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नक्षत्र और हर्बल वाटिकाए भारतीय परंपरा, ज्योतिष, आयुर्वेद और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत समन्वय

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11 May 26
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नक्षत्र और हर्बल वाटिकाए भारतीय परंपरा, ज्योतिष, आयुर्वेद और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत समन्वय

भारतीय संस्कृति में प्रकृति और मानव जीवन का संबंध अत्यंत गहरा माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह समझ लिया था कि ब्रह्माण्ड की प्रत्येक शक्ति का प्रभाव पृथ्वी और मानव जीवन पर पड़ता है। इसी कारण भारतीय ज्योतिष और आयुर्वेद में आकाशमण्डल के 27 नक्षत्रों तथा विभिन्न वृक्षों और औषधीय पौधों के बीच विशेष संबंध स्थापित किया गया है। यह संबंध केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भी जुड़ा हुआ है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा लगभग 27 दिनों में पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए 27 नक्षत्रों से होकर गुजरता है। प्रत्येक नक्षत्र का अपना स्वभाव, गुण, देवता और ऊर्जा क्षेत्र माना गया है। आयुर्वेद में माना गया कि इन नक्षत्रों की ऊर्जा कुछ विशेष वृक्षों और वनस्पतियों में अधिक प्रभावी रूप से विद्यमान रहती है। इसलिए प्रत्येक नक्षत्र को एक विशिष्ट पौधे या वृक्ष से जोड़ा गया।

भारतीय परम्परा में यह मान्यता है कि व्यक्ति के जन्म नक्षत्र से संबंधित वृक्ष उसके जीवन में सुख, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यदि व्यक्ति अपने नक्षत्र वृक्ष का रोपण करे, उसकी सेवा करे तथा नियमित रूप से उसके समीप समय बिताए, तो उसे मानसिक शांति और रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है। उदाहरण के रूप में अश्विनी नक्षत्र का संबंध कुचला वृक्ष से माना गया है। यह औषधीय दृष्टि से तंत्रिका तंत्र को सुदृढ़ करने में सहायक माना जाता है। भरणी नक्षत्र का वृक्ष आँवला है, जिसे आयुर्वेद में अमृत के समान माना गया है। आँवला विटामिन “सी” का प्रमुख स्रोत है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है। कृत्तिका नक्षत्र का संबंध गूलर से, रोहिणी का जामुन से तथा मृगशीर्ष का खैर वृक्ष से माना गया है।

इसी प्रकार पुष्य नक्षत्र का वृक्ष पीपल है। भारतीय संस्कृति में पीपल को अत्यंत पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह वृक्ष प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान करता है। मघा नक्षत्र का संबंध बरगद से माना जाता है, जो दीर्घायु, स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक है। स्वाति नक्षत्र का वृक्ष अर्जुन माना गया है, जिसकी छाल हृदय रोगों में अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। रेवती नक्षत्र का संबंध महुआ से है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आयुर्वेदिक औषधियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

आयुर्वेद में वृक्षों और पौधों को केवल औषधि नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा का स्रोत माना गया है। ऋषियों का विश्वास था कि वृक्षों में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को ग्रहण करने और उसे वातावरण में प्रसारित करने की क्षमता होती है। यही कारण है कि प्राचीन काल में आश्रम, मंदिर और यज्ञस्थलों के आसपास विशेष वृक्ष लगाए जाते थे।आज आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार कर रहा है कि वृक्षों के आसपास का वातावरण मानसिक तनाव को कम करता है तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। वृक्षों से प्राप्त औषधियाँ अनेक रोगों के उपचार में उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। इस प्रकार ज्योतिष और आयुर्वेद का यह प्राचीन ज्ञान आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

आज जब पर्यावरण प्रदूषण, मानसिक तनाव और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ रही हैं, तब भारतीय ज्योतिष और आयुर्वेद की यह परम्परा मानवता को प्रकृति के निकट लौटने का संदेश देती है। 27 नक्षत्रों और पौधों का यह संबंध भारतीय ज्ञान-विज्ञान की अद्भुत धरोहर है, जो हमें यह सिखाता है कि मानव और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है।

वर्तमान समय में “नक्षत्र वाटिका” की परम्परा पुनः लोकप्रिय हो रही है। देश के अनेक मंदिरों, उद्यानों और आयुर्वेदिक संस्थानों में 27 नक्षत्रों से जुड़े 27 वृक्षों का रोपण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक एवं वैदिक परम्परा का पालन करना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और औषधीय पौधों के महत्व को बढ़ावा देना भी है।

