*दिनांक 14 व 15 नवम्बर, 2025 राजकीय महाविद्यालय जायल के इतिहास में इस रूप में अमिट इतिहास बन गईं कि इस छोटे क़स्बे के छोटे से महाविद्यालय में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए 100 से भी अधिक विद्वान प्रोफेसर, शोधार्थी और विद्यार्थी Literature, Society and Political Consciousness विषय पर चिंतन-मनन के लिए एकत्रित हुए । अवसर था, Rajasthan Association for Studies in English के 22वें दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का । 14 नवम्बर, 2025 को प्रातः प्रोफेसर डॉ. मंजू जी बाघमार, माननीय राज्य मंत्री, महिला एवं बाल विकास एवं लोक निर्माण विभाग, राजस्थान सरकार के मुख्य आतिथ्य में उद्घाटन सत्र आयोजित हुआ । इस सत्र में बोलते हुए प्रोफेसर बाघमार ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और उसमें समाज को बदलने की ताक़त होती है । उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधी, भगतसिंह, अम्बेडकर और सावरकर द्वारा रचे गए साहित्य का हवाला देते हुए कहा कि, यह साहित्य जनता में राजनीतिक चेतना पैदा करने वाला था। राजनीतिक चेतना का अर्थ केवल चुनावों में भाग लेने तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीतिक चेतना का अर्थ है अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का भान। उन्होंने इस सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए महाविद्यालय की पूरी टीम को बधाई दी और भूरि-भूरि प्रशंसा भी की । उद्घाटन समारोह की मुख्य वक्ता के रूप में राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के राजनीति शास्त्र विभाग की पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान विश्वविद्यालय महिला संगठन की अध्यक्ष, गांधीय चिंतक प्रोफेसर डॉ. आशा कौशिक ने Politics, Aesthetics and Culture पर व्याख्यान देते हुए कहा कि साहित्यकार का सृजन उसके विचार बोध से प्रेरित होता है और विचार बोध राजनीतिक आस्थाओं, मूल्यों और प्रतिबद्धताओं का उत्पाद होता है इसलिए हर साहित्य , विशेषकर समाज परिवर्तन से जुड़ा युगीन साहित्य किसी ना किसी राजनीतिक विचार से अभिप्रेरित होता है । उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद लिखे गए अनेक साहित्य के हवाले से कहा कि गांधी उस साहित्य के केंद्र में हैं । इस कालखंड का भारत का साहित्य या तो गांधी के चिंतन से प्रभावित रहा या वह गांधी के विचारों की प्रतिक्रिया में लिखा गया । उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी दिनकर से लेकर मुल्कराज आनंद , अरुंधति राय व अलका सरावगी तक के उदाहरण प्रस्तुत किए । सत्र की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के अंगरेजी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ राजुल भार्गव ने कहा कि कोई भी साहित्य चेतना शून्य नहीं होता । उन्होंने अंगरेजी साहित्य से अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्य सोए हुए समाज को जगाता है । इससे पूर्व सत्र का शुभारंभ सरस्वती जी के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्वलन से हुआ । राष्ट्रगीत वंदे मातरम् का गान हुआ । प्राचार्य डॉ. पयोद जोशी ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि राजनीति और साहित्य का गहरा संबंध रहा है और राजनीति साहित्य से चेतना प्राप्त करती रही है । RASE के उपाध्यक्ष डॉ. हेमेन्द्र सिंह चंडालिया ने कहा कि बेहतर साहित्य का स्रोत विश्व और मानव कल्याण की चेतना है । संगठन के महासचिव डॉ. कंग ने संगठन का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया । आयोजन सचिव डॉ. सीमा सोनी ने आयोजन की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की । इस अवसर पर जायल के समीप क़स्बे के निवासी राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री लक्ष्मण दास कविया का सम्मान किया गया । संचालन डॉ. अनंत दाधीच व डॉ. रूखसाना सैफी ने किया ।
