रविवार दिनांक 10-5-2026 को आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के सत्संग में हम सम्मिलित हुए। सत्संग में प्रथम यज्ञशाला में सामूहिक यज्ञ सम्पन्न किया गया। यह यज्ञ आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी के पौरोहित्य में सम्पन्न हुआ। यज्ञ में आर्यसमाज के सदस्यगण एवं श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चे सम्मिलित हुए। यज्ञ के पश्चात सत्संग भवन में भजन, सामूहिक संन्ध्या एवं ऋषि दयानन्द के जीवन चरित्र से कुछ अंशों का पाठ किया गया। आज का व्याख्यान रोजड़-गुजरात से पधारे स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी का हुआ। स्वामी जी ने कर्म-फल सिद्धान्त को केन्द्र में रखकर कर्म-फल सिद्धान्त से जुड़े अनेकानेक प्रश्नों को प्रस्तुत कर उनके समाधान प्रस्तुत किए और बीच-बीच में आर्यसमाज के सदस्यों वा श्रोताओं को भी इस विषय में प्रश्न पूछते रहे। सदस्यगण हां या न अथवा स्वामी जी के प्रश्न पर हाथ उठाकर अपने मत को अभिव्यक्त करते रहे। स्वामी जी ने कहा कि जो न्याय पर आधारित हमारे सुख व दुःखों का आधार है वही हमारे कर्म-फल होते हैं। अपनी इस मान्यता के पक्ष में स्वामी जी ने अनेक तर्कों को प्रस्तुत किया। स्वामी जी ने कहा कि जो व्यक्ति अपने यहां किसी व्यक्ति को काम पर नियुक्त करता है उससे पूर्व उसे उसका वेतन तय करके बताता है। यदि वह पूरा वेतन देता है तो यह न्याय होता है, और यदि कम वेतन देता है तो यह न्याय नहीं होता। यदि व्यक्ति को पूरा वेतन नहीं दिया जायेगा तो वह शिकायत करेगा और ऐसा करना उस व्यक्ति से अन्याय करना होगा। स्वामी जी ने कहा कि जहां शिकायत होती है वहां न्याय नहीं होता। वह मनुष्य का कर्म-फल नहीं होता।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने कहा कि बिना कर्म को जाने ठीक-2 फल नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा कि न्यायालयों में न्यायाधीश मुकदमें को सुन कर निर्णय करते हैं तथा उसके अनुसार अपराधी को सजा देते हैं। स्वामी जी ने कहा कि यदि किसी मनुष्य के घर में चोरी हो जाये तो इस चोरी को उस मनुष्य के इस जन्म या पूर्वजन्म का कर्मफल नहीं माना जा सकता। इस बात को स्वामी जी ने अनेक तर्क व प्रमाण देकर विस्तार से श्रोताओं को समझाया। स्वामी जी ने समाज में प्रचलित उक्ति ‘दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम’ की चर्चा कर इसे असत्य व अप्रमाणिक बताया। स्वामी जी ने अनेक तर्क देकर इस बात को असत्य व अप्रमाणिक सिद्ध किया। स्वामी जी ने कहा कि वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार हम गोमांस, अन्य सभी पशुओं के मांस, अण्डे आदि सहित मदिरापान आदि के सेवन का विरोध करते हैं। इस आधार पर भी इस किंवदन्ति का खण्डन होता है। स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने कहा कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है। स्वामी जी ने श्रोताओं को स्वतन्त्रता का अर्थ समझाया और कहा कि मनुष्य अपनी इच्छा या अपनी बुद्धि से जिन कामों करता है वह उसके स्वतन्त्र कर्म होते हैं तथा जो मनुष्य दूसरे की इच्छा व बुद्धि से काम करता है वह परतन्त्र होता है।