भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। इस लोकतंत्र ने समय-समय पर ऐसे नेताओं को जन्म दिया जिन्होंने देश की दिशा और दशा दोनों बदलने का प्रयास किया। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐसे ही दो बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व हैं, जिनकी तुलना अक्सर राजनीति, विकास, विदेश नीति, नेतृत्व शैली और जनस्वीकार्यता के आधार पर की जाती है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या नेहरू और मोदी की तुलना वास्तव में उचित है?
दरअसल दोनों नेताओं का समय, परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ बिल्कुल अलग थीं। पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक ऐसे भारत का नेतृत्व मिला था जो सदियों की गुलामी, विभाजन की त्रासदी, गरीबी, अशिक्षा और संसाधनों की कमी से जूझ रहा था। वहीं नरेंद्र मोदी ऐसे भारत का नेतृत्व कर रहे हैं जो तकनीकी रूप से विकसित हो रहा है, वैश्विक मंच पर मजबूत उपस्थिति रखता है और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दौर में आगे बढ़ना चाहता है।
नेहरू का सबसे बड़ा योगदान आधुनिक भारत की नींव रखना माना जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों, बड़े बांधों, आईआईटी, आईआईएम और अनुसंधान संस्थानों की स्थापना पर विशेष बल दिया। उनके नेतृत्व में भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की राह अपनाई और दुनिया में स्वतंत्र विदेश नीति की पहचान बनाई। उस समय देश को स्थिर लोकतंत्र बनाना सबसे बड़ी चुनौती थी और इसमें नेहरू काफी हद तक सफल रहे।
दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का नेतृत्व निर्णायक, आक्रामक और जनसंपर्क आधारित माना जाता है। उन्होंने डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना, जनधन योजना, जी-20 आयोजन, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के माध्यम से विकास की नई तस्वीर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। मोदी सरकार ने तकनीक, सड़क, रेलवे, एक्सप्रेस-वे, डिजिटल भुगतान और वैश्विक निवेश के क्षेत्र में तेज़ी से काम किया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत की उपस्थिति पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है।
हालांकि दोनों नेताओं की आलोचनाएँ भी कम नहीं रहीं। नेहरू की नीतियों को लेकर चीन युद्ध, कश्मीर मुद्दा और अत्यधिक समाजवादी आर्थिक मॉडल को लेकर प्रश्न उठाए जाते हैं। वहीं मोदी सरकार पर बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक ध्रुवीकरण और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर विपक्ष लगातार सवाल खड़े करता रहा है। लोकतंत्र में आलोचना स्वाभाविक भी है क्योंकि यही स्वस्थ व्यवस्था की पहचान है।
तुलना का सबसे बड़ा आधार अक्सर लोकप्रियता और व्यक्तित्व बन जाता है। नेहरू बौद्धिक, उदारवादी और संस्थागत राजनीति के प्रतीक माने जाते थे, जबकि मोदी जननेता, प्रभावी वक्ता और मजबूत निर्णय क्षमता वाले नेता की छवि रखते हैं। नेहरू किताबों और विचारधारा के नेता थे, जबकि मोदी जनभावनाओं और राजनीतिक रणनीति के कुशल संचालक माने जाते हैं। इसलिए दोनों की राजनीतिक शैली में मूलभूत अंतर दिखाई देता है।
असल में किसी भी दो नेताओं की तुलना केवल समर्थकों या विरोधियों की भावनाओं के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। इतिहास का मूल्यांकन समय, परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के संदर्भ में होना चाहिए। नेहरू ने स्वतंत्र भारत की बुनियाद रखी, जबकि मोदी उस भारत को वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में आगे बढ़ाने का दावा करते हैं। इसलिए दोनों को एक-दूसरे के विरोधी ध्रुव की तरह देखने के बजाय भारतीय लोकतंत्र की अलग-अलग ऐतिहासिक अवस्थाओं के प्रतिनिधि नेताओं के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नेताओं की तुलना करते समय अंधभक्ति या अंधविरोध से ऊपर उठें। किसी भी नेता का मूल्यांकन राष्ट्रहित, लोकतांत्रिक मूल्यों, विकास, सामाजिक समरसता और दीर्घकालिक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। इतिहास किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सतत यात्रा का नाम है। इसलिए नेहरू और मोदी दोनों को उनके-अपने समय और योगदान के संदर्भ में समझना ही सबसे न्यायसंगत दृष्टिकोण कहा जा सकता है।