदान के आगे एक ऊँचे स्थान पर बनी विशाल जगती पर 25 फीट ऊँचा परमारकालीन शिव मन्दिर है। पश्चिमाभिमुखी इस मन्दिर में जाने के लिए सीढ़िया बनी हैं। मन्दिर का सभामण्डप मध्यकालीन है जिसमें 8 स्तम्भ है जो निम्न भाग से चौकोर, मध्य में षट्कोणीय और शीर्ष भाग पर गोलाकार कलात्मक अंकन लिये है। इन स्तम्भों पर भार साधक रूप में चारो ओर मध्यकालीन कीचकों का अंकन है। इन स्तम्भों के नीचे चारों और कीर्तिमुख और अश्व के सुन्दर अंकन है। ऐसे मूल रूप में आठ स्तम्भ है जिस पर सादा मण्डप बना हुआ है। इस मण्डप के तीनों ओर छत का विस्तार कर बाद में सादे चौकोर स्तम्भ लगाये गए हैं। मण्डप के आगे अन्तराल में नन्दी की मूर्ति है तथा अन्तराल की दोनों दीवारों में बने गवाक्ष में देव मूर्तियाँ नहीं है परन्तु उनके ऊपर कलात्मक चैत्य अंकन और कीर्तिमुखों की शृंखलाएँ है। प्रवेश द्वार द्विशाखा युक्त है, जिन पर कमलगट्टे के समान लहरदार पुष्पपक्तियों का अंकन है। द्वार के ललाट बिम्ब के मध्य गवाक्ष में एक पद्मासन योगमुद्रा की लघुमूर्ति का अंकन है। बहुत संभव है यह लकुलीश की है, जिसके दायें और बायें भाग में स्थानक मुद्रा में दो देव मूर्तियाँ है। इनके दोनों नीचे के हाथों में कुछ अस्पष्ट सी वस्तुएँ है। द्वार शाखा के निम्न भाग पर दोनों ओर द्विभंग मुद्राओं में एक-एक स्त्री अपने दायें और बायें उर्ध्वकरों में जलघट थामें खड़ी है और उनके पास एक-एक पुरूष परिचारकों का अंकन है। दरअसल इस मन्दिर के सभी स्तम्भ, अन्तराल और प्रवेशद्वार की शाखाएँ गहरे रंगों से इस प्रकार ग्रामीणों ने रंग दी है कि इन पर किसी भी प्रकार का अलंकरण दिखाई नहीं देता है। गर्भगृह के मध्य लगभग डेढ ़फीट ऊँचा प्राचीन शिवलिंग एक योनिपट्ट पर स्थापित एवं सुपूजित है। गर्भगृह की छत गोल और चौकोर अलंकृत पाषाण से बनी है तथा भित्तियाँ सादापन लिये है।
 मन्दिर के बाहर तीनों ओर निम्न भाग में सादे कटाव वाले बेदीबन्ध है। सादे जंघा भाग पर दो पंक्तियों में प्राचीन कीर्तिमुखों की लम्बी पट्टिकाएँ है उनके ऊपर सादे लघु छज्जे लगे है। शिखर भाग में चारों ओर परमारकालीन सुन्दर चैत्य आकृतियों का अंकन स्पष्ट है। शिखर के शीर्ष पर आमलक और कलश स्थापित है। परन्तु इस भाग को रंग से गहरा रंगा गया है। इस मन्दिर के बायें भाग के चबूतरे पर दो योनिपट्ट पर प्राचीन शिवलिंग स्थापित है।
 इस मन्दिर के समक्ष एक विशाल तालाब है जिसकी पाल (किनारे) पर एक वृहद परमारकालीन विष्णु की स्थानक मूर्ति है। मूर्ति में विष्णु के चारों कर भग्न है परन्तु शीश पृष्ठ का आभामण्डल, शीश मुकुट, ग्रीवाहार, यज्ञोपवीत, कटि में अलंकृत माला, भुजा में केयूर, शीश के बायीं ओर स्थानक ब्रह्मा, दाहिनीं ओर शिव के साथ विष्णु के मुकुट के ऊपर योगमुद्रा में विष्णु तथा दोनो ओर मालाधारी गन्धर्वो की मूर्तियों के साथ परिकर भाग में व्याल और निम्न भाग में दोनों ओर दो भग्न आयुध पुरूष हैं। इस मूर्ति के निकट दो अन्य भग्न मूर्तियाँ भी जमीन में धंसी हुई है।
शिलालेख7:-  इन मूर्तियों के आगे दो सती चबूतरे है। इनकी लेख पट्टिकाओं पर लाल कामी पोती गई है। एक लेख में किसी रानी के सती होने की जानकारी की पंक्तियाँ है-
‘‘श्री प्रेमपुरी जी, संवत 1791 ब्रषना पोस सुदी 4 बार मंगलवार के दीन मधुपुरगढ़ महारानी महाराव जी श्री दुरजनसाल जी पाती साही महान साही जा को हजूरी दली।’’ शेष पंक्तियाँ पठनीय नहीं है। लेख के शीर्ष पर एक अश्व और उसके ऊपर तलवार तथा ढ़ाल लिये एक शाही पुरूष तथा उसके पीछे हाथों में तलवार व ढाल लिये एक अन्य अंकन है, जिन्होंने राजसी पोशाक और लम्बी टोपी धारण की हुई है। ज्ञातव्य की महाराव दुर्जनसाल संवत 1780 से 1813 तक कोटा के नरेश रहे। इस लेख में इस स्थल का नाम मधुपुरगढ़ लिखा गया है। द्वितीय सभी स्तम्भ पर लाल गहरा रंग होने से वह अपठित है। लेख में एक पुरूष और स्त्री क अंकन स्पष्ट है।
