लाइब्रेरी टूरिज्म एक उभरती हुई अवधारणा है, जो पुस्तकालयों को केवल पुस्तकों के अध्ययन एवं सूचना प्राप्ति के स्थान के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, साहित्य, संस्कृति, विरासत, वास्तुकला, बौद्धिक संवाद और सामुदायिक सहभागिता के पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करती है।

भारत में अनेक ऐसे सार्वजनिक एवं ऐतिहासिक पुस्तकालय हैं, जिनके पास दुर्लभ ग्रंथ, पांडुलिपियाँ, समाचार-पत्र, क्षेत्रीय साहित्य, ऐतिहासिक दस्तावेज, चित्र, अभिलेख और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत उपलब्ध है।

यदि इन संसाधनों को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित एवं प्रचारित किया जाए तो पुस्तकालय भारत के सांस्कृतिक पर्यटन तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।

आईएफएलए-यूनेस्को पब्लिक लाइब्रेरी मैनिफेस्टो 2022 सार्वजनिक पुस्तकालयों को सूचना, शिक्षा, संस्कृति, समावेशन, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र मानता है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए लाइब्रेरी टूरिज्म भारत के सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास की एक नई दिशा बन सकता है।

दशकों से सार्वजनिक पुस्तकालय को मुख्यतः ऐसी संस्था के रूप में देखा गया है जहाँ लोग पुस्तकें, समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ पढ़ने तथा सूचना प्राप्त करने आते हैं। किंतु आज यह परिभाषा पर्याप्त नहीं है। आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालय एक साथ – लाइब्रेरी, कल्चरल सेंटर , लिटरेरी फोरम , हेरिटेज स्पेस , डिजिटल नॉलेज सेंटर , टूरिज्म डेस्टिनेशन की भूमिका निभा सकता है।

पुस्तकों, ज्ञान, साहित्य, विरासत, वास्तुकला, सांस्कृतिक संग्रहों, बौद्धिक गतिविधियों एवं सामुदायिक कार्यक्रमों का अनुभव प्राप्त करने के उद्देश्य से पुस्तकालयों की यात्रा एवं उनमें सहभागिता को लाइब्रेरी टूरिज्म कहा जा सकता है। इसका उद्देश्य पुस्तकालयों का व्यावसायीकरण करना नहीं है, बल्कि पर्यटन के माध्यम से पुस्तकालयों की पहचान, जनसहभागिता, सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान के प्रसार को बढ़ाना है।

भारत में लाइब्रेरी टूरिज्म की आवश्यकता भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों का विशाल नेटवर्क उपलब्ध है। दिसंबर 2025 में भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर देश में 46,746 सार्वजनिक पुस्तकालय दर्ज किए गए थे। इसके बावजूद अधिकांश पुस्तकालय मुख्यधारा के पर्यटन मानचित्र पर दिखाई नहीं देते। यह एक बड़ी संभावना का अप्रयुक्त रह जाना है।

भारतीय पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं : दुर्लभ पुस्तकें,प्राचीन पांडुलिपियाँ, ऐतिहासिक समाचार-पत्र, क्षेत्रीय साहित्य, सरकारी प्रकाशन, स्थानीय इतिहास, दुर्लभ चित्र एवं फोटोग्राफ, साहित्यिक अभिलेख,लोक साहित्य, मानचित्र एवं दस्तावेज , डिजिटल संसाधन एवं पीढ़ियों की सामुदायिक स्मृतियाँ इत्यादि | पर्यटन विभाग जिस प्रकार किलों, महलों, संग्रहालयों और ऐतिहासिक स्मारकों को पर्यटन से जोड़ते हैं, उसी प्रकार पुस्तकालयों को भी भारत के सांस्कृतिक पर्यटन परिदृश्य में शामिल किया जाना चाहिए।

पॉजिटिव फैक्टस प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के स्कूलों में 111.94 करोड़ से ज्यादा किताबें हैं वहीं भारत के स्कूलों की लाइब्रेरी, बुक बैंक और रीडिंग कॉर्नर में करीब 111.94 करोड़ किताबें उपलब्ध हैं।

