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पांडुलिपियां विस्मृत पूंजी, उनमें मिल सकती हैं ज्ञान - विज्ञान की थाती

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17 Apr 26
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पांडुलिपियां विस्मृत पूंजी, उनमें मिल सकती हैं ज्ञान - विज्ञान की थाती

उदयपुर। भारत की ज्ञान संपदा उसकी ग्रंथ विरासत में है और अब भी अनेक ग्रंथ और हाथ के लिखी पुस्तकों की सूचना हमें नहीं है। हम हमारी ही निधि और मूल्यवान विरासत से अनभिज्ञ हैं जबकि यह निधि हैं हमें ज्ञान के संसार में अग्रणी बनाती हैं।
यह बात इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने यहां प्रतापनगर स्थित भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण में विश्व विरासत दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में कही। इसमें शहर के केंद्रीय विद्यालय के छात्र छात्राओं की भागदारी रही। मानव विज्ञान सर्वेक्षण के कार्यालय प्रमुख डॉ. श्रीनिलंजन खटुआ ने इस आयोजन के महत्व और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और कहा कि भारत की पहचान ज्ञान गुरु के रूप में रही है।
राजस्थान और विशेषकर मेवाड़ में घर - घर में रही ग्रंथ संग्रह की प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए डॉ. जुगनू ने कहा कि सौ - दो सौ साल और उससे अधिक पुराने ग्रंथ हमारे घरों में सुरक्षित मिल जाते हैं। वे क्या हैं, किस विषय पर हैं और उनमें क्या विशेष है, यह हम बताएंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे ज्ञान का क्षेत्र कितना विराट और व्यापक था। उदयपुर एंटीक पांडुलिपियों का महत्व भी जानता है और यहां आने वाले पर्यटकों, अध्येताओं की इस विरासत पर हमेशा नजर रही है। हमें अपनी ज्ञान विरासत को बचाने और सुरक्षित करने की जरूरत है और सरकार इस दिशा में पिछले सितम्बर से अभियान चला रही है। उन्होंने बच्चों से अनुरोध किया कि वे ज्ञानदूत बनकर आगे आएं। उन्होंने कहा कि यदि किसी संस्था या निजी संग्रह में कोई भी पुरानी पांडुलिपि है तो उसकी सूचना हमें " ज्ञान भारतम " मिशन को देनी चाहिए। सरकार इन दिनों पांडुलिपियों के सर्वेक्षण और पंजीयन का अभियान चला रही है। हम सब इस महत्वपूर्ण अभियान का हिस्सा बनें और अपनी पारंपरिक धरोहर  पांडुलिपियों को संरक्षित और पंजीकृत करने में योगदान दें। यह कदम केवल संरक्षण नहीं अपितु हमारी पहचान और भविष्य को संजोने का एक दायित्व भरा प्रयास है।
इस अवसर पर उन्होंने अनेक लिपियों और भाषाओं में हस्त लिखित पांडुलिपियों के पत्रों का प्रदर्शन भी किया। यही नहीं, मेवाड़ के कीमती धातु पत्रों ताम्रपत्रों, सिक्कों आदि को भी दिखाते हुए विरासत के अनजाने पक्षों पर प्रकाश डाला। संचालन श्री रोमी आनंद ने किया। इसमें संग्रहालय पालक दीपा मंडल, मानव विज्ञानी सुदर्शन ओरांव आदि ने भी भागीदारी की।


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