भीलवाड़ा। भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शुक्रवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन में मोक्ष, आत्मा, शरीर एवं धर्म साधना के महत्व पर विस्तार से विचार रखे। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मेन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि वे मोक्ष की साधना कर रहे हैं, लेकिन उसका फल कब प्राप्त होगा, यह ज्ञात नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके मन की एकमात्र प्रार्थना है कि उन्हें विदेह क्षेत्र में जन्म मिले और वे अपनी आंखों से एक बार सीमंधर भगवान एवं तीर्थंकर के दर्शन कर सकें। उन्होंने कहा कि जीवित तीर्थंकर के दर्शन करना ही उनके जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल में तीर्थंकर जैसा होना संभव नहीं है। जिस दिन तीर्थंकर की कृपा होगी और उनकी दृष्टि पड़ेगी, उसी दिन मोक्ष के द्वार खुल जाएंगे।
मानव देह आत्मा के लिए किराए का मकान
आचार्यश्री ने कहा कि मानव शरीर आत्मा के लिए किराए के मकान के समान है, जिसे एक दिन खाली करना ही पड़ता है। व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली और बलशाली क्यों न हो, उसे एक दिन देह का त्याग करना ही होगा।
उन्होंने कहा कि जब तक शरीर में शक्ति रहती है, आत्मा उसका साथ निभाती है और शरीर के निर्बल होने पर आत्मा दूसरी देह धारण कर लेती है। आत्मा शरीर के माध्यम से ही योग और भोग करती है। शरीर में शक्ति रहने पर ही तप, साधना और धार्मिक कार्य संभव हैं। इसलिए जब तक शरीर साथ दे रहा है, तब तक अधिक से अधिक धर्म साधना कर लेनी चाहिए, क्योंकि बाद में अवसर मिलना कठिन हो सकता है।
स्वाध्याय हमें देव, शास्त्र और गुरु से जोड़ता है
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि इस युग में शुद्धोपयोगी मुनि होना संभव नहीं है, लेकिन शुभोपयोगी मुनि श्रावक से हर दृष्टि से श्रेष्ठ होते हैं। ऐसे मुनि शुभ ध्यान करते हैं और समाज एवं परिवारों को संस्कार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि स्वाध्याय वही है जो हमें देव, शास्त्र और गुरु से जोड़ता है। जो हमारी आस्था को तोड़ने का कार्य करे, वह स्वाध्याय नहीं हो सकता।
उन्होंने बताया कि भगवान महावीर शुभोपयोगी मुनि बनने का अधिकार प्रदान करते हैं। ऐसे मुनि प्रतिदिन एक बार भोजन, दो बार प्रतिक्रमण, तीन बार सामायिक और चार बार स्वाध्याय करते हैं। उन्होंने कहा कि विनम्रता साधुता की पहचान है।
आचार्यश्री ने कहा कि मुनि का कर्तव्य है कि श्रावक का मन न बिगड़े और श्रावक का कर्तव्य है कि मुनि का तन न बिगड़े। उन्होंने कहा कि मुनि को श्रावक के मन की और श्रावक को मुनि के तन की चिंता करनी चाहिए।
16 से 25 सितंबर तक होगा पर्युषण साधना शिविर
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितंबर तक सूर्यमहल में आयोजित होगी। इस दौरान दस दिवसीय ‘पाप नाशनम’ साधना शिविर भी आयोजित किया जाएगा, जिसके लिए अब तक सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं पंजीयन करा चुके हैं।
प्रवचन के प्रारंभ में दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य सीकर निवासी हीरालाल आदित्य जीविक रारा परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।
चातुर्मासिक प्रवचन प्रतिदिन सुबह 8:30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में आयोजित हो रहे हैं। वहीं शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।