श्रीगंगानगर, भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के टिड्डी-सह-एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केन्द्र श्रीगंगानगर द्वारा ग्राम पंचायत भागसर में बुधवार एवं बृहस्पतिवार को दो दिवसीय आईपीएम ऑरिएण्टेशन कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया, जिसमें किसानों ने उत्साह के साथ भाग लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ केन्द्राधीक्षक एवं उप निदेशक डॉ. आरके शर्मा एवं सहायक निदेशक श्री प्रकाश चन्द्रा द्वारा किया गया। डॉ. शर्मा द्वारा आईपीएम तकनीक क्या है एवं इसके घटक तथा खरीफ की फसलों में खरपतवार प्रबंधन की विस्वार पूर्वक जानकारी दी गई। इसमें खेत की तैयारी से लेकर कटाई तक आईपीएम विधियों के उपयोग पर चर्चा की, जिसमें व्यवहारिक, यांत्रिक या भौतिक, जैविक तथा रासायनिक तरीकों के बारे में बताया।
डॉ. शर्मा ने बताया कि कीटनाशकों का लगातार असुरक्षित एवं अंधाधुंध उपयोग होने से फसलों में बेवजह जहर की मात्रा बढ़ रही है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक साबित होती जा रही है। पिछले कुछ समय से खाद्यान फसलों जैसे-दालों, फलों, सब्जियों आदि के उत्पाद में एमआरएल (अधिकतम अवशेष स्तर) की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इनमें से भी विशेषतय मूंग की फसल में एमआरएल की मात्रा ज्यादा पायी जा रही है। इससे बचने के लिए जैविक कीटनाशकों का अधिक उपयोग एवं रासायनिक कीटनाशकों को अंतिम उपचार के रूप में ही उपयोग करने की सलाह किसानों को दी।
श्री प्रकाश चन्द्रा, सहायक निदेशक ने किसानों को खरीफ की फसलों में लगने वाले कीट एवं उनके नियंत्रण के बारे में किसानों को अवगत करवाया। श्री चन्द्रा ने बताया कि किसानों को रासायनिक कीटनाशक की बजाय जैविक कीटनाशकों जैसे नीम का तेल, हरी मिर्च एवं लहसुन से बने घरेलू कीटनाशकों को विकल्प के तौर पर उपयोग करें ताकि पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम किया जा सके एवं उपज भी अच्छी ली जा सके। जैविक कीटनाशक, मित्र कीटों को बचाने में भी महत्वपूर्ण होते है, जो रासायनिक कीटनाशकों की खपत को कम करने में सहायक होते है।
श्री लोकेश कुमार मीना, सहायक वनस्पति संरक्षण अधिकारी ने किसानों को कपास व मूंग में लगने वाले प्रमुख कीटों की पहचान एवं उनके नियंत्रण के बारे में विस्तार से जानकारी दी। श्री मीणा ने बताया कि कपास तथा मूंग की फसलों में लगने वाले रस चूसक कीटों के लिए पीले एवं नीले चिपचिपे कार्ड आदि उपयोग में लाये ताकि रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग के बिना ही कीटों का नियंत्रण किया जा सके। किसान इन कार्डो को घर पर भी बना सकतें है जिसके लिए किसान किसी भी पुराने गत्ते एवं टिन के टुकड़ें को पीले या नीले रंग से रंग कर सूखने के पश्चात् इसपर ग्रीस लगा कर इनकों खेतों में लगा सकतें है। इससे कम लागत में कीटों के नियंत्रण का उपाय किया जा सकता है।
इसके अलावा गुलाबी सुंडी के समय से तथा प्रभावी नियंत्रण के लिए खेतों की रोजाना निगरानी करने को लेकर जागरूक किया जिसमें किसानों को अपनें खेतों में भीतर जाकर निगरानी के तरीकों पर चर्चा की जैसे, जिग-जैग, क्रास, डायमण्ड आकार में घूमकर सैम्पल के तौर पर फूलों एवं टिंडों को तोड़कर चैक करे ताकि गुलाबी सुंडी का समय से पता लगाया जा सके एवं कीट के आर्थिक हानि स्तर से अधिक होने पर प्रभावी प्रबंधन किया जा सके। साथ ही साथ मित्र कीटों जैसे, क्राईसोपर्लाए लैडी बर्ड बीटल, मकडियों, ब्रैकॉन, चीलोनिस ब्लैकबर्नी आदि की पहचान करवायी तथा इनकें संरक्षण पर जौर दिया ताकि पर्यावरण संतुलन को हानि पहुंचाए बिना ही हानिकारक कीटों को मित्र कीटों द्वारा ही नियंत्रित किया जा सके।
श्री जितेन्द्र मीना, सहायक वनस्पति संरक्षण अधिकारी ने खरीफ की फसलों में लगने वाली बिमारियों के लक्षण एवं उनके नियंत्रण के बारे में विस्तार से बताया। साथ ही साथ खेत पर जैविक कीटनाशकों तथा उर्वरकों को तैयार करने की विधियों के बारे में बताया गया। श्री मीना ने ट्राईकोडर्मा को बनाने की विधियों के बारे मे किसानो को अवगत करवाया तथा ट्राईकोडर्मा को रासायनिक फॅफूंदनाशी के विकल्प के तौर पर उपयोग करने को लेकर जागरूक किया गया।
श्री रोहिताश्व कमार चौधरी, वैज्ञानिक सहायक ने किसानो को भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही मोबाईल एप्लीकेशन न पीएसएस के बारे में किसानों को खेतों में ले जाकर प्रैक्टिकल प्रदर्शनी करके बताया। एनपीएसएस (राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा नियंत्रित एक मोबाईल एप्लीकेशन है, जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप्लीकेशन से सभी किसान भाई किसी भी कीट एवं बिमारियों की पहचान कर सकते तथा साथ ही साथ उसके उपचार के बारे में भी पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते है।
राज्य कृषि विभाग की तरफ से कृषि अधिकारी श्री मोहित ने किसानों को राज्य सरकार की योजनाओं से अवगत करवाया एवं गुलाबी सुंडी के बारे में भी चर्चा की। वैज्ञानिक सहायक, सुश्री वर्षा एवं तकनीकि सहायक, रिया चावला ने किसानों को मित्र कीटों की पहचान करवाई। कार्यक्रम में आईपीएम की अवधारणा एवं घटक, रसायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग की रोकथाम, हानिकारक एवं मित्र कीटों की पहचान, गुलाबी सुंडी के नियंत्रण, राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली, जैविक कीटनाशकों आदि पर केन्द्रित रहा। सभी किसानों को एक-एक पैकेट ट्राईकोडर्मा का भी वितरण किया गया।
Shri Ganga NagarNews
भागसर में दो दिवसीय आईपीएम कार्यक्रम का आयोजन
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