यूडीआईएसई के अनुसार, देश के 14.66 लाख स्कूलों में औसतन 763 किताबें प्रति स्कूल मौजूद हैं। भारत के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में दिसंबर 2025 तक 46,746 सार्वजनिक पुस्तकालय हैं।

भारत के राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय में 23 भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में किताबें, पीडीएफ, ई-पब, पाठ-से-वाणी और ऑडियो बुक फॉर्म में उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास 32 भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में किताबें उपलब्ध करा रहा है।

भारत के पास 50 लाख से अधिक पांडुलिपियों का संग्रह है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। 2025 में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने भारतीय पुस्तकों को अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद के लिए प्रकाशकों को आर्थिक सहायता देने की नई योजना शुरू की।

भारत के दस प्रमुख पुस्तकालय: लाइब्रेरी टूरिज्म की दृष्टि से संभावना लिए हैं।

इनमें राष्ट्रीय साहित्यिक एवं दस्तावेजी वायरस के लिएनेशनल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया कोलकाता, ऐतिहासिक वास्तुकला, दुर्लभ संग्रह एवं राष्ट्रीय महत्व की कन्नेमारा पब्लिक लाइब्रेरी चेन्नई, सार्वजनिक पुस्तकालय परंपरा एवं सामुदायिक सेवाएँके लिए दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, दुर्लभ पांडुलिपियाँ एवं फारसी-अरबी विरासत के लिए खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी पटना, प्राचीन पांडुलिपियाँ, शास्त्रीय ज्ञान एवं राजकीय विरासत के लिए सरस्वती महल लाइब्रेरी तंजावुर, भारतीय-इस्लामी पांडुलिपियाँ, कला एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए रज़ा लाइब्रेरी रामपुर, ऐतिहासिक सार्वजनिक पुस्तकालय एवं केरल की साहित्यिक संस्कृति के लिए स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी तिरुवनंतपुरम, दुर्लभ पुस्तकें, अभिलेख एवं क्षेत्रीय साहित्य के लिए स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी मुंबई, गोवा की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए कृष्णदास शामा गोवा स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी पणजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालय नवाचार, साहित्य एवं लिटरेरी टूरिज्म की संभावनाओं के लिए राजकीय संभागीय सार्वजनिक पुस्तकालय, कोटा शामिल है।

कोटा का राजकीय संभागीय सार्वजनिक पुस्तकालय, कोटा को वर्तमान राष्ट्रीय रैंक के आधार पर नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं वाले मॉडल सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

आईएफएलए की भूमिका : इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ लाइब्रेरी एसोसिएशंस एंड इंस्टीट्यूशंस (आईएफएलए) लाइब्रेरी टूरिज्म के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यावसायिक एवं नीतिगत दिशा प्रदान कर सकता है।

आईएफएलए का पब्लिक लाइब्रेरीज़ सेक्शन विश्व स्तर पर सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास, नवाचार और अनुभवों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है।

आईएफएलए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाइब्रेरीज़ ऐज़ कल्चरल एंड टूरिज्म डेस्टिनेशंस विषय पर अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश , अंतरराष्ट्रीय मान्यता, ऐसे पुस्तकालयों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता अथवा पुरस्कार की व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो कि वास्तुकला, संस्कृति, स्थानीय विरासत,डिजिटल नवाचार, सामुदायिक सहभागिता और पर्यटन को प्रभावी ढंग से जोड़ते हों में अपनी भूमिका निभा सकता है।

आईएफएलए का पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ द ईयर अवॉर्ड पहले से ही ऐसे सार्वजनिक पुस्तकालयों को पहचान देता है जो वास्तुकला, तकनीक, डिजिटल विकास, स्थिरता और स्थानीय संस्कृति को जोड़ते हैं। भारत के पुस्तकालय अन्य देशों के पुस्तकालयों के साथ लाइब्रेरी टूरिज्म, साहित्यिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के सफल मॉडलों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

