माता पिता की अति महत्वाकांक्षाओं और जिद्दी प्रवृति फूल से कोमल बच्चों के लिए कितनी घातक हो जाती है कि वे तनाव और अवसाद नहीं झेल पाते और न केवल नशीली या नींद की गोलियां लेने लगते हैं वरन अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर लेते हैं।
ऐसे माता पिता को अपनी गलतियों पर जीवन भर पछतावे , ग्लानि के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता और उनके सपनों का महल तिनके - तिनके हो कर ढह जाता है। पूरे परिवार को यह दंश झेलना पड़ता है जिस से वे कभी उभर नहीं पाते हैं।
अमुराई गांव के ऐसे ही कथानक पर इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है एक बच्चा भावेश जो अपने जैसे हजारों बच्चों का प्रतिनिधित्व करता है, जिनके माता पिता द्वारा अपनी महत्वाकांक्षाओं को बोझ लाद देते हैं और बच्चों की इच्छा जानने का प्रयास तक नहीं करते हैं ।
इस पर वे इतने कठोर हृदय हो जाते हैं कि सीधा आदेश सुना देते हैं घर जब आओ तो इंजीनियर बन कर ही आना, इस से पहले नहीं ! ऐसे ही आदेश में बंधा बच्चा मन की बात किस से कहे।
शनै : शनै: तनाव अवसाद का रूप ले लेता है और बच्चे अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। भावेश मन की सभी अनकही बातें एक कापी में लिख कर पिता के लिए छोड़ जाता है।
इसमें वह उन्हें यह लिख कर अपराधियों के कटघरे में खड़ा कर देता है, मेरा जीवन आपकी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया। इस कॉपी की परिवार के संपर्क के स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर जी अपने पत्र के साथ एक पार्सल में भावेश के पिता को भेजते हैं।
पिता जीवन भर अपने को अपने बेटे भावेश का हत्यारा और अपराधी समझने लगता है। पश्चाताप और आत्मग्लानि के अलावा उनके हाथ में कुछ नहीं लगता।
कहानी लेखक और उपन्यासकार डॉ. सूरज सिंह नेगी जो स्वयं राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं ने इस कथानक को लेकर उपन्यास में मुद्दे को प्रभावी और संवेदनशीलता से उठाते हुए सुरुचि पूर्ण बनाया है कि पाठक उपन्यास को पढ़ना शुरू करे तो अंत तक पढ़ कर ही दम लेता है। यह उपन्यास न केवल भावेश की कहानी कहता है वरन दो पीढ़ियों के सोच के अंतराल और उनकी भावनाओं की कश्मकश को भी बखूबी बयान करता है।
पांच खंड में लिखे गए उन्यास का प्रारंभ छोटे से अमुराई गांव के बीच बने चबूतरे की वह चौपाल से होता है जहां गांव के लोग हर रोज जमा हो कर अपने - अपने मन की बातें करते हैं।
वे इस बात से खुश है कि उनका गांव आज डॉक्टर - इंजीनियरों के गांव के नाम से मशहूर हो गया है। इस गांव के हर मां - बाप का एक ही सपना होता है कि उनका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने।
इन परीक्षाओं में सफल होने वाले बच्चों का सार्वजनिक स्तर पर सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं। नौकरी लगने पर शहर या विदेश चले जाने वाले बच्चें वहीं के हो कर रह जाते हैं और गांव में अकेले रह जाते हैं बूढ़े माँ - बाप।
इस पर भी जो उन्हें और बच्चों के कैरियर के बारे में कोई अन्य सलाह देता है जो उन्हें किसी जहर से कम नहीं लगता। वे अपने बच्चों की सफलता में अपना प्रतिबिंब देखते हैं।
धनंजय बाबू का भी यही सपना होता है कि बेटा भावेश इंजीनियर बन कर ही गांव लौटे। उसका दाखिला कोटा के एक कोचिंग सेंटर में करवा देते हैं।
