- सत्य भूषण शर्मा, उदयपुर [राजस्थान] आज जब तेज़ रफ्तार जीवन में सुविधाएँ हमारे कदमों से पहले दौड़ती दिखाई देती हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने संकल्प की ताकत से यह सिद्ध कर देते हैं कि मंज़िल केवल दूरी से नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति से तय होती है। उदयपुर से भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित पावन तनोट माता मंदिर तक तीन दिनों में 611 किलोमीटर की साइकिल यात्रा ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है, जिसमें राष्ट्रभक्ति, आस्था, फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण एक साथ साकार होते दिखाई देते हैं।

स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर 13 से 15 अगस्त 2026 तक सुधांशु माथुर, छगन माली और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के असिस्टेंट कमांडेंट ध्रुव प्रसाद ने इस कठिन यात्रा को पूरा कर यह संदेश दिया कि सच्चा देशप्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म और अनुशासन में भी झलकता है।

संकल्प जो सीमा तक पहुँचा यात्रा की शुरुआत झीलों की नगरी उदयपुर से हुई। पहले चरण में सुधांशु माथुर और छगन माली ने जोधपुर तक का सफर तय किया। इसके बाद सीमा सुरक्षा बल (BSF) के असिस्टेंट कमांडेंट ध्रुव प्रसाद उनके साथ जुड़े और तीनों ने जैसलमेर होते हुए तनोट माता मंदिर तक अपनी यात्रा पूर्ण की।

यह यात्रा केवल एक साहसिक अभियान नहीं थी। इसका उद्देश्य लोगों में फिटनेस को जीवनशैली का हिस्सा बनाने, पर्यावरण-अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने तथा सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा दिसंबर 2026 में प्रस्तावित "बॉर्डर रन" के प्रति जन-जागरूकता और उत्साह पैदा करना भी था।

तीन चेहरे, एक लक्ष्य चार्टर्ड अकाउंटेंट सुधांशु माथुर पिछले लगभग दो वर्षों से नियमित साइकिलिंग कर रहे हैं और अब तक 17 हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर चुके हैं। उदयपुर-भीलवाड़ा-उदयपुर और उदयपुर-अजमेर-उदयपुर जैसी लंबी यात्राएँ उनके अनुभव को दर्शाती हैं।

व्यवसायी छगन माली इस अभियान के सबसे अनुभवी साइकिलिस्ट रहे। लगभग 70 हजार किलोमीटर की साइकिलिंग यात्रा उनके जुनून की कहानी कहती है। सच पास, डलहौजी तथा मनाली-रोहतांग जैसी कठिन पर्वतीय यात्राएँ उनकी साहसिक पहचान बन चुकी हैं।

ध्रुव प्रसाद, जो सीमा सुरक्षा बल (BSF) में असिस्टेंट कमांडेंट हैं, इस अभियान को एक विशेष राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करते हैं। लगभग सात हजार किलोमीटर की साइकिलिंग के अनुभव के साथ उन्होंने पहले भी दिल्ली से जोधपुर तक 608 किलोमीटर की लंबी यात्रा अपनी नई पोस्टिंग जॉइन करने के लिए पूरी कर मिसाल कायम की थी।

तीन दिन, 611 किलोमीटर यात्रा का प्रत्येक चरण अपने आप में चुनौतीपूर्ण था।

13 अगस्त: उदयपुर से जोधपुर — 235 किलोमीटर 14 अगस्त: जोधपुर से जैसलमेर — 250 किलोमीटर 15 अगस्त: जैसलमेर से तनोट माता — 126 किलोमीटर लगभग 45 डिग्री सेल्सियस तापमान, रेगिस्तानी हवाएँ और लगातार कई घंटों तक पैडल मारते हुए तीनों साइकिलिस्टों ने लगभग 34 घंटे की कुल राइडिंग में अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।

तनोट माता में आस्था और सीमा का सम्मान 15 अगस्त की सुबह जब तीनों साइकिलिस्ट तनोट माता मंदिर पहुँचे, तब यह केवल यात्रा का समापन नहीं था, बल्कि राष्ट्रभक्ति की भावना का उत्कर्ष था।

तनोट माता मंदिर भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित वह ऐतिहासिक आस्था-स्थल है, जहाँ 1965 और 1971 के युद्धों से जुड़ी अनेक प्रेरक कथाएँ लोगों के विश्वास को मजबूत करती हैं। माँ के दरबार में पहुँचकर तीनों ने BSF तथा अन्य सुरक्षा बलों के उन वीर जवानों को नमन किया, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।

फिटनेस के साथ पर्यावरण का संदेश इस पूरी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण संरक्षण भी रहा। 611 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय करके इन युवाओं ने यह संदेश दिया कि स्वस्थ शरीर और स्वच्छ पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं।

जहाँ मोटर वाहन इसी दूरी में उल्लेखनीय कार्बन उत्सर्जन करते हैं, वहीं साइकिल एक ऐसा विकल्प है जो प्रदूषण कम करने के साथ-साथ व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से भी सशक्त बनाती है।

सीमा से समाज तक पहुँचता संदेश दिसंबर 2026 में प्रस्तावित सीमा सुरक्षा बल (BSF) के "बॉर्डर रन " के प्रति जागरूकता फैलाने वाला यह अभियान युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है। यह बताता है कि राष्ट्रभक्ति केवल समारोहों तक सीमित नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन, स्वस्थ आदतों और जिम्मेदार नागरिकता के माध्यम से भी व्यक्त की जा सकती है।

उदयपुर से तनोट माता तक साइकिल के पहियों पर लिखा गया यह सफर आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि जब जुनून के साथ तिरंगा दिल में बस जाए, तब रेगिस्तान की तपती रेत भी मंज़िल तक पहुँचने से रोक नहीं सकती।

यह यात्रा एक संदेश बनकर उभरी है—फिट भारत, सशक्त भारत और सुरक्षित भारत की दिशा में उठाया गया हर छोटा कदम भी राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।