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अक्षय तृतीया और बाल विवाह: राजस्थान में बदलती तस्वीर, लेकिन चुनौतियां बरकरार

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17 Apr 26
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अक्षय तृतीया और बाल विवाह: राजस्थान में बदलती तस्वीर, लेकिन चुनौतियां बरकरार

गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

राजस्थान में अक्षय तृतीया (आखातीज) केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं,बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। परंपरागत रूप से इस दिन बिना मुहूर्त देखे   "अनपुछे मूहर्त भलो के तेरस के तीज"जैसी कहावत  के साथ इस पवित्र दिन विवाह करने की मान्यता रही है,जिसके कारण राजस्थान में विशेष कर ग्रामीण अंचलों में वर्षों से बाल विवाह जैसी कुप्रथा भी इस अवसर से जुड़ती रही है। हालांकि बीते वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, फिर भी यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और कई चुनौतियां आज भी सामने हैं।

 

सबसे पहले यदि वर्तमान स्थिति पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट है कि सरकार और प्रशासन अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और सजग हों गया हैं। इस वर्ष 2026 में भी अक्षय तृतीया से पहले राज्य सरकार ने विशेष गाइडलाइन जारी कर प्रशासन को अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए हैं। ग्राम स्तर तक निगरानी, 24 घंटे नियंत्रण कक्ष, गुप्त सूचना तंत्र और विभिन्न विभागों के समन्वय से बाल विवाह रोकने की व्यापक रणनीति बनाई गई है। यह दर्शाता है कि अब सरकार केवल औपचारिकता नहीं निभा रही, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है।

 

पिछले वर्षों की तुलना करें तो बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। पहले अक्षय तृतीया पर हजारों की संख्या में सामूहिक विवाह होते थे, जिनमें बड़ी संख्या में नाबालिग बच्चों की शादियां भी शामिल होती थीं। समाज में इसे सामान्य मान लिया गया था और प्रशासन की भूमिका भी सीमित थी लेकिन अब शिक्षा और जन जागरूकता बढ़ने और कानून के सख्त प्रावधानों के कारण ऐसे मामलों में कमी आई है। उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष 2025 में राजस्थान के कई जिलों में प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप कर बाल विवाह रुकवाए, जिससे यह संकेत मिलता है कि बाल विवाह की रोकथाम की दिशा में ठोस प्रयास हो रहे हैं। फिर भी, यह कहना कि समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है, वास्तविकता से दूर होगा। राजस्थान के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आज भी सामाजिक मान्यताएं, आर्थिक कारण और पारिवारिक दबाव बाल विवाह को बढ़ावा देते हैं। कई परिवार गरीबी, सुरक्षा की चिंता और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण कम उम्र में ही बेटियों की शादी कर देना उचित समझते हैं। विशेष रूप से अक्षय तृतीया जैसे अवसर पर, जब विवाह को अत्यंत शुभ माना जाता है, तब यह प्रवृत्ति और अधिक बढ़ जाती है।

 

एक बड़ी चुनौती यह भी है कि बाल विवाह अक्सर छिपकर या रात के समय आयोजित किए जाते हैं, जिससे प्रशासन के लिए उन्हें रोकना कठिन हो जाता है। कई मामलों में समाज के लोग भी इसकी सूचना देने से हिचकते हैं, क्योंकि इसे “परंपरा” का हिस्सा मान लिया गया है। हालांकि सरकार ने गुप्त सूचना और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं शुरू की हैं, फिर भी सामाजिक सहयोग का अभाव एक बड़ी बाधा बना हुआ है। इसके अलावा, पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव और लैंगिक असमानता भी इस समस्या को जटिल बनाते हैं। 

 

जानकार सामाजिक विश्लेषक बताते हैं कि जहां लड़कियों की शिक्षा का स्तर कम है, वहां बाल विवाह की घटनाएं अधिक देखने को मिलती हैं। शिक्षा और जागरूकता के बिना केवल कानून के जरिए इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।हालांकि इसके बावजूद सकारात्मक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पंचायत स्तर पर महिला प्रतिनिधित्व,स्वयंसेवी संस्थाओं की सक्रियता, स्कूलों में जागरूकता अभियान और मीडिया की भूमिका ने इस कुप्रथा के खिलाफ एक सकारात्मक माहौल तैयार किया है। आज पहले की तुलना में अधिक लोग बाल विवाह को सामाजिक बुराई मानने लगे हैं, जो लोगों की मानसिकता में एक बड़ा परिवर्तन है।

 

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राजस्थान में अक्षय तृतीया पर बाल विवाह की समस्या अब पहले जैसी जटिल और व्यापक नहीं रही, लेकिन यह कुप्रथा पूरी तरह से समाप्त भी नहीं हुई है। कानून, प्रशासन और जन जागरूकता के संयुक्त प्रयासों से स्थिति में सुधार जरूर आया है, परंतु सामाजिक सोच में पूरी तरह से बदलाव अभी बाकी है। इसके लिए आवश्यक है कि इस दिशा में निरंतर प्रयास जारी रहें लेकिन केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की भागीदारी के साथ इसको जन आन्दोलन बनाना जरूरी है। 

 

जब तक परंपरा के नाम पर बाल विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिलती रहेगी, तब तक यह समस्या और कुप्रथा एक चुनौती बनी रहेगी। अतः अक्षय तृतीया जैसे पावन अवसर को कुप्रथाओं से मुक्त कर इसे केवल शुभ और सकारात्मक परंपराओं का प्रतीक बनाना ही समय की मांग है।


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