वह साहित्यकार बनना चाहता था, उसकी इच्छा दबी रह जाती है और अनकही मन की भावनाएं एक कापी में पिता के नाम पत्र के रूप में व्यक्त करता है।
उपन्यास का शीर्षक उस पत्र पर विशेष रूप से केंद्रित है जिसे आत्महत्या करने से पूर्व भावेश ने अपने पिता को लिखा था। देखिए पत्र के इस अंश में भावेश की अनकही भावनाएं........ " सब तो बीते समय की बात है, न ! सड़क पर और आगे की तरफ़ चलने का मन न हुआ।
भीड़ बढ़ती देख मन घबराने लगा था। अब तो इस भीड़ शब्द से ही चिड़-सी होने लगी है। मानो सब भेड़-चाल चल रहे हैं। मैं पलटकर, चुपचाप कमरे पर लौट आया। एक बार माँ को इस उम्मीद में फ़ोन लगाया कि एक दिन के लिए ही सही, दीपावली पर घर आने को जरूर कहेगी माँ।
"हेलो !! बोल बेटा भावेश !" "कैसा है तू! बेटा इस बार खूब तैयारी कर। हमें उम्मीद है तू सफल होगा। देखो दीपावली-दशहरा-होली ये त्योहार जीवन में आते-जाते रहते हैं। इनके लिए अपनी पढ़ाई का हर्जा न करो। हाँ, रुपयों की जरूरत हो तो मैं भिजवा दूंगा।"
फ़ोन बाबूजी ने रिसीव किया था। मैं बस इतना ही कह सका था- "बाबूजी ! लम्बा समय हो गया घर आए। इस बार एक दिन के लिए ही सही, दीपावली पर घर आने की इच्छा है।" इसके आगे कुछ न कह सका। यह भी न कह सका कि "मुझे अपने पास बुला लो। मुझे यहाँ की भीड़ से डर लगने लगा है। मुझे आप लोगों से मिलना है। मिलकर बहुत-सी बातें करनी हैं। साथ में दीये जलाने हैं। माँ के हाथ की बनी मिठाईयाँ और पकवान खाना है।"
लेकिन अफ़सोस ! हर बार की तरह इस बार भी, न जाने भावेश जो कह न सका... ।
क्यों जुबान तालू से चिपक गई। बाबूजी कहते रहे और मैं...चुपचाप हाँ...हूँ... कहते हुए एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह सुनता रहा। क्या मैं अपने बाबूजी का कभी प्रतिकार कर सकूंगा?
शायद कभी नही ! कभी नहीं !! हाँ, कभी भी नहीं !!!
इस पन्ने को पढ़ते हुए धनंजय बाबू की आँखों के आगे अंधकार छाने लगा था। महसूस हुआ जैसे किसी ने जोर-से सीने में मूसल मारा हो और वह वहीं गश खाकर गिर पड़ेंगे।"
भावेश ने ऐसी अनेक अनकही भावनाओं को लंबे पत्र में उजागर किया जो उसे सालती रही और तनाव का कारण बन कर आत्महत्या करने को मजबूर कर दिया। पत्र का अंतिम भाग का यह अंश भी कितना भावपूर्ण है..... " खैर पापा !
बातें बहुत हैं। जीवन-भर यही इच्छा करता रहा कि काश!
आप मेरे सिर पर प्यार से हाथ रखकर एक बार ही सही, पूछ तो लेते कि मैं क्या चाहता हूँ। मेरी अपनी क्या इच्छा है?
मैं क्या बनना चाहता हूँ? मुझे क्या तकलीफ़ है? लेकिन यह सब मृगतृष्णा ही साबित हुआ।
शायद आपके शब्दकोष में इन शब्दों, भावनाओं और संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। फ़िर हो भी क्यों?
आप ही तो कहते हैं कि इंसान को दिमाग से काम लेना चाहिए। दिल तो उसे कमज़ोर बना देता है।
पापा ! सभी निर्णय दिमाग़ से नहीं लिए जा सकते एक व्यापारी की तरह सोचता है।
हमारा नफ़ा-नुक़सान किसमें है, इसके जोड़-बाक़ी से काम नहीं चलता। खासकर तब जब अपनों से व्यवहार की बारी आती है।
उनके दिल में झांककर देखने की जरूरत होती है। जिनका दिल आपके प्यार को मचल रहा होता है।
मैं भी कितना मूरख हूँ न !! यह सब भला आपको क्यों लिख रहा हूँ। आपने तो कभी मेरे दिल की पुकार को सुना ही नहीं। ना ही आप समझ सकेंगे। नहीं जानता, आपको इस पत्र को पढ़ने की फुर्सत भी है या नहीं।
