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“धर्म की रक्षा के लिए वेदों का प्रचार-प्रसार  आवश्यक हैः आचार्य सुनील शास्त्री”

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30 Mar 26
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“धर्म की रक्षा के लिए वेदों का प्रचार-प्रसार  आवश्यक हैः आचार्य सुनील शास्त्री”

     आर्यसमाज धामावाला, देहरादून में रविवार दिनांक 29-3-2026 को आयोजित सत्संग में प्रातः 8.30 बजे यज्ञशाला में यज्ञ हुआ जिसमें आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने यज्ञ कराया। यज्ञ में आर्यसमाज के कुछ सदस्यों एवं श्रद्धानन्द बालवनिता आश्रम के बालक व बालिकाओं द्वारा यजमानरूप में उपस्थित होकर घृत एवं यज्ञ सामाग्री से आहुतियां दी गईं। यज्ञ के बाद भजन, सामूहिक प्रार्थना सहित आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द सरस्वती जी के पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी रचित जीवनचरित्र से कुछ अंशों का पाठ किया गया। इसके पश्चात सामूहिक प्रार्थना हुई। आज का व्याख्यान आर्यसमाज के विद्वान आचार्य सुनील शास्त्री जी का निर्धारित था। अपने व्याख्यान में आचार्य जी ने वेदों की रक्षा से जुड़े अनेक प्रश्नों को प्रस्तुत कर उनका समाधान किया। उन्होंने कहा कि रक्षा उस वस्तु व वस्तुओं की की जाती हैं जिनके नष्ट होने व विलुप्त होने का भय होता है। वेदों के बार में भी विद्वान वक्ता ने कहा कि यदि हम सब लोग वेदों का अध्ययन नहीं करेंगे तो हम व हमारे बाद के लोगों को वेदों के मन्त्रों के यथार्थ अर्थों को जान नहीं पायेंगे। ऐसा ही महाभारत के बाद हुआ था। लोगों को वेदों के मन्त्रों के सत्य अर्थ विस्मृत हो गये थे। 

    वेदों की पुस्तकें व संहितायें भी प्रायः विलुप्त हो गईं थी जिनको प्राप्त करना कठिन था। ऋषि दयानन्द ने गुरु विरजानन्द सरस्वती जी को प्राप्त होकर मथुरा में उनसे वेदों की भाषा दैवीय संस्कृत के व्याकरण अष्टाध्याय-महाभाष्य-निरुक्त पद्धति से अध्ययन किया और योग विद्या में प्रवीण होकर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर व ईश्वर का साक्षात्कार करके वेदों के अर्थों को जानकर वेदों के सत्य अर्थों से देश की जनता को लाभान्वित किया। आचार्य सुनील शास्त्री जी ने अपने व्याख्यान में यह भी चर्चा कि वेद किन-किन स्वरूपों में उपलब्ध होते हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यतः वेद संहिताओं व पुस्तक के रूप में उपलब्ध होते हैं। वेदों की संहिताओं पर हमें ऋषि दयानन्द सहित वैदिक परम्परा के अनेक आर्य विद्वानों के वेदार्थ भी पुस्तक रूप में उपलब्ध होते हैं। आचार्य जी ने कहा कि इन संहिताओं व पुस्तकों का कालान्तर में नाश अर्थात् इनकी विलुप्ति हो सकती है। उन्होंने बताया कि इन वेदों व वेदों के सत्य अर्थों की रक्षा की बात महर्षि पतंजलि अपने योगदर्शन में करते हैं। आचार्य जी ने कहा कि वेदों का ज्ञान हमें माता से प्राप्त होने वाले ज्ञान के तुल्य है। यह ज्ञान हमारे दोनों माता व पिता परमात्मा से सृष्टि के आरम्भ में मिला है। वेदों का अध्ययन करने व इनका ज्ञान होने पर हमें सभी विषयों का यथार्थ बोध होता है। सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न मनुष्यों को सृष्टि सहित अपने सभी कर्तव्यों व आत्मा तथा शरीर की उन्नति विषयक ज्ञान ऋषियों के द्वारा वेदों के प्रवचन व उनके प्रचार से ही हुआ था। आज भी वेदों का ज्ञान प्रासंगिक एवं सभी ज्ञानों से अधिक प्रामाणिक एवं उपयोगी है। वेद ज्ञान को प्राप्त होकर मनुष्य की शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति होती है। मनुष्य वेदों के ज्ञान को प्राप्त कर उपासना को सिद्ध कर ईश्वर का साक्षात्कार करते हुए धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होते हैं। यही जीवन के चार पुरुषार्थ होते हैं जिनको मनुष्य जीवन में ही सिद्ध किया जा सकता है और यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी होता है। आचार्य जी ने कहा कि वैदिक परम्परा में मनुष्य को वेदानुकूल आचरण करके मोक्ष अर्थात् आवागमन से अवकाश व मुक्ति को प्राप्त कर ईश्वर के सान्निध्य में उपलब्ध आनन्द में विचरण करना होता है। मोक्ष में जीवात्मा को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता अपितु हर क्षण व हर पल आनन्द का अनुभव होता है। मोक्ष का आनन्द ऐसा आनन्द होता है कि इस आनन्द से बढ़कर संसार में और कोई भी सुख नहीं होता है। 

