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महर्षि दयानन्द भारत को वैदिक राष्ट्र बनाना चाहते थे: आचार्य अनुज शास्त्री

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25 Jan 26
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महर्षि दयानन्द भारत को वैदिक राष्ट्र बनाना चाहते थे: आचार्य अनुज शास्त्री

रविवार दिनांक 25-1-2026 को आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के साप्ताहिक सत्संग में हम सम्मिलित हुए। समाज मन्दिर में प्रातः 8.30 बजे से यज्ञ सम्पन्न करके सत्संग का आरम्भ किया गया। यज्ञ के बाद भजन, इसके पश्चात सामूहिक प्रार्थना और ऋषि दयानन्द जी के पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय रचित जीवन चरित से कुछ अंशों का पाठ किया गया। आज का व्याख्यान आर्यसमाज के युवा विद्वान आचार्य अनुज शास्त्री जी का था। आचार्य जी ने दिनांक 26 जनवरी, 2026 को गणतन्त्र दिवस को सम्मुख रखकर आर्यसमाज की राष्ट्रवादी विचारधारा को केन्द्र में रखकर अपने विचारों को प्रस्तुत किया। आचार्य जी ने कहा कि देश में हिन्दी चीनी भाई भाई का जो नारा दिया गया था वह गलत था। उन्होंने कहा कि कुछ शताब्दियों पहले चीन के सैकड़ों वा हजारों लोग भारत में विद्या प्राप्त करने आते थे और तक्षशिला व नालन्दा आदि विश्वविद्यालयों वा गुरुकुलों में विद्या ग्रहण कर अपने देश को लौट जाते थे। आचार्य जी ने कहा कि चीन हमारा शिष्य तो कहा जा सकता था परन्तु हिन्दी व चीनी भाई भाई का नारा लगाना गलत था। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने शिष्य को भाई कहेंगे तो वह अपना अधिकार मागेंगा और इस कारण से हिन्दी चीनी भाई भाई का नारा गलत सिद्ध होता है। आचार्य जी ने राजनेता श्री राम मनोहर लोहिया और चैधरी चरण सिंह जी का उल्लेख किया और उनके विचारों व कार्यों की प्रशंसा की।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने बताया कि आर्यसमाज ने वर्ष 1969 में आर्यसमाज द्वारा मूर्तिपूजा पर काशी शास्त्रार्थ की शताब्दी पर कार्यक्रम का आयोजन किया था। आर्यसमाज ने इसमें मूर्तिपूजा करने वाले मतों के विद्वानों को शास्त्रार्थ के लिये आमंत्रित किया था परन्तु मूर्तिपूजा का समर्थक कोई विद्वान शास्त्रार्थ करने नहीं आया। आचार्य जी ने बताया कि इस आयोजन में चैधरी चरण सिंह जी का मूर्तिपूजा की अवैदिकता पर 1 घंटे का भाषण हुआ था। आचार्य अनुज शास्त्री ने हिन्दू राष्ट्र की चर्चा की और इसे गलत बताते हुए कहा कि हमें वैदिक राष्ट्र का नारा लगाना चाहिये। उन्होंने वैदिक राष्ट्र के पक्ष में अनेक तर्क दिए। उन्होंने कहा कि भारत के वैदिक राष्ट्र बनने पर समाज बेहतर बनेगा। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द के समय में व उनसे पूर्व हजारों ऐसे विद्वान हुए जिन्हें वेद कण्ठस्थ थे। ऐसे विद्व़ानों में से कोई एक भी वैदिक राष्ट्र बनाने की कल्पना नहीं कर सका। आचार्य जी ने कहा कि हमारे पांच शंकराचार्यों ने पांच प्रकार के मत चलाये हैं। आचार्य जी ने इन मतों के नामों का भी उल्लेख किया। आचार्य जी ने आगे कहा कि दक्षिण भारत में अनेक गुरुकुल संचालित होते हैं जहां 300 से 400 तक ब्रह्मचारी अध्ययन करते हैं। इन गुरुकुलों के अनेक विद्यार्थियों ने वेदों को कण्ठस्थ किया है परन्तु इन विद्यार्थियों को सत्य वेदार्थ का ज्ञान नहीं है। आचार्य जी ने बताया कि ऋषि दयानन्द को वेद ऐसे ही वेदपाठी ब्राह्मणों के द्वारा प्राप्त हुए थे। आचार्य जी ने कहा कि यदि ऋषि दयानन्द के पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा वेदों के सत्य अर्थों का प्रचार किया गया होता तो देश में अज्ञान, अन्धविश्वास और पाखण्डों का विस्तार न होता। आर्यसमाज के विद्वान आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि देश में सर्वत्र मदिरालय स्थापित थे जहां देश के लोग मदिरा क्रय करके मदिरा का पान करते थे परन्तु हमारे किसी शंकराचार्य ने इन मदिरालयों के विरुद्ध कभी कोई आन्दोलन नहीं किया। उन्होंने कहा कि हमारे किसी शंकाराचार्य ने कभी किसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध भी आन्दोलन नहीं किया। आचार्य जी ने कहा कि हमारे शंकराचार्य अपनी निजी समस्याओं को लेकर आन्दोलन करते हैं परन्तु वह समाज के सुधार के लिये बुराईयों का विरोध नहीं करते।