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आदिवासियों का महातीर्थ बेणेश्वर धाम उमड़ा रहा भजन-भक्ति का ज्वार

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03 Feb 26
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आदिवासियों का महातीर्थ बेणेश्वर धाम उमड़ा रहा भजन-भक्ति का ज्वार

आदिवासियों का महाकुंभ कहा जाने वाला बेणेश्वर महामेला इन पिछले कई दिन से निरन्तर जारी है। यह कृष्ण पक्षीय पंचमी तिथि 6 फरवरी 2026, शुक्रवार को हरि मन्दिर पर ध्वजावतरण के साथ सम्पन्न होगा।

प्रसिद्ध भविष्यवक्ता एवं अछूतोद्धारक संत तथा लीलावतार के रूप में लाखों-करोड़ों भक्तों में पूज्य रहे मावजी इस क्षेत्र की धड़कन में समाहित हैं। आज भी श्रीकृष्ण के अंशावतार की तरह मावजी महाराज के प्रति अनन्य श्रद्धा के भाव विद्यमान हैं। यह बेणेश्वर धाम मावजी की लीलास्थली रहा है।

हिन्दुस्तान में वनवासियों के इस सबसे बड़े मेले को ‘आदिवासियों के कुम्भ’ की संज्ञा दी गई है। वनवासी संस्कृति एवं समाज के विभिन्न आयामों का जीवन्त दिग्दर्शन कराने वाला यह मेला आंचलिक संस्कृति का प्रतिदर्श है, जिसे देखकर वागड़ अंचल के सामाजिक एवं परिवेशीय परिवर्तनों का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है।

ख़ासकर इस मेले में उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों से अलग-अलग सम्प्रदायों, मतों, पंथों, अखाड़ों, धूणियों एवं आश्रमों-मठों से जो महंत, भगत एवं समाज सुधारक हिस्सा ले रहे हैं। उनके द्वारा दिन-रात प्रवाहित भक्ति लहरियां वातावरण को आध्यात्मिक सुरभि से महका देती है और समूचे बेणेश्वर में समकालीन भक्ति धाराओं के कई-कई  चित्र अच्छी तरह उभर कर सामने आते हैं।

तानपूरे, तम्बूरे, कौण्डियों, ढोल, मंजीरे, हारमोनियम आदि लोक वाद्यों की संगत पर मेले में जहां-तहां डेरा डाले भक्तों के समूह भक्ति की तान छेड़ने में मस्त हैं। इससे पूरे बेणेश्वर धाम की फिजां भक्ति की सुगंध से भर उठी है।

यहां राधा-कृष्ण मंदिर परिसर, बेणेश्वर शिवालय और ख़ासकर वाल्मीकि मंदिर भक्ति-धाराओं का प्रवाह केन्द्र बना हुआ है। एकान्त पसन्द करने वाले फक्कड़ किस्म के संत और महंत तथा भक्त नदी तट या पहाड़ के एकान्त छोर पर बैठकर भजनानंद में व्यस्त हैं। अपने मत के निसान (ध्वजाएं) जमाएं, भगवान के पालकों के सम्मुख धूंणी रमाए इन संतों की वेशभूषा, पहनावा, बोली, भाव मुद्राओं पर नाचते-झूमते संकीर्तन आदि सब कुछ अनेकता में एकता के मंत्र गुंजा रहे हैं।

दिन-रात चलने वाले भक्ति कार्यक्रमों में इनके अनुयायी भारी संख्या में जमा हैं। वाल्मीकि मंदिर पर तो वनवासी भगतों का सैलाब उमडा है, जहां एटीवाला पाड़ला के महंत की पालकी आने के बाद से ही भजन गंगा प्रवाहित हो रही है। हवन भी हो रहा है।

राधा-कृष्ण मंदिर परिसर में साद सम्प्रदाय के लोगों का ख़ासा जमावड़ा बना हुआ है, जो मावजी की भविष्यवाणियों का गान करता है, रासलीला और मावजी संवादों में व्यस्त रहता है। बेणेश्वर की भक्ति धाराओं में देश, समाज, धर्म, मंदिर, इतिहास पुरुषों, कबीर, सुरमाल, मावजी, गोविन्द गुरु, गवरी बाई, मीराबाई से लेकर देश के तमाम संतों, भक्त कवियों और लोक देवताओं का स्तुतिगान एवं वाणियों का गान होता है, इस दृष्टि से भक्ति साहित्य का यह अनूठा मेला कहा जा सकता है।

इस मेले में भक्ति धाराओं के माध्यम से जीवन में सादगी, आस्तिकता, पवित्रता, लोक कल्याण और सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों को अच्छी तरह संकेतित किया जाता रहा है।

स्वातंत्र्य चेतना का शंखनाद करने गाया गया यह भजन आज भी भक्तों के मन-मस्तिष्क में छाया हुआ है-

‘झालोद म्हारी कुण्डी है, दाहोद म्हारी थाली,

नी मानूं रे भूरेटिया, नी मानूं रे...

दिल्ली म्हारी डंको है, बेणेसर म्हारो सोपड़ो

नी मानूं से भूरेटिया, नी मानूं रे...।’

 

आशावादी भावों का संचार करते हुए भक्त ‘सतजुग आवेगा, आवेगा, सतजुग आवेगा’ और’ फलेगा रे फूलेगा रे धरम नी वेलड़ी फलेगा...’ आदि के साथ मावजी की वाणियों एवं भविष्यवाणियों का गान होता है तब लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते ही रह जाते हैं। कई भक्त कीर्तन करते हुए झूमते रहते हैं।

इसी दौरान भगतों, महंतों एवं समाजसुधारकों द्वारा चेतना सभाएं ली जाती हैं, जिनमें कृषि एवं पशुपालन प्रधान वनांचल में गौरक्षा, गोचर भूमि की माकूल व्यवस्था, हरेक परिवार को गौपालन हेतु प्रेरित करने, दारु, दापा और दहेज से मुक्ति, साक्षरता एवं शिक्षा के विस्तार आदि का आह्नान किया जाता है और सामाजिक समरसता के महत्वपूर्ण उपायों पर वृहत चर्चा की जाती है।

वागड़ अंचल के कोने-कोने से आए महंतों एवं भगतों के अलावा देश के विभिन्न भागों से आने वाले महंतों एवं भगतों का कुम्भ भरा हुआ है, जिसमें संत समाज एवं भक्तों की लोक कल्याण में भूमिका पर विचार-विमर्श के दौर जारी हैं।

मूल रूप से बेणेश्वर मेला भक्ति रस का महामेला ही है, जहां देश की भक्तिधाराओं के विविध रूपों में दर्शन सहज ही करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। युगों से यह मेला अध्यात्म चेतना एवं समाज सुधार का संदेश मुखरित करता आ रहा है।


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