उद्घाटन सत्र के उपरांत पहले प्लेनरी सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के अंगरेजी विभाग के प्रोफेसर व प्रसिद्ध साहित्यकार संजीव कौशल ने एस. एन. जोशी स्मृति व्याख्यान देते हुए कहा कि अ-राजनीतिक होना सबसे बड़ी राजनीति है। दरअसल राजनीति के बिना कुछ भी संभव नहीं है, साहित्य भी नहीं । दूसर प्लेनरी में दिल्ली विश्वविद्यालय के ही प्रोफेसर अमित सोनी ने अंगरेजी भाषा के विभागों की राजनीति की चर्चा की । प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अनंत भटनागर ने प्रतिबंधित साहित्य पर विस्तार से प्रकाश डाला । डॉ. राजेश चौधरी ने बालमुकुंद अग्रवाल के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लिखे साहित्य पर चर्चा प्रस्तुत की। गुजरात से अंगरेजी साहित्य के प्रोफेसर व कवि डॉ. गोपाल शर्मा ‘ सहर’ ने कहा कि साहित्य दमन और अत्याचार के विरूद्ध तीव्र प्रतिक्रिया करता है, वह प्रतिरोध रचता है । इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. घासीराम चौधरी व सह अध्यक्षता डॉ. बनय सिंह ने की ।
इसके बाद लगातार समांनांतर छह तकनीकी सत्र हुए । सायंकाल में महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जिसमें मनीषा व साथियों द्वारा प्रस्तुत क़व्वाली “ हम गाँव के रहने वाले हैं, शहरों की नज़ाकत क्या जाने “ को बहुत पसंद किया गया । चिरमी और लीलण नृत्य प्रस्तुत किए गए । प्रोफेसर संजीव कौशल , डॉ. गोपाल शर्मा ‘सहर’, डॉ. हेमेन्द्र चंडालिया, डॉ . देवेन्द्र रांकावत, डॉ. पयोद जोशी ने अपनी कविताओं से समाँ बाँध दिया ।
दूसरे दिन प्रातः कालीन सत्रों में पुनः तकनीकी सत्र और ऑनलाइन प्रजेंट्शन हुए। तदोपरांत तीसरा प्लेनरी सत्र आयोजित हुआ जिसमें जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर की प्रोफेसर राजश्री राणावत ने अंगरेजी साहित्य रचना पर वैचारिक प्रभावों का उल्लेख किया । डॉ. के. एस. कंग ने जीन ऑस्टिन के साहित्य पर विस्तार से प्रभाव डाला । राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के राजनीति शास्त्र के सहायक आचार्य डॉ. राहुल चौधरी ने रवीन्द्र नाथ टैगोर के राष्ट्रवाद संबंधी विचारों का विश्लेषण प्रस्तुत किया । इस सत्र की अध्यक्षता बीकानेर विश्वविद्यालय में अंगरेजी की प्रोफेसर सीमा शर्मा ने की ।
दोपहर बाद सम्मेलन का समापन सत्र आयोजित हुआ । इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रसिद्ध पत्रकार श्री त्रिभुवन ने कहा कि राजनीतिक चेतना को कुंद करने के लिए मिथक गड़े गए । उनका कहना था कि महाभारत कथा का सार युद्ध के प्रभावों को समझने के लिए पर्याप्त है । महाभारत को घरों से दूर कर युद्ध के दुष्परिणामों से आम जनमानस को सचेत नहीं होने दिया गया । मुख्य वक्ता के रूप में राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के राजनीति शास्त्र विभाग के सहायक आचार्य डॉ. लाधूराम चौधरी ने कहा कि साहित्य में जो कुछ कहा नहीं जाता और छुपा लिया जाता है, वह छुपा हुआ ही सत्य होता है । यह छुपा लिया जाना ही सबसे बड़ी राजनीति है। उन्होंने साहित्य के अनेक उदाहरण देकर कहा कि भारत में निम्न जातियों के प्रति घृणा को तो अभिव्यक्ति दी गई किंतु उनकी समस्याओं को छुपा लिया गया । इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि उपखंड अधिकारी, जायल श्री रजत ने जायल में अंतरराष्ट्रीय स्तर के अकादमिक आयोजन की सफलता को महत्वपूर्ण बताया । उन्होंने कहा कि साहित्य जन समस्याओं को सामने लाकर उन्हें सुलझाने में सहयोग करता है । साहित्य के ज़रिए चैतन्य समाज अपने अधिकारों के साथ- साथ अपने कर्तव्यों को भी समझता है । सत्र की अध्यक्षता करते हुए जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के अंगरेजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश कुमार हरित ने अंगरेजी साहित्य के अनेक साहित्यकारों के हवाले से कहा कि अंतिम सत्य