बांसवाड़ा। विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव श्री किशोर टोकेकर ने कहा है कि किसी भी राष्ट्र का पुनरुत्थान केवल राजनीतिक व्यवस्थाओं, संस्थागत ढाँचों अथवा आर्थिक विकास से संभव नहीं होता, बल्कि उसके लिए सशक्त चरित्र, संस्कार, अनुशासन, सेवा-भाव और राष्ट्रबोध से सम्पन्न मनुष्यों का निर्माण आवश्यक है।

उन्होंने देश की राष्ट्रीय मौलिकता, सांस्कृतिक अस्मिता और सनातन परम्पराओं के संरक्षण के लिए समाज के प्रबुद्ध, सजग और संवेदनशील नागरिकों से संगठित होकर दीर्घकालिक प्रयासों में जुटने का आह्वान किया।

श्री टोकेकर रविवार को श्री पीताम्बरा आश्रम में आयोजित ‘मनुष्य निर्माण से राष्ट्र पुनरुत्थान’ विषयक विशेष वैचारिक विमर्श एवं विचार-सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन गायत्री मण्डल बांसवाड़ा एवं विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी, राजस्थान प्रान्त के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री बड़ा रामद्वारा के प्रमुख संत एवं आध्यात्मिक चिन्तक संत श्री रामप्रकाश जी महाराज ने की।

राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना गंभीर वैचारिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए श्री टोकेकर ने कहा कि राष्ट्र की अवधारणा को केवल राजनीतिक सीमाओं अथवा भौगोलिक परिसीमाओं में बांधकर नहीं देखा जा सकता। राष्ट्र वस्तुतः एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है, जिसका निर्माण साझा इतिहास, परम्पराओं, जीवन-मूल्यों, संस्कारों, सामाजिक स्मृतियों और मातृभूमि के प्रति आत्मीय भाव से होता है।

उन्होंने स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द के राष्ट्र संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी राष्ट्र की आत्मा उसकी सांस्कृतिक चेतना में निहित होती है। जिस समाज का अपनी भूमि, प्रकृति, परम्पराओं और जीवन-दृष्टि के साथ आत्मीय एवं भावनात्मक संबंध बना रहता है, वही समाज दीर्घकाल तक अपनी विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रख सकता है।

उन्होंने कहा कि भूमि को केवल भौतिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि मातृभूमि के रूप में स्वीकार करने की चेतना भारतीय राष्ट्रबोध का मूल तत्व रही है। यहां की वायु, जल, प्रकृति, परम्पराएं और सामाजिक मूल्य भारतीय जीवन-दृष्टि के अभिन्न अंग हैं।

संस्कारित मानव निर्माण सर्वोपरि राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव श्री टोकेकर ने कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का वास्तविक आधार मनुष्य निर्माण है। यदि व्यक्ति चरित्रवान, संवेदनशील, अनुशासित, कर्तव्यनिष्ठ और राष्ट्र के प्रति समर्पित होगा तो परिवार, समाज और राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेंगे।

उन्होंने कहा कि अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूकता भी आवश्यक है। जब तक समाज का सजग नागरिक वर्ग नियमित रूप से वैचारिक, सामाजिक और रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी नहीं करेगा, तब तक बाह्य और आंतरिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना कठिन होगा।

उन्होंने कहा कि विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी इसी दृष्टि के साथ देशभर में अपने विविध प्रकल्पों के माध्यम से व्यक्ति निर्माण, समाज जागरण और राष्ट्र पुनरुत्थान के कार्यों में सक्रिय है।

मौलिक संस्कृति और परम्पराओं को अक्षुण्ण रखना आवश्यक श्री टोकेकर ने कहा कि बदलते समय में समाज के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक अपनी राष्ट्रीय मौलिकता और सांस्कृतिक विशिष्टता को सुरक्षित रखना है। कई बार ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं, जिनमें स्थानीय संस्कृति, परम्पराओं और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण के लिए सजग नागरिकों को भी निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की प्रगति का अर्थ अपनी जड़ों से विच्छिन्न होना नहीं है। आधुनिकता और विकास के साथ-साथ समाज को अपनी सांस्कृतिक चेतना, परम्परागत ज्ञान और जीवन-मूल्यों को भी सहेजकर रखना होगा।

सामूहिक प्रयासों से ही संभव होगा प्रभावी परिवर्तन श्री टोकेकर ने कहा कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए मानव संसाधन से जुड़ी प्रत्येक इकाई में मानवीय संवेदनशीलता, संस्कार, सामाजिक उत्तरदायित्व और देशभक्ति के मूल तत्वों का समावेश आवश्यक है। इसके लिए केवल व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा उद्देश्य के साथ आगे आना होगा।

उन्होंने युवाओं में चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और सेवा-भाव के विकास पर विशेष जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति-व्यक्ति में जागृति का संचार करने के लिए बहुआयामी और प्रभावोत्पादक कार्यों में जुटना आज का सबसे बड़ा युगधर्म है।

आदर्श कर्मयोग और निष्काम सेवा से मजबूत होगा समाज कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संत श्री रामप्रकाश जी महाराज ने कहा कि सेवा और समर्पण की भावना से किया गया निष्काम कर्म ही समाज और राष्ट्र के वास्तविक उत्थान का आधार बनता है। उन्होंने सामाजिक समरसता, पारस्परिक सहयोग और राष्ट्रधर्म के आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि केवल विचारों की अभिव्यक्ति पर्याप्त नहीं है, बल्कि आदर्श एवं अनुकरणीय कर्मयोग के माध्यम से उन विचारों को व्यवहार में उतारना आवश्यक है। व्यक्ति अपने आचरण और सेवा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

जनजाति क्षेत्रों में विविध प्रकल्पों की जानकारी कार्यक्रम का शुभारंभ हिमांशु भैया द्वारा कराए गए सामूहिक प्रणवोच्चार एवं मंगलध्वनि से हुआ। इस अवसर पर विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी के पश्चिम क्षेत्र जनजाति प्रकल्प के अंतर्गत संचालित विभिन्न गतिविधियों की जानकारी कान्तिलाल व्यास ने विस्तार से दी।

विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की राजस्थान प्रान्त संचालिका शकुन्तला दीदी, भीलवाड़ा, प्रान्त संगठक शीतल दीदी, जयपुर, केन्द्र के बांसवाड़ा जिला संचालक हिमांशु सिंह, प्रकल्प प्रमुख कान्तिलाल व्यास, व्यवस्था प्रमुख कमलकान्त भट्ट सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन अनन्त जोशी ने किया।

प्रबुद्धजनों की रही उल्लेखनीय भागीदारी वैचारिक विमर्श में वयोवृद्ध समाजसुधारक एवं चिन्तक लालशंकर पारगी, शिक्षाविद् राजेन्द्रप्रसाद द्विवेदी, जयन्तीलाल भट्ट, सतीश डामोर, गौतमलाल निनामा, नगेन्द्र डामोर, शैलेन्द्र व्यास, रंजना शुक्ला, किरण भट्ट, सह प्रमुख जयगिरिराजसिंह चैहान, मधुसूदन व्यास, मदन भट्ट, मनोहर जोशी, सोनिया वैष्णव, आशीष अधिकारी सहित विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक, आध्यात्मिक एवं राष्ट्रचिंतन से जुड़े संगठनों के पदाधिकारी, जिला समिति के सदस्य, कार्यकर्ता तथा बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं ने राष्ट्र, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक अस्मिता और व्यक्ति निर्माण से संबंधित गंभीर वैचारिक मंथन को अत्यंत एकाग्रता और संवेदनशीलता के साथ सुना।

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