उदयपुर। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर द्वारा प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को आयोजित होने वाली प्रतिष्ठित रंगशाला श्रृंखला के अंतर्गत इस बार शिल्पग्राम स्थित दर्पण प्रेक्षागृह में इंदौर के योगाचार्य, रंगकर्मी, रचनाकार, निर्देशक एवं अभिनेता नीलमाधव वसंत भुसारी द्वारा प्रस्तुत डोक्यू-ड्रामा ‘मैं भी वीर सावरकर – अंश मात्र’ का प्रभावशाली मंचन हुआ। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व बेला में प्रस्तुत यह नाट्य-कृति केवल एक रंगमंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, त्याग और स्वाधीनता चेतना का जीवंत दस्तावेज बनकर दर्शकों के सामने आई।
प्रस्तुति का आरंभ सेल्युलर जेल में गणेश दामोदर सावरकर के उस अमिट वाक्य से हुआ जिसने पूरे सभागार को भाव-विभोर कर दिया—
"यह तीर्थ महातीर्थों का है, मत कहो इसे काला पानी। सुनो, यहाँ की धरती के कण-कण से बलिदान की गाथा फूटती है।"
इसी भावभूमि पर आगे बढ़ते हुए नाटक ने स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर के संघर्ष, चिंतन, राष्ट्रनिष्ठा और अदम्य साहस की ऐसी गाथा प्रस्तुत की जिसने दर्शकों को इतिहास के उन पन्नों तक पहुँचा दिया, जिनसे आज की पीढ़ी का परिचय बहुत सीमित है।
नीलमाधव भुसारी ने इस प्रस्तुति के लिए गहन शोध किया है। सावरकर की कालजयी रचनाएँ ‘सागरा प्राण तळमळला’ और ‘जयोस्तुते’ नाटक की आत्मा बनकर उभरती हैं। मंच पर अभिनय के साथ एलईडी स्क्रीन पर प्रदर्शित दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज, चित्र और वीडियो क्लिप्स ने प्रस्तुति को एक सशक्त डॉक्यूमेंट्री का स्वरूप प्रदान किया।
नाटक में लंदन स्थित इंडिया हाउस, भीकाजी कामा, मदनलाल धींगरा, लोकमान्य तिलक, गुरु गोविंद सिंह की प्रेरणा, नेताजी सुभाषचंद्र बोस तथा डॉ. हेडगेवार जैसे ऐतिहासिक प्रसंगों को प्रभावी ढंग से पिरोया गया। समुद्र में जहाज से कूदने की साहसिक घटना तथा अंडमान की सेल्युलर जेल के मार्मिक दृश्य दर्शकों को उस कालखंड की यातनाओं और संघर्षों से रू-ब-रू कराते हैं।
प्रस्तुति का सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि उसने केवल क्रांतिकारी सावरकर को ही नहीं, बल्कि साहित्यकार, समाज-सुधारक, शिक्षाविद और दूरदर्शी चिंतक सावरकर को भी सामने रखा। अमानवीय यातनाओं के बीच साहित्य सृजन, सहबंदियों को शिक्षित करना, उनमें राष्ट्रभाव जगाना तथा प्रशासन और शिक्षा जगत को अनेक व्यवहारिक शब्द देना—इन सभी पहलुओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ मंचित किया गया। साथ ही जेल से रिहाई के बाद भी सावरकर और उनके परिवार द्वारा झेले गए सामाजिक एवं प्रशासनिक प्रतिबंधों को भी मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया।
नीलमाधव भुसारी का अभिनय ईमानदार, आत्मीय और भावपूर्ण रहा। उन्होंने एकल प्रस्तुति में अनेक पात्रों और परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से जीवंत किया। यद्यपि वॉयस मॉड्यूलेशन तथा मंच के व्यापक उपयोग की दृष्टि से प्रस्तुति में और निखार की संभावनाएँ अवश्य हैं, फिर भी उनकी साधना, विषय के प्रति समर्पण और शोधपरक दृष्टि ने इन सीमाओं को काफी हद तक अप्रासंगिक बना दिया। पार्श्व मंच व्यवस्था विक्रम वडनेरे ने दक्षता के साथ संभाली।
प्रदर्शन के उपरांत पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक डॉ. अश्विन एम. दलवी ने कहा कि वीर सावरकर के विचार और आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में थे। उन्होंने इस नाटक को विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी बताते हुए कहा कि ऐसी प्रस्तुतियाँ राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व और सकारात्मक चेतना का संचार करती हैं।
स्वयं नाट्य रचनाकार और निर्देशक नीलमाधव भुसारी इस प्रस्तुति को एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभियान मानते हैं। उनका उद्देश्य केवल नाटक प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास, त्याग और बलिदान की विरासत से जोड़ना है।
ऐसी सार्थक रंग-यात्राएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को उसकी ऐतिहासिक स्मृतियों से जोड़ते हुए भविष्य के प्रति सजग भी बनाती हैं। आवश्यकता है कि यह मंचीय प्रस्तुति देश के अधिकाधिक नगरों और शिक्षण संस्थानों तक पहुँचे, ताकि युवा पीढ़ी राष्ट्रनिर्माण में अपनी भूमिका को नए दृष्टिकोण से समझ सके।
— विलास जानवे
संस्कृतिकर्मी | रंग समीक्षक | कला एवं संस्कृति चिंतक