कोटा। राजस्थान पुलिस—विशेषकर कोटा पुलिस—द्वारा पुलिसकर्मियों की पीठ दिखाते हुए जारी की गई तस्वीरों ने पुलिस प्रशासन और मीडिया जगत में चर्चा तेज कर दी है। बताया गया था कि यह तस्वीरें परिजनों की सुरक्षा के उद्देश्य से जारी की गई हैं, लेकिन इस दावे के समर्थन में न तो कोई आधिकारिक आदेश प्रस्तुत किया गया है और न ही पुलिस नियमावली में ऐसा कोई प्रावधान मिलता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अख्तर खान अकेला ने इस प्रथा पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा कि पत्रकारिता के छह मूल सिद्धांत—कब, कहाँ, क्यों, किसने, किसलिए और कैसे—इस खबर में कहीं भी स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “पुलिस अधिनियम 1961, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता और अन्य पुलिस नियमों में कहीं भी पुलिसकर्मियों की पीठ दिखाकर फोटो जारी करने की व्यवस्था उल्लेखित नहीं है।”

अधिवक्ता अकेला के अनुसार पुलिसकर्मियों की पहले से ही कम संख्या, बढ़ता काम का बोझ और लगातार लिखापढ़ी के बीच इस प्रकार के फोटो-वीडियो सेशन में समय का अनावश्यक व्यय होता है। उन्होंने कहा कि मुल्ज़िमों की गिरफ्तारी के बाद फोटो सेशन, लाठी-पैर की चोटों के साथ प्रचारित की जाने वाली तस्वीरें और परेड जैसे कार्यक्रम पहले ही काफी समय लेते हैं।

अख्तर खान अकेला ने यह भी आरोप लगाया कि कई थानों और पुलिस कार्यालयों में कुछ समूह नियमित रूप से जन्मदिन समारोह, मालाएं, गुलदस्ते और सम्मान प्रतीक लेकर पहुंच जाते हैं। ये तस्वीरें व वीडियो रोज़ाना सोशल मीडिया पर अपलोड होते हैं, जो पुलिस अनुशासन नियमों के विपरीत माने जाते हैं। उनका कहना है कि इससे पुलिसकर्मियों का बहुमूल्य समय भी नष्ट होता है, जिसका सीधा असर कानून-व्यवस्था पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि कोटा में टूटे-फूटे, लंगड़ाते या पट्टी बांधे हुए मुल्ज़िमों को दिखाकर खौफ पैदा करने का प्रयास वर्षों से किया जाता रहा है, लेकिन चोरी, चाकूबाज़ी और धोखाधड़ी के अपराधों में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है।

अधिवक्ता अकेला ने सुझाव दिया कि यदि इस अनावश्यक प्रचार-प्रसार का समय बचाकर पुलिस बीट प्रणाली, सूचना-संग्रह, निगरानी और अनुसंधान पर अधिक ध्यान दे, तो अपराध नियंत्रण में अधिक प्रभावी परिणाम सामने आ सकते हैं।

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