गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2014 में केन्द्र की सत्ता संभालने के बाद से ही मुगल और ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के प्रतीक चिन्हों को हटा कर भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक आदर्श महापुरुषों की प्रतिमाओं और उनके नाम से भवन,सड़क और स्मारक स्थापित करने की परम्परा शुरू हुई। 23 फरवरी सोमवार को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारत के प्रथम गवर्नर जनरल सी.राजगोपालाचारी की प्रतिमा का लोकार्पण किया। यह प्रतिमा ब्रिटिश इंजीनियर एडविन लुटियंस की प्रतिमा वाले स्थान पर लगी है यानी आजादी के करीब 80 वर्ष बाद ब्रिटिश इंजीनियर की प्रतिमा को राष्ट्रपति भवन से हटाया गया है। 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 फरवरी रविवार को मन की बात के 131 वें संस्करण में इस बात का संकेत दिया था। साथ ही इस बात पर खेद प्रकट किया था  कि ब्रिटिश इंजीनियर की प्रतिमा अभी तक भी राष्ट्रपति भवन में लगी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति भवन में राजाजी उत्सव मनाया जा रहा है तथा भारत के प्रथम गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी के जीवन को लेकर राष्ट्रपति भवन में एक प्रदर्शनी भी लगाई गई है। इस प्रदर्शनी को आम लोग आगामी 1 मार्च तक राष्ट्रपति भवन में देख सकते हैं। 

 

भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जिन व्यक्तित्वों का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है, उनमें सी. राजगोपालाचारी,जिन्हें स्नेहपूर्वक सब लोग  “राजाजी” के नाम से सम्बोधित  करते है भारतीय राजनीति में विशेष स्थान रखते हैं। राष्ट्रपति भवन परिसर में उनकी प्रतिमा की स्थापना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र की ओर से उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। “राजाजी उत्सव” के रूप में आयोजित समारोह ने इस ऐतिहासिक क्षण को और अधिक गरिमा प्रदान की।

सी. राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के प्रथम  गवर्नर-जनरल बने और वर्ष 1948 से 1950 तक उन्होंने इस महत्वपूर्ण पद को संभाला।अंग्रेजों ने भारत की आजादी के बाद सत्ता का हस्तांतरण भीं इसी ऐतिहासिक भवन में उन्हीं के हाथों में किया था। यह वही भवन है जिसे आज राष्ट्रपति भवन कहा जाता है और जो कभी ब्रिटिश वायसराय का निवास हुआ करता था। स्वतंत्रता के बाद जब सत्ता भारतीय हाथों में आई, तब राजाजी ने इस भवन में रहकर देश की सर्वोच्च संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। ऐसे में उसी परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित होना इतिहास की निरंतरता और राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रतीक माना जा रहा है।

 

राजाजी का राजनीतिक जीवन अत्यंत बहुआयामी रहा। वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निकट सहयोगियों में गिने जाते थे। नमक सत्याग्रह और विभिन्न आंदोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे अपनी स्पष्टवादिता, नैतिक राजनीति और प्रशासनिक कुशलता के लिए प्रसिद्ध थे। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने मद्रास राज्य (वर्तमान तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया और प्रशासनिक सुधारों को आगे बढ़ाया। उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर ‘स्वतंत्र पार्टी’ नाम से एक नए दल की स्थापना की थी, जो उस समय की समाजवादी नीतियों के समानांतर एक वैकल्पिक आर्थिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती थी। इससे स्पष्ट होता है कि वे विचारों की विविधता और लोकतांत्रिक बहस के पक्षधर थे। स्वतंत्र पार्टी की ओडिशा में भी सरकार बनी और संसद में उनकी पार्टी के नेताओं में पीलू मोदी,मीनू मसानी,एच एम पटेल,महारावल लक्ष्मण सिंह डूंगरपुर, महारानी गायत्री देवी जैसे नेताओं ने राजाजी की विचारधारा को मुखरित ढंग से देश के सामने रखा। राजाजी का राजस्थान से भी गहरा सम्बन्ध रहा और महारावल लक्ष्मण सिंह डूंगरपुर, महारानी गायत्री देवी आदि ने स्वतंत्र पार्टी को सत्ता के निकट बहुमत तक पहुंचाया दुर्भाग्य से राजस्थान में पहली गैर कांग्रेस संविद सरकार नहीं बन सकी जबकि महारावल लक्ष्मण सिंह डूंगरपुर के नेतृत्व में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन के समक्ष देश में पहली बार विधायक दल की परेड हुई थी जिसमें देश के उप राष्ट्रपति रहें भैरोसिंह शेखावत भी शामिल थे। स्वतन्त्र पार्टी की राजस्थान शाखा के तत्कालीन महामंत्री भट्ट कांति नाथ शर्मा राजाजी सी. राजगोपालाचारी के अंग्रेजी भाषणों का पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशनों और चुनावी सभाओं में अनुवाद किया करते थे।