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द जी की पुस्तकें आज भी क्रान्तिकारी युवकों को पैदा कर रहीं हैं। आचार्य जी ने श्रीपाद् दामोदर सातवलेकर का जी का उल्लेख किया और कहा कि चारों वेदों के भाष्यकार श्री दामोदर सातवलेकर ने काशी जाकर संस्कृत व्याकरण का अध्ययन किया था। सातवलेकर जी ने ऋषि दयानन्द जी के ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था। सातवलेकर जी ने अध्ययन पूरा करके ‘वैदिक प्रार्थनाओं की ओजस्विता’ पर 24 पृष्ठों का एक लेख लिखा था। उनका यह लेख समाचार पत्र ‘विश्ववृत्त’ के एक अंक में प्रकाशित हुआ था। सातवलेकर जी जानते थे कि इस लेख से समाज में क्रान्ति उत्पन्न होगी। इस लेख को समकालीन अनेक युवाओं ने पढ़ा और उससे देश प्रेम एवं स्वराज्य की प्रेरणा ली। अंग्रेजों ने इस लेख का संज्ञान लिया और लेख के प्रकाशक, सम्पादक और मुद्रक को पकड़ लिया था और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। लेख के प्रकाशक व मुद्रक इन बन्धुओं को ढाई वर्ष का कारावास दिया गया था। सातवलेकर जी को भी ढूंढा गया। वह गुरुकुल कांगड़ी से बंदी बनाये गये थे। समाचार पत्र की बची हुई सभी प्रतियों को अंग्रेजों ने जला दिया था। आचार्य जी ने कहा कि राष्ट्र का पहला उद्देश्य ‘स्वराज्य’ होना चाहिये। यह बात सातवलेकर जी ने अपने लेख में अनेक वेदमंत्रों का उल्लेख कर लिखी थी। उन्होंने लिखा था कि हमें हर प्रकार से स्वराज्य को प्राप्त करना चाहिये।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने बताया कि सन् 1908 में ‘स्वयं सेवक’ शब्द का पहली बार प्रयोग हुआ। उन्होंने बताया कि सब राष्ट्रभक्तों ने सातवलेकर जी के लेख से स्वयं सेवक बनने की प्रेरणा ली थी। सातवलेकर जी का यह लेख श्री केशव बलीराम हेडगेवार जी के हाथों में भी लगा। इसकी प्रेरणा से उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठन के गठन का कार्य किया। आचार्य जी ने बताया कि श्री केशव बलिदाम हेडगेवार जी के पिता बलिराम जी आर्यसमाजी थे। वह पुरोहित का कार्य करते थे। हेडगेवार जी ने वीर दामोदर सावरकर जी से भी प्रेरणा ग्रहण की थी। आचार्य जी ने आरएसएस के गठन में ऋषि दयानन्द के विचारों का योगदान बताया। उन्होंने कहा कि श्री केशव बलिराम हेडगेवार आर्यसमाजी थे। आचार्य जी ने कहा कि हेडगेवार जी के बाद श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर जी आरएसएस के सरसंघचालक बने। उनके आदर्श स्वामी विवेकानन्द जी थे। इसी कारण आरएसएस ने स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श बनाया। आचार्य अनुज शास्त्री जी ने बताया देश के लिए बलिदान देने वाले प्रसिद्ध कांन्तिकारी युवक भगतसिंह के अन्दर भी स्वामी दयानन्द जी की प्रेरणा काम कर रही थी। आचार्य जी ने भगतसिंह जी के बारे में विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए। आचार्य जी ने भगतसिंह जी की जेल डायरी के छपने की चर्चा की। उन्होंने बताया कि पंजाब का लाहौर क्रान्तिकारियों तथा आर्यसमाज का गढ़ था। पंजाब में आर्यसमाजी लगभग पांच प्रतिशत थे। भगत सिंह जी ने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि राष्ट्र भक्ति की सभी गतिविधियां पंजाब में आर्यसमाजी ही चलाते थे। वि़द्वान वक्ता ने बताया कि भगतसिंह जी का बचपन में यज्ञोपवतीत संस्कार उनके दादा अर्जुन सिंह जी ने कराया था और इसे आर्यसमाज के पुरोहित पं. लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी ने किया था। आचार्य जी ने बताया कि भगतसिंह जी आर्यसमाज के विद्वान पं. उदयवीर शास्त्री जी से पढ़े थे। भगतसिंह जी आर्यसमाज के कई और शिक्षकों से भी अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़े थे। आचार्य जी ने कहा कि भगत सिंह जी के भीतर ऋषि दयानन्द जी का चिन्तन कूट-कूट कर भरा हुआ था।

आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द भारत को वैदिक राष्ट्र बनाना चाहते थे। विद्वान आचार्य ने कहा कि विचार मनुष्यों को महान बनाते हैं और बुरे विचार मनुष्यों को नीचे भी गिराते हैं। आर्यसमाज के विद्वान अनुज शास्त्री ने कहा कि हमें गायों को बचाने के लिये आगे बढ़कर काम करना चाहिये। आचार्य जी ने देश को वैदिक राष्ट्र बनाने पर बल दिया। आचार्य जी ने आगे कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र चाहे बने या न बने परन्तु भारत को वैदिक राष्ट्र बनना चाहिये। वैदिक राष्ट्र की विशेषता बताते हुए आचार्य जी ने कहा कि वैदिक राष्ट्र में कोई शराबी, चोर, कंजूस मांसाहारी और व्यभिचारी नहीं होता। आचार्य जी ने वेदानुयायी महाराजा अश्वपति जी की घोषणा को संस्कृत के शब्दों में अपने ओजस्वी स्वरों में प्रस्तुत किया। आचार्य जी ने अपने व्याख्यान में महाराज युधिष्ठिर जी के अश्वमेध यज्ञ का भी उल्लेख किया और बताया इस यज्ञ में अमेरिका, कान्धार और अनेक देशों के राजाओं ने यधिष्ठिर जी को अपना सम्राट माना था। आचार्य अनुज शास्त्री जी ने कहा कि भारत की सेना सबसे गौरवमयी सेना है। गलवान में भारत के सैनिकों के शौर्य का वर्णन भी आचार्य जी ने अपने व्याख्यान में किया। आचार्य जी ने कहा कि जब वेद के आधार पर वैदिक राष्ट्र बनेगा तभी विश्व में सुख व शान्ति स्थापित होगी। आचार्य जी ने सभी श्रोताओं को वेदों की शिक्षाओं को जन जन तक पहुंचाने की प्रेरणा की।

आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी ने आचार्य अनुज शास्त्री जी का आज के सुन्दर व प्रेरणादायक सम्बोधन के लिये धन्यवाद किया। आर्यसमाज के नियमों के पाठ तथा शान्ति पाठ के साथ आज का सत्संग समाप्त हुआ। आज के सत्संग में बड़ी संख्या में स्त्री व पुरुष सम्मिलित हुए। ओ३म् शम्।

 


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