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राजस्थानी भाषा के आंदोलन की मशाल को प्रज्वलित रखने वाली हस्तियों के प्रयासों को गणगौर टीवी सर्वेक्षण से मिली संजीवनी 

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14 Jun 26
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राजस्थानी भाषा के आंदोलन की मशाल को प्रज्वलित रखने वाली हस्तियों के प्रयासों को गणगौर टीवी सर्वेक्षण से मिली संजीवनी 

उच्चतम न्यायालय द्वारा राजस्थान में सरकारी एवं निजी स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा राजस्थानी में अनिवार्य शिक्षा लागू करने की नीति बनाने के राजस्थान सरकार को निर्देश देने के ऐतिहासिक फैसले पर एसएलपी दायर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक जलते दीप एवं राजस्थानी मासिक 'माणक' के प्रधान संपादक पदम मेहता और शिक्षाविद प्रो.कल्याण सिंह शेखावत हाल ही मीडिया की सुर्खियों में आए थे । इसी दौरान वीएआरसी के हालिया सर्वेक्षण में राजस्थानी भाषा के एक टीवी चैनल की लोकप्रियता के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे अत्यंत उल्लेखनीय हैं। राजस्थानी भाषा के आंदोलन की मशाल को प्रज्वलित रखने वाली हस्तियों के प्रयासों को इस सर्वेक्षण से संजीवनी मिली है ।

सर्वेक्षण के अनुसार इस टीवी चैनल  के दर्शकों की संख्या में 278 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जहां दर्शक औसतन 15 मिनट तक चैनल देखते थे, वहीं अब यह समय बढ़कर 34 मिनट तक पहुंच गया है। इसी प्रकार चैनल की कवरेज 3.16 से बढ़कर 4.39 हो गई है, जो लगभग 38 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संबंधित जॉनर के शीर्ष 100 कार्यक्रमों में से 67 कार्यक्रम अकेले इस टीवी चैनल के हैं। यह उपलब्धि बताती है कि दर्शकों ने राजस्थानी भाषा आधारित सामग्री को कितनी बड़ी संख्या में अपनाया है।विशेष उल्लेखनीय बात यह भी है कि चैनल की लोकप्रियता केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों में बसे लाखों राजस्थानी भी इस चैनल से जुड़े हुए हैं। आधुनिक प्रसारण माध्यमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की सहायता से राजस्थानी भाषा अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही है।देश-विदेश में दस  करोड़ राजस्थानियों द्वारा बोली जाने वाली देश की समृद्ध राजस्थानी भाषा की लोकप्रियता और सांस्कृतिक शक्ति का यह सबसे ताजा उदाहरण है। 

हाल ही एक प्रतिष्ठित मीडिया समूह द्वारा हाथ में लिए गए इस टीवी चैनल की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता राजस्थानी भाषा की लोकप्रियता को दर्शाती है। यह सफलता केवल एक टीवी चैनल की व्यावसायिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि राजस्थान की जनता अपनी मातृभाषा और संस्कृति से कितना गहरा जुड़ाव रखती है। भले ही राजस्थानी भाषा को अभी तक भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया हो या  प्रदेश की दूसरी राजभाषा का दर्जा नहीं मिला हो, लेकिन करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन, लोक संस्कृति और भावनाओं में इसकी मजबूत उपस्थिति बनी हुई है। इस  चैनल की  यह अभूतपूर्व सफलता ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि भाषा की वास्तविक ताकत किसी सरकारी मान्यता से नहीं, बल्कि जनमानस की स्वीकार्यता और प्रेम से निर्धारित होती है।

राजस्थान की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता यह है कि यहां गांवों से लेकर शहरों तक राजस्थानी भाषा और उसकी विभिन्न बोलियां आज भी जीवंत हैं। मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, शेखावाटी, मेवाती, ढूंढाड़ी और वागड़ी जैसी बोलियों के माध्यम से करोड़ों लोग अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। जब गणगौर टीवी ने इन्हीं भावनाओं को पहचानते हुए राजस्थानी भाषा को अपने प्रसारण का आधार बनाया, तो लोगों ने इसे हाथों हाथ स्वीकार किया।

एक प्रशासनिक अधिकारी से टी वी पत्रकार बन तेजी के साथ मशहूर हूए रिटायर्ड आई ए एस जगदीश चंद्रा और उनके पार्टनर चौधरी के मार्गदर्शन में पूर्व आईएएस अधिकारी पवन अरोड़ा ने गत 19 मार्च को राजस्थानी भाषा के गणगौर टीवी के पुनः लॉन्च के बाद इसके संचालन की जिम्मेदारी संभाली तो उनके नेतृत्व में चैनल ने राजस्थानी भाषा को केंद्र में रखकर अनेक नए और आकर्षक कार्यक्रम शुरू किए। “चोखी खबरां”, “आओ जाणा कांई केवे मुख्यमंत्री” और “घूमर” जैसे कार्यक्रमों ने दर्शकों के बीच विशेष लोकप्रियता हासिल की। इसके साथ ही मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सार्वजनिक भाषणों को राजस्थानी भाषा में डब कर प्रसारित करने का अभिनव प्रयोग भी दर्शकों को खूब पसंद आया। हर घंटे प्रसारित होने वाला दस मिनट का राजस्थानी समाचार बुलेटिन भी लोगों को अपनी भाषा में समाचार उपलब्ध करा रहा है। चैनल के सीईओ पवन अरोड़ा स्वयं स्वीकार करते हैं कि इतनी कम अवधि में इतनी बड़ी सफलता की उन्हें भी अपेक्षा नहीं थी। उनका मानना है कि इसका पूरा श्रेय राजस्थानियों को जाता है, जिन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए चैनल को भरपूर समर्थन दिया। वास्तव में यह सफलता केवल गणगौर टीवी की नहीं, बल्कि राजस्थानी भाषा के सम्मान और उसके भविष्य की सफलता भी है।

आज वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के दौर में अनेक क्षेत्रीय भाषाएं अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं। ऐसे समय में गणगौर टीवी जैसे मंच यह साबित करते हैं कि यदि स्थानीय भाषा में गुणवत्तापूर्ण सामग्री उपलब्ध कराई जाए तो लोग उसे अवश्य स्वीकार करते हैं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की संस्कृति, परंपराओं, लोककथाओं, इतिहास और जीवन मूल्यों की वाहक भी होती है। गणगौर टीवी ने इन सभी पहलुओं को अपने कार्यक्रमों के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि राजस्थानी भाषा के गणगौर टीवी की बढ़ती लोकप्रियता राजस्थानी भाषा की जीवंतता, व्यापकता और सांस्कृतिक शक्ति का स्पष्ट प्रमाण है। यह सफलता उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए लंबे समय से प्रयासरत हैं। गणगौर टीवी ने यह सिद्ध कर दिया है कि राजस्थानी केवल एक बोली नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं, पहचान और गौरव की भाषा है। यदि इसी प्रकार भाषा आधारित सकारात्मक प्रयास जारी रहे, तो आने वाले समय में राजस्थानी भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सम्मान तथा पहचान प्राप्त होगी। साथ ही  वरिष्ठ पत्रकार पदम मेहता और शिक्षाविद प्रो.कल्याण सिंह शेखावत जैसे राजस्थानी भाषा के आंदोलन की मशाल को प्रज्वलित रखने वाली हस्तियों के राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने राजस्थान में सरकारी एवं निजी स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा राजस्थानी में अनिवार्य शिक्षा लागू करने की नीति बनाने के भगीरथी प्रयास निश्चित रूप से सफल होंगें ।

 


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