उदयपुर। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में संचालित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान सूत्रकृमि प्रबंधन परियोजना के संयुक्त तत्वावधान में जनजाति किसानों हेतु एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र, बांसवाड़ा में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य जनजाति क्षेत्रों के किसानों को सूत्रकृमि (निमेटोड) जनित रोगों की पहचान, रोकथाम एवं समेकित प्रबंधन की वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करना था, जिससे वे अपनी फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि कर सकें।
कार्यक्रम का शुभारंभ विशेषज्ञों के स्वागत एवं प्रशिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत करने के साथ हुआ। प्रशिक्षण में क्षेत्र के प्रगतिशील जनजाति किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वैज्ञानिकों ने किसानों को सरल एवं व्यवहारिक भाषा में सूत्रकृमियों के जीवन चक्र, उनके प्रसार के कारणों तथा फसलों पर उनके प्रतिकूल प्रभावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
सूत्रकृमि परियोजना प्रभारी डॉ. हेमेंद्र शर्मा ने अपने व्याख्यान में बताया कि सूत्रकृमि सूक्ष्म जीव होते हैं जो मृदा एवं पौधों की जड़ों में रहकर फसलों को गंभीर क्षति पहुंचाते हैं। उन्होंने बताया कि इनके प्रकोप से पौधों की जड़ें गांठदार हो जाती हैं, पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है तथा उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आती है। डॉ. शर्मा ने समेकित प्रबंधन (आईपीएम) की अवधारणा पर जोर देते हुए जैविक, यांत्रिक एवं रासायनिक उपायों के संतुलित उपयोग की सलाह दी। उन्होंने विशेष रूप से पॉलीहाउस में उगाई जाने वाली सब्जी फसलों में सूत्रकृमियों की समस्या पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संरक्षित खेती में निरंतर एक ही फसल लेने से इनका प्रकोप बढ़ सकता है। इसके समाधान हेतु उन्होंने फसल चक्र अपनाने, सौर्यकरण (सोलराइजेशन), जैव-नियंत्रण एजेंट्स के उपयोग तथा स्वस्थ रोपाई सामग्री के चयन की सलाह दी।
सूत्रकृमि विशेषज्ञ डॉ. चंद्र प्रकाश नामा ने फलदार वृक्षों में सूत्रकृमियों के प्रभावी प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अनार, अमरूद, साइट्रस एवं अन्य फल वृक्षों में सूत्रकृमि जड़ों को प्रभावित कर वृक्षों की वृद्धि एवं फलन क्षमता को कम कर देते हैं। उन्होंने मृदा परीक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि नियमित परीक्षण से समस्या की प्रारंभिक अवस्था में पहचान कर उचित उपचार संभव है। डॉ. नामा ने किसानों को जैविक खाद, नीम खली, ट्राइकोडर्मा एवं अन्य जैव-एजेंट्स के प्रयोग के लाभ बताए तथा रासायनिक नियंत्रण उपायों को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाने की सलाह दी। उन्होंने यह भी कहा कि वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र, बांसवाड़ा के प्रभारी डॉ. बी. एस. भाटी ने किसानों को सूत्रकृमियों के प्रमुख लक्षणों की पहचान के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यदि पौधों की वृद्धि रुक जाए, पत्तियां पीली पड़ने लगें अथवा जड़ों में गांठें दिखाई दें तो यह सूत्रकृमि प्रकोप का संकेत हो सकता है। उन्होंने किसानों को खेत में नियमित निरीक्षण करने एवं समय पर वैज्ञानिक सलाह लेने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. जी. एल. कोठारी द्वारा प्रभावी ढंग से किया गया। प्रशिक्षण के दौरान किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान भी विशेषज्ञों द्वारा किया गया, जिससे कार्यक्रम अत्यंत संवादात्मक एवं उपयोगी सिद्ध हुआ।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 7 महिला कृषकों सहित कुल 35 प्रगतिशील जनजाति किसानों ने सक्रिय भागीदारी की। किसानों ने इस प्रकार के वैज्ञानिक प्रशिक्षण को अत्यंत लाभकारी बताते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की अपेक्षा व्यक्त की। प्रशिक्षण के उपरांत सभी प्रतिभागी किसानों को ऑटोमेटिक स्प्रेयर एवं उन्नत सब्जी बीजों का निःशुल्क वितरण किया गया, ताकि वे प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान को अपने खेतों में व्यवहारिक रूप से लागू कर सकें।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम जनजाति क्षेत्र के किसानों की आय वृद्धि, सतत कृषि विकास एवं आधुनिक तकनीकों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
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