यूनेस्को की भूमिका : यूनेस्को की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लाइब्रेरी टूरिज्म का संबंध सीधे सांस्कृतिक विरासत,शिक्षा,साक्षरता, समावेशन,बहुभाषिकता,संरक्षण,ज्ञान समाज और सतत विकास से जुड़ता है।

आईएफएलए-यूनेस्को पब्लिक लाइब्रेरी मैनिफेस्टो 2022 सार्वजनिक पुस्तकालयों को शिक्षा, संस्कृति, समावेशन, सूचना, सामुदायिक सहभागिता तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का जीवंत माध्यम मानता है।

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना में यूनेस्को की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी तथा 1951 में इसका उद्घाटन हुआ था। इसी प्रकार कन्नेमारा पब्लिक लाइब्रेरी का यूनेस्को से ऐतिहासिक संबंध रहा है और 1955 में यह यूनेस्को इन्फॉर्मेशन सेंटर बना था।

इसलिए यूनेस्को के सहयोग से भारत में “लाइब्रेरी हेरिटेज टूरिज्म” अथवा “लिटरेरी एंड लाइब्रेरी हेरिटेज सर्किट” जैसी अवधारणाओं को विकसित किया जा सकता है।

अमेरिकन लाइब्रेरी एसोसिएशन की भूमिका अमेरिकन लाइब्रेरी एसोसिएशन (एएलए) समुदाय आधारित पुस्तकालय सेवाओं और कम्युनिटी एंगेजमेंट के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस दृष्टिकोण को लाइब्रेरी टूरिज्म के लिए उपयोगी रूप से अपनाया जा सकता है। पर्यटक केवल दर्शक न रहें, बल्कि विजिटर , पार्टिसिपेंट, रीडर,कंट्रीब्यूटर एवं लाइब्रेरी एंबेसडर बनें।

उदाहरण के लिए, कोटा आने वाला कोई साहित्य प्रेमी केवल पुस्तकालय की इमारत न देखे, बल्कि किसी लेखक से संवाद करे, कविता पाठ में भाग ले, स्थानीय साहित्य देखे, पुस्तकालय की विशेष सामग्री का अनुभव करे और डिजिटल साहित्यिक संग्रह में योगदान दे। यही एक्सपीरियंस-बेस्ड लाइब्रेरी टूरिज्म होगा।

सरकार की भूमिका लाइब्रेरी टूरिज्म का विकास केवल पुस्तकालय विभाग के प्रयासों से संभव नहीं है।

इसके लिए एक समन्वित मॉडल आवश्यक है | भाषा एवं पुस्तकालय विभाग , पर्यटन विभाग , स्थानीय प्रशासन , विश्वविद्यालय ,साहित्यिक संस्थाएँ ,सार्वजनिक पुस्तकालय, आईएफएलए , यूनेस्को एवं नागरिक समाज समेकित रूप सम्बद्ध हो | भारत में सारवजनिक पुस्तकालय राज्य विषय हैं, जबकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं के माध्यम से पुस्तकालय विकास में सहयोग करती है।

इसलिए राज्य सरकारों को अपनी पर्यटन एवं सांस्कृतिक नीतियों में “लाइब्रेरी हेरिटेज एंड लिटरेरी टूरिज्म” को एक नए घटक के रूप में शामिल करने पर विचार करना चाहिए।

राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय, कोटा: सार्वजनिक पुस्तकालय से राष्ट्रीय साहित्यिक हब की ओर यहीं से यह अवधारणा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

कोटा की पहचान पहले से ही शिक्षा एवं ज्ञान के शहर के रूप में है। देशभर से विद्यार्थी, शिक्षक, अभिभावक और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग कोटा आते हैं।

इस मौजूदा पहचान को एक नई सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा जा सकता है: “कोटा – ज्ञान एवं साहित्य का शहर” राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय, कोटा को ऐसा मंच बनाया जा सकता है जहाँ लेखक, कवि, शोधकर्ता, पुस्तकालयाध्यक्ष, शिक्षाविद्, पत्रकार, अनुवादक और युवा पाठक नियमित रूप से एक-दूसरे से संवाद कर सकें।