    आचार्य सुनील शास्त्री जी ने बताया कि सृष्टि के आरम्भ में सहस्रों वर्ष तक वेदों का अध्ययन व रक्षा श्रुति व श्रवण के माध्यम से वेदों के मन्त्रों को याद कर उनके अर्थों का जन-जन में प्रचार करके की जाती रही। आचार्य जी ने कहा कि श्रुति व श्रवण के द्वारा, मनुष्य की आत्मा, बुद्धि व मन में विद्यमान वेद वा वेदज्ञान का अभ्यास कर, यदि उन्हें स्मरण न रखा जाये तो यह वेदों का ज्ञान भी कालान्तर में नष्ट हो सकता है और इस परम्परा के अवरुद्ध होने पर वेदों का ज्ञान भावी पीढ़ियों में संचरित नहीं हो पाता। इस व्यवधान को ही वेदों का नाश व उनकी विलुप्ति होना कहा जाता है। आचार्य सुनील शास्त्री जी ने बताया कि वेदों का मूलस्वरूप व उसके सत्य अर्थ परम पिता परमात्मा में सदैव निहित व सुरक्षित रहते हैं। परन्तु हम इन्हें सीधे परमात्मा से प्राप्त न कर परम्परा, वेद के विद्वानों तथा वेद की पुस्तकों आदि से ही प्राप्त कर सकते हैं। आचार्य सुनील शास्त्री जी ने बताया कि वेदों का मूलस्वरूप ज्ञान-विज्ञान से युक्त होता है। यह स्वरूप सदैव परमात्मा में निहित व सुरक्षित रहता है। परमात्मा में निहित वेदों के सत्यस्वरूप व वेदार्थों को हमारी रक्षा की आवश्यकता नहीं होती। परमात्मा में निहित वेदों का सत्यस्वरूप सदैव, सृष्टि की आदि से अन्त तक तथा प्रलयावस्था में नाशरहित रहता है। 

    आचार्य सुनील शास्त्री जी ने धर्म का मूल वेदों को बताया। इसके मनुस्मृति में उपलब्ध प्रमाणों से भी आचार्य जी ने श्रोताओं को अवगत कराया। आचार्य जी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए वेदों का प्रचार-प्रसार आवश्यक है।यदि किसी कारण वेदों का सत्यस्वरूप विस्मृत हो जाता है तो धर्म भी अपने सत्यस्वरूप में जन जन में सुलभ नहीं होता है। आचार्य जी ने कहा कि वेदों की रक्षा हमें अपनी वा मनुष्य जाति की रक्षा के लिये भी आवश्यक है। वेदों की रक्षा से ही हम व हमारी मनुष्य जाति धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को जानकर इन्हें प्राप्त कर सकती है। आचार्य सुनील शास्त्री जी ने आर्यसमाज के तीसरे नियम की चर्चा की और कहा कि वेदों की रक्षा आर्यसमाज के तीसरे नियम के पालन से होगी जिसमें कहा गया है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है तथा वेदों का पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सब आर्यों व मनुष्यों का परम धर्म व परम कर्तव्य है। आचार्य जी ने ऊहा का उल्लेख कर कहा कि ऊहा विचार, तर्क एवं विचारों व मान्यताओं के उचित प्रयोग को कहते हैं। आचार्य जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि हम जो वैदिक कर्मकाण्ड करते हैं उसका प्रभाव हमारे जीवन पर दिखाई देना चाहिये। सन्ध्या एवं यज्ञ आदि करने वाले मनुष्यों का जीवन शुद्ध, सात्विक एवं देश एवं समाज के हित के कार्यों से जुड़ा हो, यह उनके सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को दिखाई देना चाहिये। आचार्य जी ने श्रोताओं को यह भी बताया कि वेद स्वतः प्रमाण है। उन्होंने कहा कि वेदों का आगम भी कहा जाता है। इसका अर्थ यही है कि वेद व उसके सभी विधान स्वतःप्रमाण कोटि में आते हैं जिन्हें हमें अपने जीवन में स्थान देना चाहिये। आचार्य जी ने श्रोताओं को यह भी कहा कि जो बातें वेद के विधानों व विचारों के विपरीत हैं वह करणीय व आचरणीय नहीं होती। आचार्य जी एक अच्छे कवि भी हैं। उन्होंने अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत की। इस कविता की एक पंक्ति का भाव था ‘मैं समपिर्त हुआ प्रभु तुम्हें, मुझे अपनी कोई चिन्ता नहीं है।’ आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य को हर विषय में निश्चिन्त होना चाहिये। उन्होंने बताया कि निश्चिन्त व्यक्ति ही योग, ध्यान व ईश्वर चिन्तन व मनन आदि करने में स्थिर हो सकता है। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए आचार्य जी ने वेदों के महत्व को श्रोताओं को बताया और सभी आर्यसमाज के अनुयायियों को वेद व वैदिक ग्रन्थों का नित्यप्रति स्वाध्याय करने की प्रेरणा की। 

    कार्यक्रम का संचालन आर्यसमाज के युवा विद्वान एवं पूर्वमंत्री श्री नवीन भट्ट जी ने बहुत योग्यतापूर्वक किया। उन्होंने आज के विद्वतापूर्वक प्रवचन के लिये आचार्य सुनील शास्त्री जी को धन्यवाद किया। आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने सामूहिक शान्तिपाठ कराया। इसके बाद प्रसाद वितरण हुआ और सभी सदस्य वा श्रोता अपने निवास स्थानों को लौट गये। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121
 


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