राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय की अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ राजस्थान (उच्च शिक्षा) की स्थानीय इकाई के तत्वावधान में जनजाति गौरव दिवस के उपलक्ष्य में "जनजाति गौरव: आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मानबिंदु" विषयक व्याख्यान महाविद्यालय के पन्नाधाय सभागार में आयोजित हुआ।

 मुख्य वक्ता डॉ. सुनील खटीक, सह प्रांत प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चित्तौड़ प्रांत एवं सहायक आचार्य आर्थिक प्रशासन एवं वित्तीय प्रबंध थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बिरसायत पंथ एवं संप सभा सनातन की ही धाराएं है। सनातन की हर पंथ परंपरा के उपदेश सनातन धर्म के सत्य, करूणा, शुचिता व तपस पर आधारित है।

 समस्त विचार-प्रस्थानों में एकात्मता एवं समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। 

मुख्य वक्ता ने भगवान बिरसा मुंडा एवं गोविन्द गुरू ने मिशनरीज गतिविधियों को चुनौति मानकर समानांतर आध्यात्मिक धारा पर भी काम किया। जनजाति समाज में पूर्वजों से मिली सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना का जागरण किया।

मुख्य वक्ता ने कहा कि भगवान बिरसा ने उलगुुलान के पहले क्रम में अभावों को आधार बनाकर छलपूर्वक थोपे गये मत का त्याग किया और आदिपंथ को आत्मसात किया। वे स्वधर्म व स्वराज्य के लिए संघर्ष करते हुए बलिदान हुए।

 भगवान बिरसा मुंडा ने अपनी सनातन पूजा पद्धति, नशामुक्ति, तुलसी पूजा, नित्यपाठ एवं उलगुलान क्रांति को सुदृढ़ कर हिंदुत्व एवं सनातन धर्म को सुप्रतिष्ठित किया। इसी प्रकार मुख्य वक्ता ने दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के मानगढ़ धाम के संदर्भ में जनजाति संत श्री गोविंद गुरु के जीवन प्रसंगों को भगवान बिरसा मुंडा के सिद्धांतों एवं व्यवहारों के साथ जोड़ा और यह स्थापित किया कि जनजाति अंचल की आध्यात्मिक चेतना एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण उन्हे सनातन समाज के अंग के रूप में एक सूत्र में बांधती है। अपने व्याख्यान में मुख्य वक्ता ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि  पाठ्यक्रम समितियों और बुद्धिजीवियों ने लंबे समय तक भारतवर्ष के जनजाति अंचल की महान विभूतियों के व्यक्तित्व और क्रांतियों को भारतीय जनमानस से प्रयासपूर्वक दूर रख विदेशी नायकों को थोपकर अपने औपनिवेशिक मानसिकता का परिचय दिया।

मुख्य वक्ता डॉ खटीक ने कहा कि गवरी एक कला नहीं है, बल्कि यह एक साधना है जिसमें कला व व्रत का संयोजन है। शिव, शक्ति व प्रकृति का उपासक जनजाति समाज सामाजिक रूप से संपन्न रहा है। परंपरागत रूप से गवरी के सवा माह में व्रत पालन करना एक शिखर स्तर की आस्था है। जहां सम्मान स्वरूप पुरा सनातन समाज एकत्रित होता है।

अंत में मुख्य वक्ता डॉ खटीक ने मावजी महाराज, सुरमाल दास जी, गोविन्द गुरू, बिरसा मुण्डा, वेगड़ाजी भील, राणा पुंजा सहित  जनजाति समाज में चेतना लाने वाले सभी आध्यात्मिक गुरूओ व नायकों का स्मरण किया। 

 इस अवसर पर महाविद्यालय प्राचार्य एवं इकाई अध्यक्ष प्रो. दीपक माहेश्वरी ने अपने वक्तव्य में बिरसा मुंडा एवं संत श्री गोविंद गुरु के आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान किया । इकाई सचिव प्रो. कुमुद इंटोदिया ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इकाई सहसचिव डॉ. प्रहलाद धाकड़ ने कार्यक्रम का संचालन किया ।  इस कार्यक्रम में प्रदेश, विभाग एवं जिला स्तरीय दायित्ववान पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं, के साथ महाविद्यालय के संकाय सदस्यों सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
 

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