प्रस्तावित कोटा लिटरेरी एंड लाइब्रेरी टूरिज्म हब की राजकीय संभागीय सार्वजनिक पुस्तकालय, कोटा में एक स्थायी कार्यक्रम की स्थापना की जा सकती है :“कोटा साहित्य एवं पुस्तकालय पर्यटन हब” के अंतर्गत नेशनल ऑथर्स मीट ,कोटा लिटरेरी फेस्टिवल ,लेखक से मिलिए” कार्यक्रम : हर माह एक प्रतिष्ठित लेखक के साथ संवाद, लिटरेरी रेजिडेंसी में कार्यशालाएं, लाइब्रेरियन–ऑथर डायलॉग एवं देशभर के पुस्तकालय अपने सफल नवाचारों का प्रदर्शन , लिटरेरी वॉक, लिटरेरी हेरिटेज गैलरी , इंडियन लिटरेरी फिगर्स गैलरी, डिजिटल लिटरेरी आर्काइव के कार्य किए जा सकते हैं।

लाइब्रेरी टूरिज्म की सफलता केवल पर्यटकों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। इसके लिए निम्न संकेतक निर्धारित किए जा सकते हैं साहित्यिक आगंतुकों की संख्या, आमंत्रित साहित्यकारों की संख्या, आयोजित कार्यक्रम, प्रतिभागी विद्यार्थी, पर्यटकों की संख्या, नए पुस्तकालय सदस्य, पुस्तकों के निर्गमन में वृद्धि, डिजिटल संसाधनों का उपयोग, प्राप्त साहित्यिक संग्रह, मीडिया कवरेज, संस्थागत साझेदारियाँ, शोध सहयोग एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहभागिता इत्यादि | इससे लाइब्रेरी टूरिज्म केवल एक नारा नहीं, बल्कि मापनीय पुस्तकालय विकास कार्यक्रम बन सकेगा।

लाइब्रेरी टूरिज्म भारत के सार्वजनिक पुस्तकालयों को पुनर्परिभाषित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। पुस्तकालयों को केवल पुस्तकों से भरी शांत इमारतों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्हें ऐसे जीवंत सांस्कृतिक संस्थानों में परिवर्तित किया जा सकता है जहाँ लोग पढ़ें, सोचें, संवाद करें, सृजन करें, इतिहास को समझें और समाज से जुड़ें।

आईएफएलए-यूनेस्को पब्लिक लाइब्रेरी मैनिफेस्टो सार्वजनिक पुस्तकालयों को शिक्षा, संस्कृति, समावेशन, सूचना, सामुदायिक सहभागिता और विरासत संरक्षण का माध्यम मानता है।

लाइब्रेरी टूरिज्म इस दृष्टिकोण को व्यवहारिक रूप प्रदान कर सकता है। राजस्थान के संदर्भ में राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय, कोटा इस दिशा में एक प्रभावी पायलट मॉडल बन सकता है।

भविष्य की प्रस्तावित पहचान राजकीय संभागीय सार्वजनिक पुस्तकालय, कोटा — पुस्तकालय, साहित्य एवं ज्ञान पर्यटन का राष्ट्रीय हब” और इससे भी व्यापक दृष्टि हो सकती है पठन स्थल से साहित्यिक गंतव्य तक; सार्वजनिक पुस्तकालय से राष्ट्रीय ज्ञान केंद्र तक।

यदि इस अवधारणा को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए तो कोटा केवल शिक्षा का शहर नहीं रहेगा, बल्कि भारत के साहित्यकारों, पाठकों, शोधकर्ताओं और पुस्तकालय पेशेवरों के राष्ट्रीय मिलन-स्थल के रूप में भी अपनी पहचान बना सकता है।

“पुस्तकालय को देखने की जगह नहीं, बल्कि ज्ञान, साहित्य और संस्कृति को अनुभव करने की जगह बनाना - यही लाइब्रेरी टूरिज्म की वास्तविक शक्ति है।