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने स्वतन्त्रता तथा स्वच्छन्दता के यथार्थ अर्थों पर भी प्रकाश डाला और इनके कुछ उदाहरण भी श्रोताओं को दिए। स्वामी जी ने कहा कि स्वछन्दता स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करना होता है। स्वामी जी ने ईश्वर के न्यायकारी स्वरूप की चर्चा की और इसके अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा मनुष्य के सभी गलत कर्मों का उसको यथासमय दण्ड देता है। उन्होंने कहा कि बुरे कर्म करने वाले मनुष्य अपने बुरे कर्मों का दण्ड रूपी कर्म भोगना नहीं चाहते, हमें दुःख न भोगने पड़े, इसलिये हमें अन्याय नहीं करना चाहिये। स्वामी जी ने पाप और अन्याय का कारण मनुष्य में स्वार्थ की प्रवृति से प्रेरित होकर किए कर्मों को करना तथा अविद्या को बताया। स्वामी जी ने कहा कि स्वार्थ एवं अविद्या यह दोनों चीजें मनुष्यों में होती हैं। उन्होंने कहा कि अन्याय और बुरे कर्म करने वाले मनुष्यों को परमात्मा मनुष्येतर पशु, पक्षी आदि अनेकानेक योनियों में उनके कर्मानुसार जन्म देता है और ऐसा करके बुरे कर्मों का भोग कराता है।
स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने मनुष्य योनि को अन्य सब योनियों से श्रेष्ठ और उत्तम बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के पास बुद्धि एवं दो हार्थों से युक्त जो मानव शरीर होता है, यह सुविधायें इतर पशु, पक्षियों आदि योनियों के प्राणियों को प्राप्त नहीं होती। स्वामी जी ने कहा कि हमें मनुष्य जन्म मिला है, इस मनुष्य जन्म को हमें यों ही नहीं खो देना चाहिये। इस जन्म का लाभ हमें अपनी बुद्धि का उपयोग करके करना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य व उसकी आत्मा का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है। उन्होंने यह भी कहा कि सब प्राणियों के जीवन में समस्यायें रहती हैं। जीवात्मा को मोक्ष प्राप्त होने पर उसके सभी दुःख व समस्यायें दूर हो जाती हैं। इसलिये सब मनुष्यों को मोक्ष प्राप्ति के लिए वैदिक मान्यताओं के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिये।
स्वामी जी ने पुनर्जन्म वा आवागमन के सिद्धान्त की चर्चा भी की। उन्होंने श्रोताओं के पुनर्जन्म से सम्बन्धित सभी शंकाओ व भ्रमों को अनेक प्रमाण देकर दूर किया। स्वामी जी ने कहा कि पिछले जन्म में हमने अच्छे कर्म किये थे, इसलिये हमें इस जन्म में मानव जन्म प्राप्त हुआ है। जिन मनुष्यों ने पिछले जन्म में अच्छे कर्म नहीं किये और बुरे कर्म अधिक किए थे वह लोग इस वर्तमान जन्म में पशु व पक्षी आदि निम्न योनियों में पैदा हुए हैं। इसी के साथ ही स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी ने अपने व्याख्यान को विराम दिया।
आर्यसमाज के प्रधान श्री सुधीर गुलाटी जी ने आज के इस सुन्दर एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान के लिये स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक जी का धन्यवाद किया। इसके बाद स्वामी जी ने श्रोताओं की निजी शंकाओं के समाधान किए। शंका करने वालों में श्री सतीश चन्द्र आर्य, श्री सुभाषचन्द्र गोयल जी एवं माता स्नेहलता खट्टर आदि सदस्यगण थे। स्वामी जी ने सभी की शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान किया। आर्यसमाज के प्रधान जी ने सदस्यों को बताया कि स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के सभी बच्चों के परीक्षा परिणाम आ गये हैं। आश्रम के सभी बच्चे अपनी अपनी कक्षाओं में उत्तीर्ण हुए हैं। भिन्न-भिन्न कक्षाओं में प्रथम श्रेणी में आये व उच्चतम अंकों को प्राप्त करने वाले बच्चों को नगद धनराशि देकर पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम के समापन से पूर्व आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने शान्ति पाठ कराया। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
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