बाँसवाड़ा | ‘‘वर्तमान में सर्वत्र व्यवसायिक मानसिकता का दौर हावी होता जा रहा है और इसने दैवीय और दिव्य विद्याओं को भी नहीं छोड़ा है। आजकल ज्योतिष और कर्मकाण्ड से लेकर सभी भगवदीय पहलुओं में धंधेबाजी का समावेश होता जा रहा है। यह स्थिति समाज और देश के लिए आत्मघाती है और इसके भयंकर दुष्परिणाम आने वाले समय में सामने आएंगे।’’

यह उद्गार प्रसिद्ध ज्योतिर्विद एवं कर्मकाण्डी पण्डित डॉ. भगवतीशंकर व्यास ने बांसवाड़ा के श्री पीताम्बरा आश्रम में ‘‘सनातन धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के संरक्षण एवं संवर्धन’’ विषयक संगोष्ठी में अपना सारगर्भित व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए।

इस अवसर पर गायत्री मण्डल की ओर से कोषाध्यक्ष अनन्त जोशी, चन्द्रेश व्यास, पं. आशीष पण्ड्या (पिण्डारमा) आदि ने पगड़ी एवं शॉल से डॉ. व्यास का सम्मान किया।

शास्त्रोक्त कर्म का परिपालन अनिवार्य

नक्षत्र ज्योतिष एवं शोध संस्थान, उदयपुर के अध्यक्ष डॉ. भगवतीशंकर व्यास ने शास्त्रीय उद्धरण ‘देवा भूत्वा देव यजेत...’ का उदाहरण देते हुए कहा कि इस अनिवार्यता की पूर्ति होनी चाहिए। इसके लिए द्विज मात्र को स्व नित्य कर्म का अवलम्बन प्राथमिक कर्त्तव्य और परमावश्यक तत्त्व है, तभी ब्रह्मत्व एवं ब्रह्मवर्चस्  से आत्म कल्याण और यजमान का मंगल संभव है, अन्यथा कभी नहीं। यही कारण है कि आजकल के अनुष्ठानों में से अधिकांश का कोई फल प्राप्त नहीं हो पा रहा है और पूजा-पाठ एवं अनुष्ठानों के नाम पर धन, श्रम और समय का व्यय व्यर्थ जा रहा है।

उन्होंने कहा कि प्राचीन विद्याओं के प्रति समर्पित होने वालों के लिए यह भी अनिवार्य है कि स्वयं भी साधक बनें, उपयुक्त दैवीय साधना करें। साधक, साधना और साध्य का शास्त्रानुकूल होना नितान्त जरूरी है तभी दैवत्व और देवत्व की सिद्धि सफलता का मार्ग दिखा सकती है। ब्राह्मणों के लिए नित्य षडकर्म, संध्या, ब्रह्मयज्ञ, बलि वैश्वदेव का अवलम्बन, वेदाध्ययन, स्वाध्याय आदि ही उच्च स्थिति और कल्याणकारी दिशा-दृष्टि प्रदान करा सकता है। इसी से हमारी सनातन संस्कृति का संरक्षण हो सकेगा।

आचरण शुद्ध हों

पौरोहित्य कर्म के निष्णात विद्वान् डॉ. भगवतीशंकर व्यास ने कर्मकाण्ड एवं पौरोहित्य कर्म में नैष्ठिक शुचिता और निर्मलता की अहम् भूमिका पर जोर दिया और कहा कि इस क्षेत्र से संबंधित विप्रवरों द्वारा पूजन-अर्चन और अनुष्ठानों की सार्थकता तभी है जब इनमें दैवत्व और दिव्यत्व का समावेश हो और आचरण एवं उपयोग में निष्काम मंगलकारी भावना समाहित हो।

धंधेबाजी आत्मघाती व्यवहार

उन्होंने कहा कि ऋषि-मुनियों की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए प्राच्यविद्याओं को बेचने और इसे धनार्जन का स्रोत बनाने की बजाय निष्काम कर्मयोग के साथ आगे आना होगा, नई पीढ़ी में इन विद्याओं का संवहन करना होगा, तभी राष्ट्र विश्व गुरु का परम वैभव प्राप्त कर सकेगा। इसके लिए सनातनी बच्चों को धर्म कर्म का नियमित ज्ञान और प्रशिक्षण प्रदान करने के सामूहिक प्रयास करने होंगे।

डॉ. व्यास ने लोढ़ी काशी की संज्ञा प्राप्त वागड़ को विद्वानों की खान बताते हुए कहा कि इनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अंचल में सनातन संस्कृति और वैदिक धर्म की परम्पराओं को समृद्ध करने के लिए समर्पित भाव से जुटना होगा।

ईष्ट साधना की ओर मोड़ें

ज्योतिष पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पंचम भाव पूर्वजन्म का है, प्रारब्ध का है, इसमें से जातक को बुरे प्रारब्ध को भोगना ही पड़ता है। पूजा-पाठ और मंत्र-तंत्र आदि विधानों से इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। इसे आंशिक ही कम किया जा सकता है। इस स्थिति में जातक का बहुविध कल्याण चाहने के लिए इसे ईष्ट की आराधना की ओर मोड़ें, तभी ग्रह साधना का फल भी प्राप्त हो सकता है।

उन्होंने गायत्री मण्डल के धर्म अध्यात्म विषयक प्रयासों की सराहना करते हुए इन कार्यों को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। इससे पूर्व उन्होंने आश्रम में श्री विग्रहों के दर्शन किए।

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