बांसवाड़ा। योग योगेश्वर, युगदृष्टा श्री कृष्ण द्वारा स्थापित प्रकृति पूजा का संदेश वर्तमान में स्वस्थ एवं सुरक्षित जीवन के लिए जरूरी है। श्रीमद्भागवत के दो दृष्टांत श्रीकृष्ण के प्रकृति प्रेम की सूचना देते हैं पहला जल जैसे प्राकृतिक साधन पर कुंडली मारे बैठे कालिया नाग का मर्दन करते श्री कृष्ण ने अपनी प्राथमिकताएं सिद्ध कर दीं कि, लोकोपयोगी संसाधनों पर किसी का भी बलपूर्वक एकाधिकार समाज को स्वीकार्य नहीं।

दूसरा देवराज इंद्र जैसे शक्ति-सम्पन्न देवता की उपेक्षा करके गोवर्धन पर्वत का पूजन करवाकर, गोवर्धन को ज्यादा मान देकर युगदृष्टा श्री कृष्ण ने फिर से स्पष्ट किया कि - पहाड़, वन, भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधन इस धरती पर जीवन के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए प्रकृति के विध-विध स्वरूपों से प्रेम ही परमात्मा की वास्तविक भक्ति है।

कर्म का प्रारब्ध स्वयं को ही भोगना है दूसरों को नहीं कर्म फल ईश्वर भी नहीं बदल सकता।जो जैसा करेगा वैसा ही भोगेगा आज नहीं तो कल कर्म योग सिद्धान्त के परिणाम प्राप्त होगे। निष्काम कर्म साधना ही मनुष्य की पूंजी है मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है।

यह कहना है भक्ति आश्रम वैष्णव स्वामी महाराज का।

वे कुशल बाग स्थित अनुज अग्रवाल के कृष्ण सेवा धाम में ध्यान कर्म योग साधना के बाद मंगला आरती , अभिषेक पूजा विधान कर साधक साधिकाओं श्रद्धालुओं को सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने इस अवसर पर कहा कि नवधा भक्ति ही एक सर्वोच्च भक्ति हो सकती है अन्तिम नहीं।भगवान् योगेश्वर श्रीकृष्ण को राधा कृष्ण को रिझाना ही सर्वोत्तम वैदिक धर्म संस्कृति है।

उन्होंने राजस्थान की वीर भूमि को नमन करते हुए कहा कि जनजाति परिक्षेत्र बांसवाड़ा डूंगरपुर सहित वागड़ क्षेत्र की पवित्र भूमि प्रेम की वासल्य की पुण्य भूमि है जिसमें कृष्ण भक्ति के प्रसार प्रचार के विशेष आयोजन इस्कॉन केन्द्र द्वारा किए जाने के निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि राजस्थान के इस दक्षिणांचल पवित्र भूमि पर कृष्ण भावनामृत भक्ति, वासल्य प्रेम की दूध दही की रस धार बहनी चाहिए़। प्रकृति में जीव मात्र को जीने का सहारा होना चाहिए ताकि जीव हत्या रुके।

सेवा,परिश्रम साधना युक्त होकर कृष्ण भावनामृत भक्ति आसक्ति भगवान से अनासक्त प्रेम ही सनातन की पूजा है।

सनातन धर्म संस्कृति और जीवन मूल्यों का सापेक्ष सुरुपण ही जीवन जीने की कला है में नहीं हम में विश्वास विश्व बंधुत्व की आत्मा है।

यानि वसुदेव कुटुंबकम् विश्व बंधुत्व यानि जीव मात्र से प्रेम करना जरूरी है।

मनुष्य को दुःख देने वाला खुद का संकल्प है। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये‒यह जो मन की धारणा है, इसी से दुःख होता है।

अगर वह संकल्प छोड़ दे तो एकदम योग समता की प्राप्ति हो जायगी।

*सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते।* अपना ही संकल्प करके आप दुःख पा रहा है मुफ्त में। संकल्पों का कायदा यह है कि जो संकल्प पूरे होने वाले हैं, वे तो पूरे होंगे ही और जो नहीं पूरे होने वाले हैं, वे पूरे नहीं होंगे, चाहे आप संकल्प करें अथवा न करें।

सब संकल्प किसी के भी पूरे नहीं हुए, और ऐसा कोई आदमी नहीं है, जिसका कोई संकल्प पूरा नहीं हुआ।

तात्पर्य है कि कुछ संकल्प पूरे होते हैं और कुछ संकल्प पूरे नहीं होते‒यह सबके लिये एक सामान्य विधान है। जैसा हम चाहें, वैसा ही होगा‒यह बात है नहीं। जो होना है, वही होगा।

इसलिये अपना संकल्प रखना दुःख को, पराधीनता को निमन्त्रण देना है। अपना कुछ भी संकल्प न रखें तो होने वाला संकल्प पूरा हो जायगा। जैसा तुम चाहो वैसा ही हो जाय‒यह हाथ की बात नहीं है। अतः संकल्प करके क्यों अपनी इज्जत खोते हो ?

