श्रीगंगानगर। भारतीय रेलवे आज 173 वर्ष की हो गई है। अपने जन्म से इस उम्र तक हर बार यह समयानुसार पहले से ज्यादा स्वस्थ, ताज़ा और जवान दिखाई देती रही है। इतिहास में झांके तो भारत में पहली ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से ठाणे के बीच चली थी।उस समय की वैज्ञानिक उपलब्धि के हिसाब से देखा जाए तो उस समय निसंदेह यह बड़ी उपलब्धि रही होगी। उस समय भी लोगों में ऐसी सी खुशी रही होगी जैसी आज वंदे भारत ट्रेनों के चलने पर हो रही है। समय के अनुसार सब बदलता रहा है।
जडआरयूसीसी के पूर्व सदस्य श्री भीम शर्मा ने बताया कि बात अब अपने 59 साल के जीवन में रेल सफ़र की करूं तो मैने 59 वर्षों में रेलवे में बड़े बदलाव देखे है। मै भारतीय रेलवे का एक रूटीन ग्राहक हू। अपने इस जीवन में ज्यादातर सफ़र ट्रेनों में ही किया है। जब जन्म हुआ तब देश में अलग अलग स्थानों पर स्टीमएडीजल और इलेक्ट्रिक तीनों ही ट्रेक्शन पर ट्रेनों का संचालन हो रहा था। एक समय रेल सेवाओं के मामले में बुरी तरह से पिछड़ा हुआ राजस्थान का श्रीगंगानगर अब वो नहीं रहा। जिस क्षेत्र में हम कोयले और पानी से चलने वाले स्टीम इंजन देखा करते थे वहां अब इलेक्ट्रिक इंजन से ट्रेन संचालित होते हुए देख रहे है।
एक वो युग था जब स्टीम इंजन से संचालित ट्रेन के मीटरगेज वाली ट्रेनों के समय ट्रैक के नीचे लकड़ी के स्लीपर होते थे और रफ्तार पकड़ते ही धूल और कोयले के कणों के कारण न सिर्फ कपड़े खराब हो जाते थे, बल्कि मुंह और बालों में रेत भर जाती थी। राजस्थान मे तो ऐसे नज़ारे भी देखे जाते थे कि यात्रा कर ट्रेन से उतरने पर पहचानना मुश्किल हो जाता था। उस समय कंप्यूटराइज्ड टिकट सिस्टम भी नहीं था। गत्ते की छोटी सी प्रिंटेड टिकट जिस पर मशीन से दिनांक डालकर यात्री को दे दी जाती थी। आज हम घर बैठे ऑनलाइन टिकट बना रहे है। हमारी ट्रेन की क्या लोकेशन है पलभर में पता लगा लेते है। मेरी उम्र के लोगों को वो भी याद है जब रेल लाइनों के बीच मल मूत्र पसरा रहता था। आज ऐसा कही भी देखने में नहीं है।
एक बार फिर इतिहास की ओर चलकर रेलवे की इस यात्रा और उसमें हुए बदलाव पर चर्चा जरूरी है। इस यात्रा की बात करें तो 173 वर्ष पूर्व आज के ही दिन भारत में एक भाप इंजन की आवाज ने इतिहास का रुख बदल दिया। साल 1853 में जब पहली यात्री ट्रेन बंबई से ठाणे के लिए रवाना हुई, तो उसने न केवल यात्रियों को, बल्कि आवागमन और संपर्क के एक नए युग का वादा भी अपने साथ ले गई। इसके बाद के वर्षों में, रेलवे शहरों, कस्बों और गांवों में तेजी से फैल गया, जिससे लोगों, वस्तुओं और विचारों का अभूतपूर्व जुड़ाव हुआ। भाप इंजनों की जगह डीजल इंजनों ने ले ली, और अंततः बिजली की ट्रेनों ने, जो तेज, स्वच्छ और अधिक कुशल थीं। समय के साथ, रेलवे स्टेशन साधारण प्लेटफार्मों से विकसित होकर हलचल भरे गतिविधि केंद्रों में बदल गए। प्रत्येक नई तकनीकी प्रगति ने अतीत की उपलब्धियों को आगे बढ़ाया, जिससे लाखों यात्रियों के लिए गति, सुरक्षा और आराम में लगातार सुधार हुआ। जो एक धीमी और प्रयोगात्मक प्रक्रिया के रूप में शुरू हुआ था, वह जल्द ही दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क में से एक बन गया।
आज, यह यात्रा गति पकड़ती जा रही है क्योंकि भारतीय रेलवे यात्री और माल ढुलाई दोनों में नए मानक स्थापित कर रहा है। ये उपलब्धियाँ दर्शाती हैं कि कैसे रेलवे एक अग्रणी परिवहन प्रणाली से विकसित होकर आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण इंजन बन गया है। यह देश के रसद नेटवर्क की रीढ़ की हड्डी के रूप में भी कार्य करता है और साथ ही पूरे भारत में लाखों लोगों को सुरक्षित, विश्वसनीय और सुलभ परिवहन सुविधा प्रदान करता है। आज देशभर में अमृत भारत स्टेशन योजना के अंतर्गत रेलवे स्टेशनों का पुनर्निर्माण कर विकास की झांकी सजाई जा रही है।
16 अप्रैल 1853 के दिन भारतीय रेलवे की जो यात्रा शुरू हुई, उसमें अब तक जो जबरदस्त बदलाव हुए यह यात्रा आगे भी सफलता के साथ इसी तरह जारी रहेगी।
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भारतीय रेलवे की पहली ट्रेन 173 साल पहले आज के दिन चली थी, सफलता की यात्रा जारी रहे
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