उदयपुर। अगस्त से अक्टूबर 2026 के दौरान अल नीनो के मजबूत होने की आशंकाओं के बीच झील विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने उदयपुर के प्राकृतिक जल तंत्र में हो रहे बदलावों को गंभीर चेतावनी बताया है। उनका कहना है कि वेटलैंड क्षेत्र में कमी, कैचमेंट में बढ़ता कंक्रीटीकरण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों में अवरोध और अरावली पहाड़ियों का क्षरण शहर की बदलती जलवायु से निपटने की प्राकृतिक क्षमता को कमजोर कर रहा है।
रविवार को आयोजित संडे लेक डायलॉग में विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य एवं झील-नदी विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि झीलों को केवल जल भंडारण और मनोरंजन के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये उदयपुर की प्राकृतिक जलवायु-अनुकूलन व्यवस्था और पारिस्थितिक सुरक्षा कवच हैं।
उन्होंने कहा कि फतहसागर, पिछोला और चिकलवास पिकअप वियर के ओवरफ्लो होने से पहले उदयसागर का भरना और उसके गेट खोलना केवल सामान्य जल संबंधी घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह पूरे झील-कैचमेंट तंत्र की जल प्रवाह व्यवस्था में बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है, जिसकी वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
डॉ. मेहता ने दो प्रमुख सवाल उठाए। पहला, क्या कैचमेंट क्षेत्र में बढ़ते कंक्रीटीकरण के कारण बारिश का अधिक पानी जमीन में समाकर भूजल रिचार्ज करने के बजाय तेजी से सतही बहाव के रूप में उदयसागर पहुंच रहा है? दूसरा, क्या वर्षों से जमा गाद, मिट्टी भराव अथवा व्यावसायिक निर्माण के लिए किए गए अवैध भूमि उपयोग परिवर्तनों के कारण उदयसागर की वास्तविक जल भंडारण क्षमता कम हुई है?
उन्होंने कहा, “सवाल केवल यह नहीं है कि उदयसागर के गेट क्यों खोले गए। बड़ा सवाल यह है कि पानी इतनी तेजी से उदयसागर तक क्यों पहुंचा और आज झील की वास्तविक भंडारण क्षमता कितनी है।”
डॉ. मेहता ने उदयसागर और उसके कैचमेंट का नवीन बाथिमेट्रिक सर्वे, सेडिमेंटेशन असेसमेंट, कैचमेंटवार वाटर बैलेंस, रेनफॉल-रनऑफ एनालिसिस तथा GIS/रिमोट सेंसिंग आधारित लैंड यूज चेंज असेसमेंट कराने की मांग की। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कितनी वर्षा हुई, कैचमेंट ने कितना पानी अवशोषित किया, कितना पानी सतही बहाव के रूप में उदयसागर पहुंचा और झील की प्रभावी भंडारण क्षमता में कितना परिवर्तन आया है।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग झीलों की पृथक योजना बनाना वैज्ञानिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। मदार-बड़ी से फतहसागर, पिछोला और स्वरूपसागर होते हुए उदयसागर तक पूरा क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ा जल तंत्र है। राजस्थान हाईकोर्ट भी वेटलैंड और जल निकायों को परस्पर जुड़े पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखने तथा उनकी स्थिति, कैचमेंट, अतिक्रमण, प्रदूषण, भूजल रिचार्ज और संरक्षण आवश्यकताओं का वैज्ञानिक आकलन करने पर जोर दे चुका है।
डॉ. मेहता ने कहा कि उदयपुर के सामने उभरती बड़ी चुनौती “जल और तापमान की चरम स्थितियां” हैं। लंबे शुष्क दौर से जल संकट बढ़ सकता है, जबकि कम समय में अत्यधिक बारिश होने पर बड़ी मात्रा में पानी तेजी से बह सकता है। बढ़ती पक्की और कंक्रीट सतहें पानी के जमीन में समाने की क्षमता कम करती हैं। इससे गर्मी के दौरान अर्बन हीट आइलैंड और तेज बारिश के दौरान अर्बन फ्लडिंग का खतरा एक साथ बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि खुली मिट्टी, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों, झीलों के कैचमेंट और वेटलैंड का संरक्षण अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि शहरी जल सुरक्षा और आपदा जोखिम कम करने की आवश्यकता बन चुका है।
लेक डेवलपमेंट अथॉरिटी के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि उदयपुर की झीलों और वेटलैंड को निर्माण के लिए उपलब्ध खाली जमीन समझना भविष्य में बेहद महंगा साबित हो सकता है। वेटलैंड में भराव, कैचमेंट में निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बाधित करना शहर की जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने की प्राकृतिक क्षमता को कमजोर करता है। उन्होंने झील किनारे प्राकृतिक वनस्पति के संरक्षण पर भी जोर दिया।
सामाजिक चिंतक नंद किशोर शर्मा ने कहा कि पर्यटन से जुड़े निर्माण की स्वीकृति में इकोलॉजिकल कैरिंग कैपेसिटी और वाटर बजटिंग को शामिल किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक रूप से यह निर्धारित करना जरूरी है कि शहर का पारिस्थितिक तंत्र कितने होटल, पर्यटक, वाहन, जल उपभोग, सीवेज और ठोस कचरे का दबाव सहन कर सकता है।
शिक्षाविद कुशल रावल ने मदार-बड़ी से उदयसागर तक पूरे झील तंत्र का व्यापक ऑडिट कराने की मांग की। इसमें वाटर बैलेंस, गाद की स्थिति और वास्तविक जल फैलाव क्षेत्र का आकलन शामिल हो। उन्होंने पिछले दो से तीन दशकों में कैचमेंट के भूमि उपयोग, निर्मित क्षेत्र और जल फैलाव क्षेत्र में आए बदलावों का तुलनात्मक अध्ययन कराने की भी मांग की।
युवा झील संरक्षणकर्ता विनोद कुमावत ने कहा कि उदयपुर को अपनी पहाड़ियों, खुली मिट्टी, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों और कैचमेंट क्षेत्रों की रक्षा करनी होगी। उन्होंने कहा, “झील में पानी देखकर खुश होना ही पर्याप्त नहीं है। जिस प्राकृतिक भू-दृश्य से होकर पानी झील तक पहुंचता है, उसका संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।”
वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह ने कहा कि वेटलैंड, अरावली और कैचमेंट क्षेत्रों को सुरक्षित रखा जाए तो बदलते मौसम और जलवायु की चरम परिस्थितियों का सामना करने में उदयपुर कहीं अधिक सक्षम होगा।