 

राष्ट्रपति भवन में राजाजी सी. राजगोपालाचा की प्रतिमा की स्थापना होने का व्यापक संदेश यह भी है कि राष्ट्र अपने उन सभी नेताओं का सम्मान करता है जिन्होंने देश निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया, चाहे उनकी राजनीतिक धारा कोई भी रही हो। राजाजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैं, पर राष्ट्रहित सर्वोपरि रहता है।आज जब राजनीति में वैचारिक संवाद और नैतिक मूल्यों पर चर्चा की आवश्यकता महसूस की जा रही है, तब राजाजी की विरासत और भी प्रासंगिक हो जाती है। उनकी सादगी, प्रशासनिक ईमानदारी और बौद्धिक स्पष्टता वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है। इसी तरह राष्ट्रपति भवन में “राजाजी उत्सव” के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में उनके जीवन और विचारों को रेखांकित किया गया है। इस प्रदर्शनी, व्याख्यान और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पीढ़ी को यह बताया गया कि राजाजी केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक गहन चिंतक, लेखक और दार्शनिक भी थे। उन्होंने रामायण और महाभारत का सरल अंग्रेज़ी में पुनर्लेखन किया, जिससे भारतीय संस्कृति और परंपरा को वैश्विक स्तर पर समझने में सहायता मिली। राजाजी की एक महत्वपूर्ण पहचान उनकी वैचारिक स्वतंत्रता भी थी। वे आर्थिक नीतियों में मुक्त बाजार व्यवस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक थे। 

 

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिन अंग्रेजों ने 200 वर्षों तक भारतीयों को गुलाम बनाए रखा उन अंग्रेजों की प्रतिमाएं आज भी राष्ट्रपति भवन जैसे सत्ता के केंद्रों पर लगी हुई थी। जो प्रतिमाएं और गुलामी के प्रतीक आजादी के बाद हट जाने चाहिए थे, उन्हें  80 वर्षों तक बनाए रखना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता था। यह सर्वविदित है कि अंग्रेजों से पहले 600 वर्षों तक आक्रमणकारी मुगलों और फिर 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया। मुगल आक्रमणकारियों ने तो इस्लाम धर्म स्वीकार न करने वाले करोड़ों हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। यही अंग्रेजों ने अपना शासन बनाए रखने के लिए भारत के हर नागरिक को गुलाम बनाया। विरोध करने वालों को सरेआम गोली मार दी गई। भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों को रात के अंधेरे में फांसी पर चढ़ा दिया गया। ऐसे अत्याचारी अंग्रेजों की प्रतिमाएं आज तक भी यदि राष्ट्रपति भवन में लगी हुई है तो इसे एक विडम्बना ही कहा जाएगा। राष्ट्रपति भवन से 80 वर्ष बाद ब्रिटिश इंजीनियर एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटना और प्रथम गवर्नर जनरल सी.राजगोपालाचारी की प्रतिमा और उनकी  प्रदर्शनी लगना उस भूल को सुधारना है जिसे पिछले 80 वर्षों तक नहीं सुधारा गया था। इस त्रुटि को सुधारने का काम नरेन्द्र मोदी की सरकार ने 23 फरवरी को किया है। 

 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति भवन में भारत के प्रथम गर्वनर जनरल सी राजगोपालाचारी की प्रतिमा की स्थापना केवल अतीत को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराने का भी क्षण है। “राजाजी उत्सव” के माध्यम से राष्ट्र ने यह संदेश दिया है कि स्वतंत्रता और संविधान की नींव रखने वाले महानायकों को सदैव सम्मान और स्मरण मिलना देश के स्वाभिमान का प्रतीक है।

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