लय, ताल और संस्कृति से सुसंस्कृत व्यक्तित्व गढ़ती हैं भारतीय कलाएँ — सारंगदेवोत
“भारतीय कलाएँ—मन की प्रसन्नता और जीवन की संतुलित लय का आधार”
उदयपुर। जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ एवं अकादमी ऑफ वेलबीइंग समिति के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय पारंपरिक कला एवं नृत्य महोत्सव का शुभारंभ शुक्रवार को लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के सभागार में हुआ। महोत्सव की शुरुआत माँ सरस्वती के वंदन के साथ ख्यातनाम ओडिसी नृत्यांगना शैली श्रीवास्तव की विशेष प्रस्तुति से हुई। इसके उपरांत अतिथियों ने पूर्व डीआईजी प्रीता भार्गव द्वारा निर्मित पोस्टर का विमोचन किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य एवं कलाओं की विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये कलाएं सृजनात्मकता के साथ संवेदनशीलता, अनुशासन, एकाग्रता और सांस्कृतिक चेतना को गहनता प्रदान करती हैं। उन्होंने बताया कि नृत्य की लय, ताल और भावाभिव्यक्ति विद्यार्थी के मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास, सौंदर्य-बोध तथा व्यक्तित्व की गरिमा को सुदृढ़ करती हैं। इन कलाओं के अभ्यास से विद्यार्थियों में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति स्वाभिमान और गहरा जुड़ाव विकसित होता है, जो उन्हें समाज और परंपरा से समन्वित मूल्यनिष्ठ व्यक्तित्व बनाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय कलाएँ मन में सहज आनंद, शांति और सकारात्मकता का संचार करती हैं, जिससे जीवन अधिक सौम्य और समन्वित बनता है। इन कलाओं का अभ्यास व्यक्ति को भीतर से प्रफुल्लित करते हुए खुशियों की संवेदनशील और स्थायी अनुभूति प्रदान करता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. हेमंत द्विवेदी ने विविध कला-रूपों तथा उनके मानस पटल पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर अपने विचार साझा किए।
विद्यापीठ के कुल प्रमुख एवं कुलाधिपति बी.एल. गुर्जर ने भारतीय समाज और जनमानस में रची-बसी कलाओं की विशिष्टता और उनके सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।
आयोजन सचिव एवं अधिष्ठाता-प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग ने स्वागत उद्बोधन में परफॉर्मिंग आर्ट्स को सृजन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बताते हुए इसके व्यापक प्रभावों और महत्व को रेखांकित किया।
महोत्सव के प्रथम दिवस में पूर्व डीआईजी प्रीता भार्गव की ऑयल पेंटिंग प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। इसके बाद ज्योति श्रीवास्तव और गुरु सिद्धार्थ किशोर की नाद प्रस्तुतियों ने वातावरण को संगीत-रस से सराबोर किया। साथ ही शास्त्रीय नृत्यों की मनोहारी प्रस्तुतियों के साथ कलारिपयट्टू मार्शल आर्ट का परिचय और प्रदर्शन भी हुआ, जिसे दर्शकों ने अत्यंत सराहा।
इस अवसर पर डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. गायत्री तिवारी, डॉ. रचना राठौड़, डॉ. बलिदान जैन, डॉ. भूरालाल श्रीमाली सहित शहर के प्रख्यात कलाकार, गणमान्य नागरिक, विद्यार्थी और संकाय सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चौबीसा ने किया किया जबकि आभार डॉ. वीनस व्यास ने जताया।
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सांस्कृतिक समरसता का उत्सव : विद्यापीठ में दो दिवसीय पारंपरिक कला एवं नृत्य महोत्सव का शुभारंभ
शास्त्रीय कलाएँ विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं — प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत
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