यह प्रश्न केवल पर्यावरण से जुड़ा नहीं है बल्कि हमारी सामूहिक चेतना, संस्कार और जीवन-दृष्टि का आईना है। आज यदि हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाएँ तो उत्तर स्वयं हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है-धुएँ से भरी हवा, शोर से सुन्न होते कान और कटुता से भरते मन। ऐसा लगता है मानो हमने आने वाली पीढ़ी के लिए न केवल सांस लेना कठिन कर दिया है बल्कि सोचने की दिशा भी दूषित कर दी है।
आज किसी भी गली या सड़क से गुजरिए। नाक में दुर्गंध भर जाती है, कानों में झगड़ों की आवाज़ें गूंजती हैं और आँखों के सामने अव्यवस्था का दृश्य होता है। कुछ ही मिनटों की पैदल यात्रा के बाद चेहरे पर प्रदूषण की परत जम जाती है। घर लौटकर सामान्य होने में समय लग जाता है। यह केवल शरीर की थकान नहीं बल्कि मन और आत्मा पर पड़ने वाला बोझ भी है। यही वह हवा है, जो हम अपने बच्चों के लिए छोड़ रहे है जिसमें सांस लेना दिन-प्रतिदिन संघर्ष बनता जा रहा है।
पर समस्या केवल भौतिक प्रदूषण तक सीमित नहीं है। उससे कहीं अधिक खतरनाक है विचारों का प्रदूषण। आज जब चार मित्र एकत्र होते हैं तो बातचीत का विषय सहयोग, संवेदना या समाज निर्माण नहीं होता। चर्चा इस बात पर होती है कि कौन किसे नीचा दिखा दे, कैसे रातों-रात अमीर बना जाए, कैसे कम मेहनत में अधिक लाभ कमाया जाए। नैतिकता, परिश्रम और धैर्य जैसे मूल्य हास्य का विषय बनते जा रहे हैं। मानो सफलता का अर्थ केवल धन, दिखावा और त्वरित लाभ तक सिमट गया हो।
सड़कों पर चलती बहन-बेटियों की ओर उठती असभ्य निगाहें हमारे सामाजिक पतन का स्पष्ट संकेत हैं। यह केवल किसी एक व्यक्ति की विकृति नहीं बल्कि उस सोच का परिणाम है- जिसे हमने अनदेखा किया, सहन किया और कई बार मौन स्वीकृति भी दे दी। कॉमेडी के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है। गीतों के नाम पर अश्लील शब्दों को सामान्य बना दिया गया है। मनोरंजन अब आनंद का माध्यम नहीं बल्कि संवेदनहीनता फैलाने का साधन बनता जा रहा है।
यह सब क्यों हो रहा है? शायद इसलिए कि आज भीड़ और रुपये की पूजा सर्वोपरि हो गई है। कुछ लोग केवल प्रसिद्धि और लाभ के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। चाहे उसका प्रभाव समाज पर कितना ही नकारात्मक क्यों न हो। वे यह भूल जाते हैं कि यह धरती, यह समाज और यह वातावरण केवल उनके लिए नहीं है। हमारे बाद भी पीढ़ियाँ आएँगी, जिन्हें इसी हवा में सांस लेनी होगी और इन्हीं विचारों के बीच जीवन जीना होगा।
हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम केवल उपभोक्ता नहीं हैं। बल्कि उत्तराधिकारी और उत्तरदायी भी हैं। हमें आने वाली पीढ़ी के लिए केवल संपत्ति नहीं बल्कि स्वस्थ प्राणवायु और शुद्ध विचार भी छोड़ने हैं। हमें ऐसी हवा देनी है जिसमें वे निर्भय होकर सांस ले सकें और ऐसे विचार देने हैं जिनमें करुणा, सम्मान, परिश्रम और नैतिकता की सुगंध हो।
परिवर्तन की शुरुआत बड़े आंदोलनों से नहीं बल्कि छोटे-छोटे व्यक्तिगत निर्णयों से होती है। स्वच्छता अपनाना, पर्यावरण का सम्मान करना, भाषा और व्यवहार में मर्यादा रखना और सबसे बढ़कर अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना- यही सच्ची शुरुआत है। बच्चों को केवल सफलता के सपने दिखाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही रास्ते पर चलने का साहस भी सिखाना होगा।
प्रश्न यह है कि जब आने वाली पीढ़ी इतिहास के आईने में हमें देखेगी तो क्या वह हमें दोष देगी या धन्यवाद देगी? इसका उत्तर हमारे आज के कर्म और विचार तय करेंगे। यदि हम आज जाग गए, तो संभव है कि कल की हवा भी स्वच्छ हो और कल के विचार भी।
Headlines
आने वाली पीढ़ियों को हम कैसी हवा और कैसे विचार सौंप रहे हैं?
लेखक- भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
Related stories
KOTA MILITARY STATION ORGANISES KOTA GANDIV MARATHON 1.0 AS PART OF GANDIV GOLDEN JUBILEE CELEBRATIONS
Jaipur: As part of the Gandiv Golden Jubilee Celebrations, Kota Military Station organised the Kota Gandiv Ma…
Diver Victory Presentation’ Brings History Alive at Vidya Bhawan Polytechnic’s Meljol Mela
Udaipur: The life and reign of Maharana Pratap offer an inspiring example of good governance, financial manag…
Maternal and Child Health, Nutrition Top Government Priorities: Kharadi
Udaipur: The three-day Angan Seva Milan programme, organised under the Viksit Bharat–Jan Seva Abhiyan, conclu…
EXERCISE TARANG SHAKTI 2026: POWER IN PARTNERSHIP
Following the inaugural ceremony held yesterday, the Indian Air Force (IAF) is set to commence the operationa…