पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर द्वारा आयोजित मासिक नाट्य संध्या ‘रंगशाला’ के अंतर्गत रविवार को शिल्पग्राम स्थित दर्पण सभागार में ‘मीता! पंचलैट वाले’ नाटक का मंचन किया गया।
अस्तिता फाउण्डेशन की सांस्कृतिक विंग नाटक का नाट्य रूपांतरण एवं निर्देशन प्रत्येक माह के पहले रविवार को पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर का दर्पण प्रेक्षागृह, नाट्य रसिकों का स्वागत करता है | ‘रंगशाला’ के अंतर्गत यहाँ किसी एक नाटक का मंचन होता है | इस बार बरेली (उत्तर प्रदेश) के नाट्य दल ‘ड्रामा ड्रॉपआउट्स’, के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत ‘मीता!
पंचलैट वाले’ नामक नाटक का मंचन हुआ जिसे लव तोमर ने निर्देशित किया | फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘पंचलाइट’ और ‘तीसरी कसम’, से प्रेरणा लेते हुए नाट्य निदेशक लव तोमर ने अपनी परिकल्पनाओं के साथ लोक नाट्य शैली में इस नाटक का ताना बाना बुना | स्थानीय मौलिक लोक रचनाओं के साथ इसे रोहिलखंडी भाषा-शैली में प्रस्तुत किया | कथानक के अनुसार यह एक पीरियड नाटक था | जिस जमाने में पेट्रोमेक्स लोगों को ही क्या, ग्राम पंचायतों को भी नसीब नहीं होते थे | उस समय की स्थिति का चित्रण किया गया | इस नाटक में गांवों की कई प्रकार की विषमताओं जैसे ,सम्पन्नता,विपन्नता ,रूढीवाद,जातिवाद, अशिक्षा,रोजमर्रा का जीवन संघर्ष और लोगों के आपसी सामाजिक सम्बन्ध, दिखाए गए | नाटक में गाँव वालों के भोलेपन, आत्मीयता, मासूमियत के साथ गाँव की एकता भी परिलक्षित हुई | इस नाटक ने उस समय के उत्तर भारत के ग्रामीण जीवन को जीवंत बनाते हुए मानवीय संवेदनाओं से भरे प्रसंगों को बखूबी के साथ पेश किया | नाटक के केन्द्र में गोधन और मुनरी के प्रेम प्रसंग के ज़रिये अलग अलग स्थितियों जैसे रूढीवादिता,संघर्ष भोलापन, अज्ञानता,ईर्ष्या, झगड़े, मान मुनव्वल सामाजिक बहिष्कार, सामूहिक रजामंदी को संवेदनाओं के साथ पेश किया |वीर, करुण,श्रृंगार, रौद्र,वीभत्स, अद्भुत रसों को बखूबी के साथ पेश किया जिसमें देशी हास्य की प्रधानता थी | निर्देशक ने इस नाटक को मसालेदार बनाने में सेट ,लाइट और साउंड के साथ म्युज़िक का समावेश किया | | दर्शक दीर्घा और एक्जिट द्वारों को भी इस्तेमाल किया | देसी लोक नाट्यों की शैली में होने के कारण सूत्रधारों ने अपनी मजेदार हरकतों और गानों से खासा मनोरंजन किया | नाटक में बताया कि जोश जोश में गाँव के पंचायत के लोग मेले से पेट्रोमेक्स ( पञ्च लाइट ) खरीद लेते हैं, उसे जलाने का मुहूर्त भी निकाल लेते हैं , लेकिन पंचलाईट जलाने में टालमटोल करते हैं | कारण ,शेखी बघारने वाले गाँव के किसी भी व्यक्ति को पंचलाईट जलाना नहीं आता | बहुत देर के बाद उन्हें गाँव के युवा गोधन की याद आती है जो प्रेम प्रसंग के कारण जुर्माना देने के बाद गाँव से निष्काशित कर दिया गया है | उसकी योग्यता और कार्य कौशल के कारण उसे सम्मान के साथ बुलाया जाता है | पञ्चलाइट जलने के बाद उसे सम्मानित किया जाता है | यदि आज के प्रसंग में भी देखें तो जो व्यक्ति तकनीकी ज्ञान और कौशल रखता है फिर चाहे वह किसी भी तबके का हो , अपना मूल्य पाता है | नाटक में सूत्रधार, नन्हे और गजक वाले पंकज कुमार मौर्य ने काफी दाद पाई | उनके रचे ,संगीतबद्ध किये और गाये गीतों ने भी समा बाँध दिया | शोभित गंगवार ने सह-निर्देशन की जिम्मेदारी निभाते हुए गोधन की भूमिका निभाई | मुनरी की भूमिका में आशी सिंह ने प्रभावशाली अभिनय किया।
गुलरी चाची के रूप में माधुरी कश्यप और महुआ घटवारिन के रूप में झलक गंगवार ने भी अपनी अभिनय प्रतिभा की छाप छोड़ी। अमन गुप्ता, विजय कुमार, ऋषभ शर्मा, श्रेय रस्तोगी, आयुष अग्रवाल, सिद्धी रस्तोगी एवं कपिल ने अन्य किरदारों को जीवंत किया।
उदयपुर के दर्शकों की तारीफ़ इसलिए करनी पड़ेगी कि वे बाहर से आये कलाकारों को पूरा सम्मान देते हैं | छोटी मोटी कमियों को नज़रंदाज़ करते हैं | रोहिलखंडी बोली होने और प्रेक्षागृह में ध्वनि के तनिक व्यवधान के कारण कुछ संवाद ठीक से पहुँच नहीं पाए | नाट्य निर्देशक को अगली प्रस्तुतियों में इन पक्षों पर विचार करना चाहिए | बहरहाल सांस्कृतिक केंद्र और बहार से आया नाट्यदल बधाई के हकदार हैं क्योंकि रंगकर्म को जीवित रखने में उनकी भूमिका अहम् है | विलास जानवे --- संस्कृति कर्मी