 कर्नल जेम्स टाड को इस स्थान से 12वीं सदी का एक प्राचीन लेख प्राप्त हुआ था।8 टाड के वर्णन के अनुसार इसमें राजा नरवर्मन (सन् 1094-1133ई.) (परमार) के पूर्वज सिंधुराज, भोज और उदयादित्य का उल्लेख है। लेख में नरवर्मन के मंत्री हरदेव (हरद्वारा) द्वारा ‘बन्ज’ स्थान पर एक शिव मन्दिर का निर्माण किया था। इस मन्दिर का प्रतिष्ठा समारोह पौष पूर्णिमा, संवत् 1164 (तद्नुसार 1107ईस्वी) को किया गया था। यह हरदेव, महादेव का पुत्र और रूद्रादित्य का पौत्र था। उसने उक्त शिव मन्दिर अपने अधिपति राजा (नरवर्मन) के गौरव हेतु बनवाकर स्वयं को गौरान्वित किया था। इस मन्दिर का निर्माण हरदेव ने अपने स्वयं के निजी कोष से सवा लाख दर्म (मुद्राएँ) व्यय करके करवाया था। कर्नल जेम्स टाड का विचार था कि मधुकरगढ़ नाम बाद में इस ‘बन्ज’ स्थान को दिया गया होगा और तब यह स्थान दक्षिण और उदीच्य क्षेत्र के मध्य स्थित रहा होगा। टाड़ का मानना है कि बन्ज नाम के स्थान की स्थानीयता के बारे में निश्चय नहीं किया जा सकता लेकिन यह माना जा सकता है कि जिस शिव मन्दिर में यह प्रस्तर लेख लगा था वह मधुकरगढ़ से बहुत दूर नहीं था। इस लेख के अन्त में तिथि संवत् 1164 पौष पूर्णिमा अर्थात् अंग्रेजी तिथि अनुसार मंगलवार 3 दिसम्बर 1107ई. निर्धारित की गई और इस तिथि को उस दिन सूर्यग्रहण होना टाड द्वारा बतलाया गया परन्तु इसमें विरोधाभास यह आता है कि पूर्णिमा के दिन जो सूर्यग्रहण बताया गया वह सही नहीं है क्योंकि पौराणिक मान्यता और गणितीय गणना के अनुसार सदैव पूर्णिमा के दिन चन्द्रग्रहण घटित होता है सूर्यग्रहण नहीं। लेखक की इस बारे में मान्यता है कि कर्नल टाड़ द्वारा लिखित इस बात पर विद्वानों में व्यष्टिभावी शोध की संभावना हो सकती है।
 17वीं सदी में बूंदी राज्य के नरेश रावरतन ने कोटा के प्रथम महाराव माधोसिंह हाड़ा को 8 परगने स्वतन्त्र रूप से दिये जिनमें से एक परगना मधुकरगढ़ भी था। कोटा महाराव माधोसिंह (1631-1648ई.) ने फिर मधुकरगढ़ को छोटे नगर के रूप में बसाया और वहाँ की पर्वत श्रेणियों पर विशाल बुर्जयुक्त प्राचीरें बनवाकर उनमें विशाल आवासीय कक्ष और विशाल द्वार तथा मार्ग बनवाये थे, जिनमें कोटा राज्य के सैनिक रहते थे।9 ये सब वास्तुकला की दृष्टि से राजपूत शैली के हैं जो आज भी यहाँ भग्न रूप में दिखाई देते हैं।
 कोटा राज्य का 1761ई. में जब जयपुर राज्य से भटवाड़ा के मैदान में युद्ध हुआ तब कोटा राज्य के सहयोग हेतु इन्दौर के मल्हारराव होल्कर ने अपनी विशाल सेना के साथ इसी मधुकरगढ़ में डेरा डाला था और उक्त युद्ध के समय कोटा महाराव का मंत्री राय अखयराम पंचौली होल्कर को यहीं से सेना सहित भटवाड़ा के युद्ध मैदान में ले गया था।10 राज्यकाल में मालवा से कोटा की ओर आने के दो मार्ग थे, इनमें एक मार्ग मुकुन्दरा घाटी (दरा) होकर और दूसरा मार्ग इसी मधुकरगढ़ से होकर था। परन्तु एक समय ऐसा आया जब इस मार्ग की सुरक्षा और आवागमन की आवश्यकता नहीं रही। यहाँ से सैनिकों को हटा लिया गया। आजादी के बाद रियासतें समाप्त हुई तब इस क्षेत्र की उपयोगिता भी पूरी तरह समाप्त हो गई और यह स्थल पूरी तरह से वीरान हो गया।
 इस प्रकार 12वीं से 17वीं सदी में यह स्थल मधुकरगढ़ 18वीं सदी में मधुपुरगढ़ और वर्तमान में मन्दरगढ़ के नाम से पहचाने जाने वाले इस स्थल पर आज मात्र उक्त चार मन्दिर, खण्डहर महल, सूनसान पथ और चारो तरफ नीरवता है।

 


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