कुछ नहीं होता । सत्य समय सापेक्ष होता है इसलिए एक ही साहित्यकार के अलग-अलग समय व संदर्भ में रचे गए साहित्य में विरोधाभास दिखाई देता है । इससे पूर्व समापन सत्र के आरंभ में डॉ. अमित कुमार यादव ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया जबकि आयोजन सचिव डॉ. सीमा सोनी ने सम्मेलन की दो दिन की गतिविधियों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया । प्राचार्य डॉ. पयोद जोशी ने सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए महाविद्यालय के सभी शैक्षणिक व सह शैक्षणिक अधिकारियों-कर्मचारियों के सामूहिक प्रयासों की सराहना की जबकि स्थानीय प्रशासन, भामाशाहों , नागरिकों, मीडिया व विद्यार्थियों के भरपूर सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया । सहायक आचार्य श्री विजय कुमार ने औपचारिक धन्यवाद दिया । सत्र का संचालन डॉ. अनंत दाधीच ने किया ।
सम्मेलन के विभिन्न तकनीकी सत्रों में डॉ. अनंत दाधीच, डॉ. जी. के. सुखपाल, डॉ. गौतम शर्मा, डॉ. सुमेर सिंह, डॉ. गोपाल शर्मा ‘सहर’ , डॉ. हरिराम परिहार, डॉ. कैलाश सामोता ने अध्यक्षता की जबकि ऑनलाइन प्रजेंटेशन का संचालन डॉ. अबरार ने किया । यह सम्मेलन की सफलता रही कि तीन प्लेनरी सत्रों में 9 महत्वपूर्ण व्याख्यान हुए जबकि ऑफ़लाइन तकनीकी सत्रों में 65 व ऑनलाइन तकनीकी सत्रों में 45 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए । सम्मेलन में कैमरून, सऊदी अरब व बांग्लादेश से भी सहभागिता रही ।
सम्मेलन के आयोजन में आयोजन सचिव डॉ. सीमा सोनी के अतिरिक्त पेट्रॉन डॉ. राजमोहन मीणा , सहायक आचार्य, प्राणीशास्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही जिन्होंने वित्तीय आय- व्यय को सहायक लेखाकार श्री सुखदेव डिडेल के सहयोग से सँभाला । सम्मेलन के समन्वयक श्री विजय कुमार अरोड़ा , सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र ने सहायक आचार्य , संस्कृत श्रीमती सुनिता प्रजापत के साथ मिलकर भोजन की सम्पूर्ण व्यवस्था को सँभाला । सहायक आचार्य, भौतिक शास्त्र श्री सुनील कुमार मीणा व प्रयोगशाला सहायक श्री सुरेन्द्र ने तकनीकी व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित किया । सहायक आचार्य , रसायन शास्त्र डॉ. अमित कुमार यादव व श्री विक्रम कुमार, सहायक आचार्य, गणित ने आवास संबंधी व्यवस्था को संचालित किया । इस कार्य में प्रयोगशाला सहायक श्री कानाराम सिंवर का महत्वपूर्ण सहयोग रहा । श्रीमती सरला , सहायक आचार्य, हिन्दी व प्रयोगशाला सहायक श्रीमती सुमन ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों व मंच की व्यवस्थाओं को सँभाला । सहायक आचार्य, राजनीति शास्त्र श्री विजय कुमार ने आवागमन , परिवहन व आवास व्यवस्था में उल्लेखनीय सहयोग दिया ।कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी श्री चौथाराम ने टेंट सहित सामग्री प्रबंधन में सहयोग किया । विद्या संबल के साथी आचार्य डॉ. धनेश शर्मा ने अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई ।
यह आयोजन स्थानीय भामाशाहों के सहयोग के बिना संभव नहीं था । आयोजन में JSW CEMENT, वीर तेजा कॉलेज के श्री भोमसिंह , जायल व्यापार मंडल के श्री राधेश्याम जी बासठ, श्री कैलाश सारडा, श्री सुखदेव चोयल, जायल विकास समिति के श्री रामस्वरूप कांकाणी, श्री रमेशचन्द्र कांकाणी, श्री बेणुगोपाल रतावा, श्री रामप्रसाद जी मरूधर जायल, गुरुकुल महाविद्यालय, खिंयाला, श्री राहुल मिर्धा महाविद्यालय,दरियाई मिष्ठान भंडार, नागौर , बालाजी फर्नीचर, दधिमति फोटोस्टेट आदि का अतुलनीय सहयोग मिला।
स्थानीय मीडिया के श्री भँवर सिंह जी व रमेशचन्द्र जी ने मीडिया कवरेज से आयोजन को ऊँचाई प्रदान की। स्थानीय प्रशासन का विशेष सहयोग रहा ।
इस प्रकार जायल जैसी छोटी किन्तु हौंसलों की धरती पर यह अकादमिक आयोजन अविस्मरणीय व ऐतिहासिक रहा।
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