पापा! नहीं चाहता था कि आप को पत्र लिखकर आपको परेशान करूँ। आप को कोई दोष दूँ। लेकिन क्या करूँ, क़लम है जो रुकने का नाम नहीं ले रही। मन में कई महीनों क्या, कई सालों से दबा हुआ दर्द आज क़लम के माध्यम से छलक पड़ा है। यह दर्द है जो मुझे चैन से नहीं रहने देता। मन में एक पीड़ा थी जो आपके साथ इस पत्र के माध्यम से साझा कर ली है। मुझे उम्मीद है आप मुझे माफ़ करेंगे।
अच्छा, अब पत्र यहीं पर समाप्त करता हूँ। माँ को प्रणाम। अंजली को मेरा ढेर सारा प्यार।
आपका अभागा बेटा ! भावेश" इस कॉपी में लिखे भावेश के पत्र के साथ मास्टर किशन सिंह जी ने जो अपना पत्र धनंजय बाबू के नाम लिखा उसका यह अंश कितना मार्मिक और संवेदनशील है....... " भावेश से मुलाकात के बाद मैं आवश्यक कार्यवश दस दिन के लिए अवकाश लेकर अपने गाँव चला गया। वहाँ भी चैन से न रह सका। हर वक़्त भावेश का चेहरा आँखों के सामने आ-आकर जैसे अनेक प्रश्न पूछ बैठता।
उस दिन दीपावली का त्योहार था। मेरे मोबाइल पर रिंगटोन बजा।
फ़ोन पुलिस थाने से था। मैं सकपकाया। घबरा भी गया था।
अगले ही क्षण जो कुछ सुना मुझे अपने कानों पर विश्वास न हुआ। लगा जैसे पूरे शरीर का लहू निचोड़ दिया गया हो।
"भावेश ने चम्बल में कूद कर आत्महत्या कर ली !” थानेदार के मुँह से यह शब्द सुनकर मैं जैसे अचेत हो गया था। कुछ सूझ न रहा था।
लगा जैसे किसी ने गर्म सीसा पिघलाकर कानों में डाल दिया हो। मेरी आँखों के आगे अंधकार था।
मुझे ज़रूरी पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया था। मैं तो स्वयं जड़ हो गया था।
वह ( भावेश ) कई रातों तक सोया नहीं था। नींद की गोलियों का सहारा लेना पड़ा।
कहता था कि अब और आगे तनाव सहन न कर सकेगा। आपके पास आकर अपनी भावनाएँ व्यक्त करना चाहता था; लेकिन बगैर आपकी परमिशन के कैसे आता ?
आप तो उन माँ-बाप में से हैं जो बच्चों के मुँह से वही सब कुछ सुनना चाहते हैं जैसा माँ-बाप चाहते हैं; फ़िर भला वह कैसे कह पाता कि उसे नहीं बनना है इंजीनियर।
वह तो इंसान बनकर जीना चाहता है, अपने मन की करना चाहता है, किसी बंदिश में बंधकर रहना नहीं चाहता। कहता था, 'मानव जीवन और मशीनों में फ़र्क तो होना चाहिए।' सच ही तो कहता था।
क्या झूठ कहा था उसने।"
सच पूछिए तो मुझे आप पर ही नहीं आज की व्यवस्था पर तरस आ रहा है। आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ अपनी कमजोरियों, अपनी असफलताओं को अपनी औलाद पर थोपने का चलन बन चुका है, स्वयं के द्वारा देखे गए सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए अपनी औलाद पर थोपा जा रहा है। सपने देखना बुरी बात नहीं। सपने देखने चाहिए और उन्हें हक़ीक़त में बदलने के प्रयास भी ज़रूरी हैं। लेकिन बच्चों को सपने देखने दें। उन पर लादें नहीं।"
इसी गांव के एक परिवार का लड़का मोहित है जो भावेश का मित्र है, जिसके माता पिता उसकी इच्छा का सम्मान कर उसे अपनी इच्छानुसार पढ़ाई कर जीवन में आगे बढ़ने का मौका देते हैं और उसका चयन प्रशासनिक अधिकारी के रूप में होने से पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ जाती है, मिठाइयां बटने लगती है।
उपन्यास में किशन सिंह मास्टर साहब, भावेश, मोहित, नरेश, उसके पिता आशुतोष एक तरफ़ खड़े हैं तो दूसरी तरफ़ धनंजय बाबू, रुक्मणी देवी, अमुराई की मानसिकता-वैचारिकी, कोटा में प्रशिक्षित हो रहे छात्रों के माता-पिता हैं।
बहुत संभव है कि किसी को धनंजय बाबू, रुक्मणी देवी, अमुराई की मानसिकता और छात्रों के माता-पिता निर्दोष दिखाई दें। लेकिन, किशन सिंह मास्टर, भावेश, मोहित और नरेश का ही दोष क्या है?