कुछ आना-जाना नहीं है ! अगर मनुष्य संकल्पों का त्याग कर दे तो योगारूढ़ हो जाय, तत्त्व की प्राप्ति हो जाय; जो कुछ बड़ा-से-बड़ा काम है, वह हो जाय; यह मनुष्य जन्म सफल हो जाय, कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहे!

अतः अपना संकल्प कुछ नहीं रखो। वह संकल्प चाहे भगवान्‌ के संकल्प पर छोड़ दो, चाहे संसार के संकल्प पर छोड़ दो, चाहे प्रारब्ध होनहार पर छोड़ दो और चाहे प्रकृति पर छोड़ दो।

जो अच्छा लगे, उसी पर छोड़ दो तो दुःख मिट जायगा। भगवान्‌ पर छोड़ दो तो जैसा भगवान्‌ करेंगे, वैसा हो जायगा। संसार पर छोड़ दो तो संसार माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्ब-परिवार आदि की जैसी मर्जी होगी, वैसे हो जायगा।

अपने प्रारब्ध पर छोड़ दो तो प्रारब्ध के अनुसार जैसा होना है, वैसा हो जायगा। अपना कोई संकल्प नहीं करना है। अपना संकल्प रखकर बन्धन के सिवाय और कुछ कर नहीं सकते। होगा वही जो भगवान्‌ करेंगे, जो प्रारब्ध में है अथवा जो संसार में होने वाला है।

भगवान्‌ ने कहा है ‒ शास्त्र की, सन्त-महात्माओं की आज्ञा के अनुसार काम करना है। इसमें कोई भूल होगी तो वह मिट जायगी।

कभी भूल से कोई विपरीत कार्य हो भी जायगा तो वह ठहरेगा नहीं, टिकेगा नहीं, मिट जायगा । खास बात इतनी करनी है कि अपना संकल्प नहीं रखना है। अपना कोई संकल्प न रहे तो आदमी सुखी हो जाय।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था कि हम किसी अन्यायी, अत्याचारी को केवल इसलिए क्षमा नहीं कर सकते कि वह हमारा अपना है, सम्बन्धी है, पड़ोसी है... नहीं! अन्यायी का प्रतिरोध होना ही चाहिए, उसे उसकी करनी का दंड मिलना ही चाहिए।

शास्त्र कहते हैं कि कभी अपात्र को दान नहीं देना चाहिए, फिर किसी अपात्र को क्षमादान कैसे दिया जा सकता है?

अपात्र को क्षमा करना भी अधर्म की श्रेणी में ही आता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने युग के किसी भी अपराधी को क्षमा नहीं किया। न कंस को, न पूतना को, न कौरवों को, न शिशुपाल को। यहां तक कि भीष्म और द्रोण को भी नहीं, अर्जुन और युद्धिष्ठर को भी नहीं... और तो और, भगवान श्रीकृष्ण ने अंत में अपने ही हाथों अपने नाती-पोतों को भी दंडित किया। यही धर्म है, जिसकी स्थापना के लिए श्रीकृष्ण आये थे।

इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान में साधकों को नृसिंह कवच प्रदान करते हुए आचार्य अभिनन्दन निमाई दास,अभय गौरांग दास,कुशाग्र निमाई दास, कृपाली भट्ट कुशल डिम्पल सुनील सुरेश नैमिष अक्षी शाबुनी मंडल दीपिका विभा अर्चना अनिता भारती चैतन्य खुशी त्रिवेदी चरण वंदना दासी श्रीमति रचना व्यास मानस पंड्या कुशल पुनीत सहित कई साधक मंगला आरती गुरु पूजा में सम्मिलित हुए।

गुरु पूजा के बाद स्वामी महाराज चित्तौड़ के लिए प्रवास कर गए।