उदयपुर | झीलों की नगरी उदयपुर के हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित 'आशीष वाटिका' के पावन प्रांगण में पिछले नौ दिनों से बह रही अध्यात्म की ज्ञान गंगा का आज अत्यंत भव्य और भावपूर्ण समापन हुआ। ब्रज गोपिका सेवा मिशन के तत्वावधान में आयोजित "पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य" महोत्सव के अंतिम दिवस पर पूजनीया रासेश्वरी देवी जी की दिव्य वाणी ने पांडाल में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को भक्ति के सर्वोच्च शिखर का दर्शन कराया। अंतिम सत्र का शुभारंभ शंखध्वनि, वेदमंत्रों के सस्वर पाठ और सामूहिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
दिव्य मंच से 'भक्ति के वास्तविक स्वरूप' की व्याख्या करते हुए रासेश्वरी देवी जी ने कहा कि जो साधक केवल भगवान की कथाओं को सुनते हैं परंतु उसे आचरण में धारण नहीं करते, उनका अंतःकरण कभी शुद्ध नहीं हो सकता। रामानुजाचार्य के सूत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भक्ति में सबसे बड़ी बाधा 'दंभ' है। बकासुर का वध इसी दंभ के समूल नाश का प्रतीक है। अघासुर वध और 'ब्रह्मा-विमोहन लीला' के दार्शनिक रहस्यों को उद्घाटित करते हुए पूजनीया देवी जी ने कहा कि अघासुर हमारे संचित 'पापों' का प्रतीक है। जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने भगवान की परीक्षा लेने का प्रयास किया, तब साक्षात पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि वेदों के शुष्क ज्ञान और तप से परे केवल विशुद्ध प्रेम के आधार पर ही परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।
गोवर्धन लीला और महारास के चरम रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि गोवर्धन पूजा का मुख्य उद्देश्य 'अनन्यता' की स्थापना था। भगवान यह चाहते हैं कि जीव माया-आधीन देवताओं की सकाम भक्ति को त्यागकर एकमात्र परमेश्वर की निष्काम भक्ति करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि महारास कोई लौकिक विषय नहीं है; यह जीवात्मा और परमात्मा के परम मिलन की सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था है, जहाँ जीव अपने शारीरिक और वर्णाश्रम धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर विशुद्ध आध्यात्मिक धर्म में प्रवेश कर जाता है।
कथा के अंतिम चरण में पांडाल का वातावरण उस समय परमानंद की पराकाष्ठा पर पहुँच गया, जब भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के पावन विवाह प्रसंग को एक अत्यंत मनोहारी और सजीव झांकी के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया गया। रुक्मिणी-कृष्ण विवाह के इस अलौकिक दृश्य ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया और पूरा पांडाल विवाह के मंगल गीतों, पुष्प वर्षा और जयकारों से गूंज उठा।
महोत्सव की विदाई बेला में पूजनीया देवी जी ने जब अपने मधुर कंठ से ब्रज गोपियों के निश्छल प्रेम को दर्शाता हुआ भावपूर्ण संकीर्तन"मेरी लगी श्याम संग प्रीत, ये दुनिया क्या जाने..."और"मुझे मिल गया मन का मीत..."कराया, तो हजारों श्रद्धालु अपने स्थानों पर खड़े होकर प्रेमाश्रुओं के साथ झूमने लगे। प्रत्येक श्रद्धालु की आँख नम थी और हृदय कृतज्ञता से भरा हुआ था। अंत में भागवत महापुराण की अलौकिक महाआरती उतारी गई और महाप्रसाद वितरण के साथ इस नौ दिवसीय आध्यात्मिक महोत्सव का सफलतापूर्वक विश्राम हुआ।
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दंभका त्याग और अनन्य शरणागति ही भगवत्प्राप्ति का साधन', अपार श्रद्धा और अश्रुओं के बीच नौ दिवसीय भागवत कथा का भव्य विश्राम: रासेश्वरी देवी जी
आशीष वाटिका में विशाल आध्यात्मिक महोत्सव का समापन, महारास और गोवर्धन लीला के अलौकिक रहस्यों ने हजारों श्रद्धालुओं को किया भावविभोर
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