भारत वह भूमि है जहाँ मातृत्व को महिमा, संतति को संपदा और परिवार को संस्कृति का प्रथम विद्यालय माना गया। यहाँ माँ केवल जन्म नहीं देती थी, वह संस्कारों की शिल्पकार होती थी। आँगन में गूँजती किलकारी केवल एक बच्चे की आवाज नहीं होती थी, वह भविष्य की घोषणा होती थी-एक नई पीढ़ी, एक नई आशा और एक नया इतिहास।
कभी इस देश के घर-आँगन वसंत के बाग़ की तरह होते थे। बच्चों की हँसी फूलों की तरह खिलती थी और परिवारों में कई संताने होना सामान्य बात थी। हर संतान परिवार की शक्ति और समाज की पूँजी मानी जाती थी। लेकिन समय की धारा ने जैसे दिशा बदल ली है। आज वही आँगन धीरे-धीरे सूने होते जा रहे हैं। घर बड़े हो रहे हैं, सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन उनमें जीवन की हलचल कम होती जा रही है।
आधुनिकता की चमक में हम इतने डूब गए हैं कि विवाह, परिवार और संतति का प्रश्न धीरे-धीरे समाज के विमर्श से बाहर होता जा रहा है। विवाह अब जीवन का स्वाभाविक पड़ाव नहीं, बल्कि “उचित समय आने पर” किया जाने वाला एक प्रोजेक्ट बन गया है। युवा शिक्षा, करियर और स्थिरता की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उस उम्र से आगे निकल जाते हैं जब प्रकृति सहज रूप से जीवन को जन्म देती है।
आज शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक प्रजनन उपचार और आईवीएफ केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि है। लेकिन यह हमारे समाज के लिए एक मौन व्यंग भी है। जो काम कभी प्रकृति सहजता से कर लेती थी, वह अब प्रयोगशालाओं की मशीनों और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के भरोसे होता दिखाई दे रहा है।
आँकड़े इस बदलती स्थिति को और स्पष्ट करते हैं। भारत की कुल प्रजनन दर आज लगभग 1.9 रह गई है, जबकि किसी भी समाज के संतुलन के लिए यह दर कम से कम 2.1 होनी चाहिए। राजस्थान, जिसे कभी बड़े परिवारों की संस्कृति का प्रतीक माना जाता था, वहाँ भी यह दर लगभग 2.0 के आसपास पहुँच चुकी है। इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में नई पीढ़ी की संख्या धीरे-धीरे कम हो सकती है।
विडंबना यह है कि जिस देश में कभी बच्चों को “भगवान का रूप” माना जाता था। वहीं आज कई परिवारों में बच्चा होना एक “योजना” या “प्रोजेक्ट” बनता जा रहा है। पहले घरों में बच्चों के लिए जगह बनाई जाती थी, आज बच्चों के लिए बजट और समय की गणना की जाती है। पहले दादी-नानी की कहानियाँ बच्चों की दुनिया सजाती थीं। आज मोबाइल और स्क्रीन उनका स्थान लेती जा रही हैं।
समस्या केवल चिकित्सा या जनसंख्या की नहीं है,यह सोच की समस्या भी है। युवाओं की उम्र विवाह के बिना ही निकलती जा रही है। माता-पिता भी कई बार बच्चों की स्वतंत्रता के नाम पर इस विषय में मौन रहते हैं। समाज इसे व्यक्तिगत निर्णय कहकर किनारा कर लेता है। और सरकार की नीतियाँ अब भी उस दौर की सोच में उलझी दिखाई देती हैं जब केवल जनसंख्या बढ़ने की चिंता की जाती थी।
यदि यही प्रवृत्ति आगे बढ़ती रही तो समाज की संरचना बदल सकती है। नई पीढ़ी कम होगी और बुजुर्गों का अनुपात बढ़ेगा। यह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय चुनौती भी बन सकती है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी युवा पीढ़ी से बनती है।
इसलिए यह समय केवल चिंता करने का नहीं बल्कि विचार और नीति-निर्माण का भी है। सरकारों को इस विषय पर गंभीरता से विमर्श करना होगा। परिवार-अनुकूल नीतियाँ, मातृत्व और पितृत्व के सम्मान की संस्कृति, और युवाओं में संतुलित पारिवारिक जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना समय की आवश्यकता है।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि जीवन की मूल धारा ही सूख जाए। करियर और प्रगति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन परिवार और संतति भी समाज की निरंतरता के आधार स्तंभ हैं।
क्योंकि जिस आँगन में किलकारी नहीं गूँजती, वहाँ दीवारें तो खड़ी रहती हैं, पर घर की आत्मा कहीं खो जाती है। जीवन चलता तो है। पर उसमें वह रौनक नहीं होती जो बचपन की हँसी से आती है। ऐसे घरों में समय तो बीतता है, लेकिन पीढ़ियों की गर्माहट नहीं बसती।
अब समय आ गया है कि सरकार, समाज और नीति-निर्माता इस विषय को केवल निजी जीवन का मामला मानकर किनारे न करें। यदि आने वाली पीढ़ियों का संतुलन बिगड़ गया तो उसके परिणाम बहुत गहरे और दूरगामी होंगे।
क्योंकि सभ्यता की असली पहचान केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और चमकते बाज़ारों से नहीं होती। सभ्यता की असली पहचान उस नन्ही किलकारी से होती है जो किसी घर के आँगन में गूँजकर आने वाले भविष्य की घोषणा करती है।
यदि वह किलकारी ही धीमी पड़ जाए तो याद रखिए एक दिन विकास के शोर के बीच भी समाज के भीतर गहरा सन्नाटा उतर सकता है।
तब प्रश्न यह नहीं होगा कि देश कितना आगे बढ़ा बल्कि यह होगा कि आगे बढ़ने वाली पीढ़ी ही कितनी बची।
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जब किलकारी कम हो जाए तो राष्ट्र का भविष्य कौन लिखेगा?
लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
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