कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर सेवानिवृत्त मेजर जनरल जी.डी. बख्शी का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने आरक्षण को लेकर बेहद तीखा और कटाक्षपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा, “मेरे साथ 700 साल पहले अत्याचार हुआ, इसलिए मुझे आने वाले 7 हजार या 70 हजार साल तक आरक्षण चाहिए। मुझे डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है, लेकिन मैं पढ़ूंगा नहीं।” यह बयान न सिर्फ तथ्यों से कोरा, बल्कि बेहद गैरजिम्मेदाराना भी है।
मैं लंबे समय से टीवी डिबेट्स में जनरल बख्शी को सुनता आ रहा हूँ। तथ्यों के आधार पर बहस करने की बजाय इधर-उधर की बातें करना और चिल्लाना उनकी आदत बन चुकी है। लेकिन आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इस तरह की लापरवाही भरी टिप्पणी ने सारी हदें पार कर दीं।
उन्हें यह जानना चाहिए कि दुनिया के कई देशों में समाज के पिछड़े और वंचित तबकों को मुख्यधारा में लाने के लिए लंबे समय से विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन्हें कहीं “Affirmative Action” कहा जाता है, तो कहीं अन्य नामों से जाना जाता है। अमेरिका, चीन, जापान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और मलेशिया जैसे देशों में भी पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए आरक्षण या समकक्ष व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
यह भी स्पष्ट कर दूं कि बिना पढ़े न तो कोई डॉक्टर बन सकता है और न ही इंजीनियर। हाँ, प्रवेश स्तर पर कुछ छूट दी जाती है, लेकिन डिग्री प्राप्त करने के लिए पास प्रतिशत और मापदंड सभी छात्रों के लिए समान होते हैं।
लगता है जनरल बख्शी का पढ़ाई-लिखाई से विशेष लगाव नहीं रहा। 55-60 साल पहले जब फौज में अधिकारी बनने के लिए कड़ी प्रतियोगिता नहीं थी, तब शायद उनका तुक्का लग गया। उसके बाद मुफ्त राशन और अन्य सुविधाओं ने उन्हें इतना गैरजिम्मेदार बना दिया कि वे आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे पर भी बिना सोचे-समझे बयान दे देते हैं।
उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि हमारे संविधान निर्माता, जिन्होंने आरक्षण का प्रावधान रखा, उनसे कहीं अधिक पढ़े-लिखे, विद्वान और दूरदर्शी थे।
अंत में, जनरल बख्शी जैसे लोग यह भी भूल जाते हैं कि उन्हें मिलने वाला मुफ्त राशन और अन्य सुविधाओं का बोझ इस देश की गरीब जनता ही उठाती है। गहरी सोच और संतुलित विश्लेषण की जगह नारेबाजी और भावुकता पर आधारित बयानबाजी न तो किसी समस्या का समाधान है, न ही किसी जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य।
रिटायर्ड आईएएस महावीर प्रसाद वर्मा
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भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन गैरजिम्मेदार बयानबाजी की नहीं।
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