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संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवनधारा है : डॉ. अमृता दुहन

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04 Jun 26
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संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवनधारा है : डॉ. अमृता दुहन

उदयपुर। संस्कृत भारती, उदयपुर विभाग द्वारा आयोजित छह दिवसीय आवासीय संस्कृत भाषा बोधन वर्ग का उद्घाटन समारोह गुरुवार प्रातः विद्यानिकेतन बालिका विद्यालय, सेक्टर-4 में उत्साहपूर्ण एवं संस्कृतमय वातावरण में संपन्न हुआ। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उदयपुर की पुलिस अधीक्षक डॉ. अमृता दुहन, मुख्य वक्ता के रूप में संस्कृत भारती चित्तौड़ प्रांत के प्रांत मंत्री डॉ. मधुसूदन शर्मा तथा अध्यक्षता प्रांत श्लोक केंद्र प्रमुख डॉ. रेनू पालीवाल ने की।

कार्यक्रम का शुभारंभ विशाल शर्मा द्वारा मंगलाचरण तथा अतिथियों के करकमलों से दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। दिव्यांशु चौधरी ने ध्येय मंत्र का वाचन किया तथा मुकेश कुमावत ने प्रेरणादायी गीत की प्रस्तुति दी। अतिथियों का परिचय एवं स्वागत संस्कृत भारती के प्रांत संपर्क प्रमुख डॉ. यज्ञ आमेटा ने किया। मंच संचालन महानगर मंत्री नरेंद्र शर्मा ने किया।

अपने प्रेरक उद्बोधन में मुख्य अतिथि डॉ. अमृता दुहन ने कहा कि किसी भी कार्य को यदि संकल्प शक्ति के साथ किया जाए तो वह सहज एवं सरल प्रतीत होने लगता है। संस्कृत भाषा के विषय में भी सामान्यतः यह धारणा बना ली जाती है कि यह कठिन है, जबकि सीखने का प्रयास करने पर यह अत्यंत सरल, वैज्ञानिक एवं आत्मीय भाषा के रूप में अनुभव होती है। उन्होंने कहा कि संस्कृत हमारे प्राचीन ग्रंथों, भारतीय संस्कृति तथा ज्ञान-विज्ञान की आधारशिला है और इसके अध्ययन से भारतीय चिंतन की मूल धारा तक पहुँचा जा सकता है।

मुख्य वक्ता डॉ. मधुसूदन शर्मा ने संस्कृत भारती के राष्ट्रव्यापी कार्यों का परिचय देते हुए बताया कि संगठन अब तक लगभग एक करोड़ से अधिक लोगों को संस्कृत संभाषण शिविरों के माध्यम से संस्कृत संभाषण सिखा चुका है ।

 उन्होंने कहा कि संस्कृत भारती का ध्येय संस्कृत को केवल अध्ययन की भाषा नहीं, बल्कि व्यवहार की भाषा बनाना है। भाषा बोधन वर्गों के माध्यम से खेल-खेल में, सहज एवं व्यावहारिक पद्धति से संस्कृत सिखाकर समाज को भारतीय ज्ञान परंपरा से पुनः जोड़ने का कार्य किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि विज्ञान, दर्शन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का विशाल ज्ञानकोष है। हमारे शास्त्रों और ग्रंथों में निहित अमूल्य ज्ञान को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है। अंत में उन्होंने कहा कि संस्कृत भारती का कार्य भारत सहित विश्व के 27 देशों में अनवरत रूप से चल रहा है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. रेनू पालीवाल ने संस्कृत भारती द्वारा संस्कृत के संवर्धन एवं प्रसार हेतु किए जा रहे समर्पित प्रयासों की सराहना करते हुए उपस्थित प्रतिभागियों से इस सांस्कृतिक अभियान से जुड़ने का आह्वान किया।

समारोह में विद्या भारती के सह सचिव प्रभात आमेटा, भूपेंद्र शर्मा, चैनशंकर दशोरा, कुलदीप जोशी, डॉ. हिमांशु भट्ट, लारा उपाध्याय, आँचल चौधरी, ईशा पालीवाल, दिव्यांशी पालीवाल सहित अनेक गणमान्यजन एवं वर्ग के शिक्षार्थी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में विभाग संयोजक दुष्यंत नागदा ने आभार व्यक्त किया तथा लक्ष्मण लोहार द्वारा कल्याण मंत्र के साथ उद्घाटन सत्र का समापन हुआ। उद्घाटन समारोह ने प्रतिभागियों में संस्कृत के प्रति नवीन उत्साह, आत्मविश्वास एवं भारतीय संस्कृति के प्रति गौरवबोध का संचार किया।

 *वर्ग में दिनभर रहा संस्कृतमय वातावरण* 

उद्घाटन सत्र के पश्चात वर्ग में विभिन्न शिक्षण एवं संस्कारपरक सत्रों का आयोजन किया गया। प्रातःकालीन सत्र में प्रातःस्मरण एवं योगाभ्यास के माध्यम से प्रतिभागियों ने दिन का शुभारंभ किया। द्वितीय एवं चतुर्थ सत्र में विभक्ति-पाठनम् के माध्यम से संस्कृत व्याकरण के व्यावहारिक पक्ष का अभ्यास कराया गया। तृतीय सत्र में संभाषण प्रशिक्षण के अंतर्गत प्रतिभागियों ने सरल एवं व्यवहारिक संस्कृत वार्तालाप का अभ्यास किया।
भाषा-क्रीड़ा सत्र में सम-विषम संख्या स्मरण, नामस्मरण तथा विभिन्न रोचक गतिविधियों के माध्यम से संस्कृत शिक्षण को आनंददायी बनाया गया। चर्चा सत्र में “संस्कृत का महत्व एवं भारतीय ज्ञान परंपरा में उसका योगदान” विषय पर संवाद हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक अपने विचार व्यक्त किए।
पंचम सत्र में भोजन मंत्र, सरस्वती वंदना एवं कल्याण मंत्र के माध्यम से भारतीय संस्कारों का अभ्यास कराया गया। दिन के अंतिम प्रतिभा-प्रदर्शन सत्र में श्लोक-पाठ प्रतियोगिता, संस्कृत प्रस्तुति एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन हुआ, जिसमें शिक्षार्थियों ने अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। पूरे दिन वर्ग परिसर संस्कृत संभाषण, संस्कार एवं भारतीय सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत रहा।


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