जो छात्र अच्छे अंक नहीं लाते उन्हें प्रेम और विश्वास मिले तो वे भी अच्छा कर सकते हैं। उनमें से ही तो एक था भावेश के बचपन का मित्र मोहित ।
परिवार के साथ उसकी गांव में वापसी होती है, वह धनंजय बाबू और रूक्मणी देवी के दर्द को नजदीक से देखता है। धनंजय बाबू के आंगन में भावेश के साथ बिताए गए अनगिनत पलों की स्मृतियाँ आँखों के सामने आ-आकर भावुक कर जाती हैं।
" कितना अजीब है न ऋचा, इंसान जिस परिस्थिति, समयकाल से दूर जाना चाहता है। वक्त के एक मोड़ पर आकर उन पलों को पुनः जी भरकर जी लेना चाहता है...।" कहते हुए उसका दर्द छलक आता है।
'बूढ़ों के गाँव अमुराई' की स्थिति देखकर वह भी कहीं-न-कहीं आहत है। अमुराई से जुड़ी उसकी खट्टी-मीठी स्मृतियाँ जेहन में आकर बेचैन करने लगी थीं।
उसने मन-ही-मन एक संकल्प लिया और अपने गाँव अमुराई को पुनर्जीवित करने में सहयोग करता है। " उपन्यास कभी वर्तमान में तो कभी फ्लैशबैक में चलता है।
भाषा गांव के परिवेशानुसार सहज, सरल, जीवंत है तथा संवेदनाओं से परिपूर्ण है। कथानक निरंतर बहती नदी के पानी की तरह प्रवाहमान और जीवन मूल्यों, आदर्शो, मानवता और संवेदनशीलता लिए हुए है।
मास्टर किशन लाल, आशुतोष, नीना मेम और मोहित जैसे पात्र मानवीय दृष्टिकोण, अपनेपन, स्नेह और प्रेम की मिसाल के रूप में स्थापित हैं वहीं धनंजय बाबू और उनकी पत्नी रुक्मिणी देवी जैसे किदार भी हैं जो अपने कठोर व्यवहार और महत्वाकांक्षा के सामने किसी की नहीं चलने देते।
परिवार और समाज के मानवीय पहलू को समसामयिक संदर्भों के परिपेक्ष्य में लेखक ने बहुत ही प्रभावी रूप से उभरा है।
उपन्यास की भूमिका युवा होते किशोरों की विमर्श कथा में विदुषी साहित्यकार डॉ. इंदु गुप्ता लिखती हैं, " उपन्यासकार ने यथार्थ को चित्रित करने के क्रम में फ्लैश बैक तथा चेतना-प्रवाह शिल्प का विलक्षण प्रयोग किया गया है।
फ्रांसीसी रचनाकार पाल वैलरे का मानना है कि 'एक अच्छा उपन्यास अंततः संगीत होता है'।
उपन्यास लेखन के दौरान लेखक द्वारा यथास्थान पत्रों के विन्यास से जो सांगीतिकता उत्पन्न हुई है वह 'भावेश जो कह न सका' के औपन्यासिक पाठ को अपने समय के उपन्यासों में विशिष्ट बनाता है।
औपन्यासिक कृति में विभिन्न सन्दर्भों के तहत कुछ ऐसे सार्थक कथन पिरोये हुए हैं जिन्हें सूक्ति कहा जा सकता है और इनकी एक विशेषता वह सूत्रबद्धता है जो प्रायः सिद्धहस्त रचनाकारों के यहाँ मिलती है।
इसलिए भी उपन्यास पाठक की संवेदना को गहरे प्रभावित करने में समर्थ है। इससे गुज़रते हुए हमारे दिल-ओ-दिमाग में एक ख़ास तरह की कशिश पैदा होती है जो हमारी संस्कारगत जातीय दकियानूसी प्रवृत्तियों को बरतरफ़ करती हुई सुषुप्त मानवीय संवेदना को झकझोर कर जगाती है।
नतीजतन पाठक इससे जुड़कर धीरे-धीरे औरों के प्रति संवेदनशील होते हुए पहले से कुछ और बेहतर इंसान बनने की दिशा में अग्रसर होगा।
कृति 'भावेश जो कह न सका' निश्चित ही किशोर, लिंग और जातिगत विमर्शों के जड़ पड़े दरवाज़ों को खटखटाकर इस दिशा में संवेदनशीलता के नये गवाक्ष खोलने में अहम् भूमिका निभाएगी।"
उपन्यासकार डॉ. सूरज नेगी मेरी बात में लिखते हैं, " यह समस्या केवल महानगरों तक ही सीमित न रही, अब तो कस्बे और गांव भी इससे दो-चार हो रहे हैं।
माँ-बाप वृद्धावस्था में उन बच्चों की राह तकते-तकते परलोक गमन तक कर जाते हैं, बच्चे उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने तक के लिए समय ही नहीं निकाल पाते।
