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जिसकी कुलदेवी है, वह हिन्दू है - सांसद डॉ. रावत

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01 May 26
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जिसकी कुलदेवी है, वह हिन्दू है - सांसद डॉ. रावत

आबूरोड। उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने आह्वान किया है कि हम सभी यदि अपनी-अपनी कुलदेवियों के इतिहास को खोजेंगे तब सामने आएगा कि जो आज अलग-अलग जाति में परिभाषित हैं, उनमें कई की कुलदेवियां समान हैं और हम सभी की जड़ें एक हैं। यह खोज भारतवर्ष के सम्पूर्ण समाज के एकात्म स्वरूप को स्वतः प्रतिपादित कर देगी।

सांसद शुक्रवार को यहां आबूरोड में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय तथा सभ्यता अध्ययन केन्द्र नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। ‘भारत की क्षात्र परम्परा’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में सांसद डॉ. रावत ने कहा कि जिसकी भी कुलदेवी हैं, वह हिन्दू है। जनजाति समाज के कटारा गौत्र की कुलदेवी धराल माता है, जिसका अर्थ जो यहां पधारीं और बिराजीं। उनका मूल नाडोल में है जो चौहानों की कुलदेवी भी हैं। ऐसे ही कई जाति-समाज एवं आदिवासी समाज हैं जिनकी कुलदेवियां समान हैं। जब यह पुनर्खोज और पुनर्व्याख्या होगी तब देश के समाजों में स्वतः एकात्म भाव जाग्रत होगा। डॉ. रावत ने यह भी कहा कि इस पुनर्खोज से आर्य आक्रमण सिद्धांत भी खारिज होगा जो मैक्समूलर जैसे तथाकथित इतिहासकार ने हम पर मढ़ दिया। आबू क्षेत्र को क्षात्र परम्परा का प्राचीन आरंभिक स्थल बताते हुए उन्होंने कहा कि मान्यता है कि यहां प्राचीनकाल में यज्ञ हुआ था और उसमें चार क्षात्रधर्मी महापुरुषों ने अग्नि की वेदी के समक्ष समाज व राष्ट्र रक्षण का संकल्प लिया और वहीं से परमार, प्रतिहार, चालुक्य तथा चौहान अग्निकुलों की क्षात्र परम्परा स्थापित हुई। इस मान्यता का संदर्भ आदिवासी लोकगीतों में भी मिलता है। इस पर उन्होंने गहन शोध और सटीक तथ्यों को सामने लाने की आवश्यकता जताई।

उद्घाटन सत्र में विशेष अतिथि शांतिवन के प्रबंधक बीके जगदीश भाई ने कहा कि जैसे जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं शिष्टाचार और आध्यात्मिकता से दूर होते जा रहे हैं। भ्रष्टाचार, दुराचार, पापाचार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि हमनें स्वयं को पहचानने का प्रयास  बंद कर दिया है। जाति-प्रांत में बंट रहे है। हम स्वयं अर्थात आत्मा को पहचानने का प्रयास करें, सभी में एक ही तत्व प्रकट होगा।

विशिष्ट अतिथि जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ साहित्य संस्थान के निदेशक डॉ. जीवन सिंह खरकवाल ने आबू अचलगढ़ क्षेत्र में प्राचीन चंद्रावती नगरी के उत्खनन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहां के प्राचीन निवासियों को भी यहां के भूगर्भीय स्थितियों का ज्ञान था और यही कारण है कि वे नींव में 30-30 सेंटीमीटर की रेती बिछाते थे जो हल्के भूकम्प के झटकों से भवन को सुरक्षित रखती थी। हड़प्पा सभ्यता यहां के ताम्बे का इस्तेमाल करती थी, यहां से लोग हड़प्पा तक तांबा बेचने जाते थे। उन्होंने इस पूरे क्षेत्र के वृहद पुरातात्विक अध्ययन की आवश्यकता जताई। विशिष्ट अतिथि के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. धर्मवीर शर्मा ने भी विचार रखे।

दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुए कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत सभ्यता अध्ययन केन्द्र राजस्थान चैप्टर के संयोजक मनोज जोशी ने किया। विषय प्रवर्तन व संचालन सभ्यता अध्ययन केन्द्र के निदेशक श्री रवि शंकर ने किया तथा आभार सह निदेशक डॉ. विवेक भटनागर ने ज्ञापित किया।

इसके पश्चात दिन भर चले तीन सत्रों में वरिष्ठ इतिहासविद डॉ. प्रताप सिंह तलावदा, प्रताप गौरव केन्द्र के निदेशक अनुराग सक्सेना, डॉ. जिनेन्द्र शास्त्री, अखिलेश शर्मा, बलबीर सिंह चौहान, डॉ. सूरज राव, डॉ. ओमेन्द्र रत्नू, प्रियरंजन प्रसाद सिंह, लव वर्मा, कौशल मूंदड़ा आदि ने विचार प्रस्तुत किए। गोष्ठी में इतिहासविदों ने भारत के प्राचीन गौरवमयी इतिहास को सटीक रूप से नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए इतिहास पुनर्लेखन आयोग के गठन तथा स्कूली पाठ्यक्रम की पुस्तकों में भी बदलाव की आवश्यकता जाहिर की।


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