भीलवाड़ा। ‘ओम शांति, शांति, शांति जिनेश्वर शांति करो, सभी जीवों को सुखी करो’ हमारी परंपरा में प्रचलित ऐसा मंगल जाप है, जिसमें व्यक्ति की साधना आत्मशांति से आगे बढ़कर समस्त जीवों के सुख और कल्याण की मंगलकामना से जुड़ती है। यह बात शांतिभवन में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि जी ने आयोजित सामूहिक ‘ओम शांति’ जाप का महत्व श्रद्धालुओं को बताते हुए कही। उन्होंने कहा कि तीर्थंकर परमात्मा अनंत चतुष्टय को प्रकट करने की सामर्थ्य रखने वाले हैं। ऐसे परमात्मा की देशना जिनवाणी के प्रति श्रद्धा और आस्था जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करती है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि ‘ओम शांति’ हमारी परंपरा में चला आ रहा पारंपरिक जाप है, जिसे केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि उसके आध्यात्मिक भाव को समझकर करना चाहिए। ‘ओम’ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में प्रणव के रूप में प्रतिष्ठित है। इसके साथ ‘शांति’ का स्मरण साधक को अपने भीतर की ओर उन्मुख करता है और मन में उठने वाले आवेगों के शमन की दिशा में प्रेरित करता है।
शांति का अर्थ केवल बाहरी वातावरण का शांत होना नहीं है। क्रोध, मान, माया, लोभ और अन्य कषाय जब भीतर अशांति उत्पन्न करते हैं, तब उन आवेगों का शमन ही वास्तविक शांति है। जिस प्रकार पीड़ा का उपचार होने पर वेदना शांत होती है, उसी प्रकार कषायों का प्रभाव क्षीण होने पर भीतर शांति का अनुभव होता है। वास्तविक शांति परिस्थितियों के बदलने से नहीं, अपने भावों को साधने से प्राप्त होती है।
भगवान शांतिनाथ के नाम की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि परमात्मा के नाम में भी विशेष सामर्थ्य है। संसार के संताप से व्याकुल जीव के लिए परमात्मा का नाम उसी प्रकार शीतलता प्रदान करता है, जैसे प्रचंड गर्मी से संतप्त पथिक को कमल-सरोवर से आती शीतल हवा राहत देती है। श्रद्धा से किया गया नामस्मरण मन को एकाग्र करता है और साधक को भीतर से संभलने का संबल देता है। हमारे पूर्वाचार्यों ने परमात्मा के नाम, गुण और स्तवन की महिमा को गहराई से स्वीकार किया है। नामस्मरण की सार्थकता केवल शब्दों के उच्चारण में नहीं, बल्कि श्रद्धा और भावना में है। जाप की लय मन को एकाग्र करती है और सामूहिक जाप साधकों को एक मंगलभाव में जोड़ता है। श्रद्धा, लय और भावना का यह समन्वय जाप को साधना का स्वरूप प्रदान करता है।
आत्मिक शांति की साधना के संदर्भ में उन्होंने कहा कि संसार की अशांति को शांत करने की शुरुआत स्वयं के भीतर से करनी होगी। अपने भीतर उठने वाले भावों को पहचानना और उन्हें संयमित करना मनुष्य के हाथ में है। क्रोध के स्थान पर क्षमा,द्वेष के स्थान पर मैत्री, लोभ के स्थान पर संतोष और अहंकार के स्थान पर विनय का भाव विकसित करना ही आत्मिक शांति की दिशा में वास्तविक पुरुषार्थ है।
उन्होंने बताया जैन धर्म की मंगलकामना केवल अपने सुख तक सीमित नहीं है। जिनेश्वर शांति करो, सभी जीवों को सुखी करो’ में जीवमात्र के प्रति करुणा और मंगलभाव की व्यापक भावना है। जब भावना अपने सुख से आगे बढ़कर प्रत्येक जीव के मंगल तक पहुंचती है, तब आराधना का वास्तविक विस्तार होता है।
जाप की सार्थकता को जीवन से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि ‘ओम शांति’ का स्मरण तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव मनुष्य के जीवन और व्यवहार में दिखाई दे। यदि जाप के बाद भी मन में क्रोध, द्वेष और अशांति बनी रहे, तो साधक को अपने भावों की ओर देखना होगा। जाप की परिणति मन की निर्मलता, वाणी की मधुरता, व्यवहार की सहजता और जीवमात्र के प्रति मैत्री में होनी चाहिए। अपने भीतर के कषायों के शमन का पुरुषार्थ और समस्त जीवों के लिए मंगल की भावना इन दोनों का समन्वय ही ‘ओम शांति’ जाप की वास्तविक साधना है। शांति की शुरुआत अपने अंतर्मन से होकर समस्त जीव जगत तक पहुंचे, प्रत्येक हृदय में मंगलभाव जागृत हो और प्रत्येक जीव सुख को प्राप्त करे यही इस पारंपरिक जाप की सार्थकता है।
शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि सामूहिक ओम शांति’ जाप में चातुर्मासार्थ विराजित यशोदिप्ती मधुकंवरजी उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी,महासती सुचेता जी साध्वी प्रियदर्शनाजी आदि साध्वीवृंद सहित शांतिभवन के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।इस अवसर पर नवदीक्षित महक ऋषिजी के जन्मदिवस पर उपस्थित साधु-साध्वीवृंद एवं श्रद्धालुओं ने उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।
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आत्मशांति से सर्वजीव मंगल तक की साधना है ‘ओम शांति’ जाप : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी
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