आज के दौर में यह समस्या आम हो गई है। जिस आयु में बच्चों को रिश्तों के प्रति संवेदनशील होना, एक दूसरे के लिए सोचना, दूसरे के मनोभाव का सम्मान करना सिखाया जाना था तब उसे रेस के घोड़े की तरह सिर्फ़ और सिर्फ रेस में दौड़ना और जीतना सिखाया जाता रहा।
और उम्र के एक पड़ाव पर जब उससे कुछ लेने की बारी आती है तब परिवार, समाज का भ्रम टूटता है। और एक असंवेदनशील व्यक्ति सामने होता है।
आज माँ की चिता पर स्वयं लेटकर अपना हिस्सा लेने की शर्त पूरी होने पर ही मृत शरीर को मुखाग्नि देने जैसी दिल दहला देने वाली घटनाएं देखी सुनी जा रही हैं।
यही नहीं बुढ़ापे में वृद्ध माँ-बाप पांवों की बेड़ियां न बनें, उनके लिए वृद्धाश्रम तलाशे जाने लगे हैं। इससे भी बदतर स्थिति, बीमार माँ-बाप को किसी मंदिर या अनाथालय अथवा किसी रेलवे स्टेशन, बस अड्डे तीर्थ स्थल में छोड़ देने जैसी घटनाएं मन को कचोटती हैं।
और विकसित हो रहे समाज के इस दोहरे चरित्र पर देर तक सोचने को मजबूर करती हैं। आख़िर इन सबके लिए कौन है दोषी ?"
आगे लिखते हैं, " मैं इसे किसी एक विमर्श में बांधने की पैरवी नहीं करता। उपन्यास में आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में भाग रहे कहीं माँ-बाप, कहीं समाज, तो कहीं अपने हमउम्र बच्चों की देखादेखी करते मासूम बच्चों की अतिमहत्वाकांक्षा है।
परिणाम भी सामने है; कहीं सिसकता बचपन है तो कहीं सफल न हो पाने से उत्पन्न अवसाद और कहीं इन सबके परिणामस्वरूप हाशिए पर आ चुके उन बुजुर्गों का दर्द भी है जिनकी आंखों में देखे गए सपनों की परिणति इतनी भयावह भी हो सकती है, शायद उन्हें स्वयं को भी मालूम नहीं।
और जीवन के एक मोड़ पर आकर जब गलती का एहसास होता है तब मुँह से एक आह निकलती है। हाय, यह क्या हो गया... कहते हुए वे वृद्ध माँ-बाप मानो स्वयं से ही प्रश्न पूछने लगते हैं।
अफ़सोस तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। लेकिन यह सच्चाई है।"
प्रकाशक का मत है, " उपन्यास 'भावेश जो कह न सका...' आज के युवाओं की मनोवैज्ञानिक पीड़ा और सामाजिक दबावों का मार्मिक चित्रण है। यह कथा अभिभावकीय आकांक्षाओं और किशोरों की व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच के द्वंद्व को उजागर करती है।
कोचिंग संस्कृति, कॅरियर की होड़ और पारिवारिक अपेक्षाओं ने संवेदनशील युवाओं को किस तरह टूटने पर विवश किया है, उपन्यास इसे गहन संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है।
भावेश का जीवन और उसकी त्रासदी समाज को आत्ममंथन के लिए बाध्य करती है। यह कृति न केवल एक कहानी है, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद और समझ की आवश्यकता का गहन संदेश भी देती है।
माता - पिता और अविभावकों की आँखें खोल देने वाला समसामयिक संदर्भ पर आधारित यह उपन्यास उन संदर्भों की परिणीति कहा जा सकता है जब एक ऐसा समय आया जब कोचिंग नगर के रूप में प्रसिद्ध कोटा नगर में कोचिंग छात्रों में आत्महत्या की प्रवृति तेजी से बढ़ने लगी थी।
उन सब के मूल में हमें उसी भावेश का चेहरा दिखाई देता है जो कुछ न कह सका। उपन्यासकार अपनी सशक्त लेखनी से उपन्यास के माध्यम से समाज के लोगों पर बच्चों के कैरियर को ले कर लगे चश्में को सही दिशाबोध कराने के लिए बधाई के पात्र हैं।