*राजस्थान विधानसभा में दो अनूठी वाटिकाएं‘*

राजस्थान विधानसभा में विधानसभाध्यक्ष डॉ. वासुदेव देवनानी के एक और नवाचार एवं अभिनव पहल पर विधानसभा परिसर में दो अनूठी वाटिकाएं‘ नक्षत्र वाटिका’ और ‘हर्बल वाटिका’ विकसित की गई है ।  इसका उद्घाटन हाल ही पांच राज्यों के विधानसभा अध्यक्षों  की मौजूदगी में विधानसभाध्यक्ष डॉ. देवनानी ने किया । राजस्थान विधानसभा के अमृत वर्ष में  राज्य को यह एक अनूठा उपहार है । राज्य विधानसभा में इस प्रकार की वाटिकाएं विकसित करने की यह पहल भारतीय परंपरा, ज्योतिष, आयुर्वेद और पर्यावरण संरक्षण के समन्वय का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई है। विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी के अनुसार  ‘नक्षत्र वाटिका‘ भारतीय ज्योतिष के 27 नक्षत्रों पर आधारित है, जहां प्रत्येक नक्षत्र से संबंधित एक विशेष वृक्ष लगाया गया है। यह वाटिका भारत के प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्रेम एवं आध्यात्मिक आस्था को प्रकट करती है। साथ ही प्रकृति और ब्रह्मांड के बीच संबंध को भी दर्शाती है। करीब पांच हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में अर्धचंद्राकार रूप में विकसित यह उद्यान पर्यावरण संरक्षण और भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का  एक अनूठा प्रयास है।

भारतीय ज्योतिष एवं आयुर्वेद के अनुसार आकाशमण्डल में 27 नक्षत्र माने गए हैं, जिनका संबंध विशिष्ट वृक्षों से है। इस वाटिका में अश्विनी नक्षत्र से सम्बंधित- कुचला का पोधारोपण किया गया है । इसी प्रकार भरणी नक्षत्र  के लिए आँवला, कृतिका नक्षत्र  के लिए गूलर, रोहिणी नक्षत्र  के लिए जामुन, मृगसिर नक्षत्र  के लिए खैर, आर्दा नक्षत्र  के लिए-शीशम, पुनर्वसु नक्षत्र  के लिए -बाँस, पुष्य नक्षत्र  के लिए -पीपल, आश्लेषा नक्षत्र  के लिए-नागकेसर, मघा नक्षत्र  के लिए -बरगद, पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र  के लिए -पलाश, उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र  के लिए -पाकड़, हस्त नक्षत्र  के लिए-जामली, चित्रा नक्षत्र  के लिए-बेल, स्वाती नक्षत्र  के लिए -अर्जुन, विशाखा नक्षत्र  के लिए-कटाई/शमल, अनुराधा नक्षत्र  के लिए-मौलश्री, ज्येष्ठा नक्षत्र  के लिए -घीड़/सेमल, मूल नक्षत्र  के लिए -साल, पूर्वाषाढा नक्षत्र  के लिए -अशोक, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र  के लिए कटहल, श्रवण नक्षत्र  के लिए- शमी/आक, धनिष्ठा नक्षत्र  के लिए -मदार, शतभिषा नक्षत्र  के लिए- कदंब, पूर्व भाद्रपद नक्षत्र  के लिए -आम, उत्तर भाद्रपद नक्षत्र  के लिए- नीम तथा रेवती नक्षत्र  के लिए  महुआ के प्रतिनिधि वृक्ष रोपित किए गए हैं। यह वाटिका प्रकृति और खगोल विज्ञान के अद्‌भुत संगम की जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है।

इसी प्रकार विधानसभा परिसर में विकसित ‘हर्बल वाटिका’ करीब 850 वर्ग मीटर क्षेत्र में बनाई गई है। इसमें विभिन्न 38 प्रकार के औषधीय पौधे लगाए गए हैं। यह वाटिका भारतीय आयुर्वेदिक ज्ञान को बढ़ावा देने के साथ ही लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा और औषधीय पौधों के महत्व के प्रति जागरूक करने वाली है । यहां मौजूद पौधे स्वास्थ्य लाभ, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और प्राकृतिक उपचार पद्धतियों को समझने में भी मददगार साबित है ।

‘हर्बल वाटिका’ में  जिन 38 प्रकार  की औषधीय प्रजातियों के पौधे रोपित किए गए हैं। उनमें इलायची, पोदीना, लेमनग्रास, घृतकुमारी (एलोवेरा), सदाबहार, तुलसी, सिट्रोनेला, पत्थर चट्टा, हडजोड, सफेद मूसली, इन्सुलिन, पीपली, समुद्र बेल. ब्राहमी, लाजवती एवं अपराजिता सहित अनेक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ के पौधे शामिल हैं। यह वाटिका औषधीय जान के प्रसार के साथ-साथ प्राकृतिक चिकित्सा प‌द्धति को भी प्रोत्साहित करती है।

विधानसभाध्यक्ष देवनानी ने बताया कि राजस्थान विधानसभा परिसर में विकसित की गई ‘नक्षत्र वाटिका’ और ‘हर्बल वाटिका’ ग्लोबल वार्मिग की वर्तमान परिस्थितियीं में पर्यावरण संरक्षण के साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने की भी एक अनूठी पहल है। यह दोनों वाटिकाएं न केवल हरियाली बढ़ाने का कार्य कर रही हैं, बल्कि भारत के प्राचीन ज्योतिष विज्ञान, आयुर्वेद और प्रकृति के गहरे संबंध को भी दर्शाती हैं। इनकी विशेषता यह है कि यहां परंपरा और आधुनिक सोच का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है। ‘नक्षत्र वाटिका’ और ‘हर्बल वाटिका’ विधानसभा परिसर की सुंदरता में चार चांद तो लगा ही रही हैं। साथ ही ये वाटिकाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति, विज्ञान और परंपरा के संगम का प्रेरणादायक आदर्श उदाहरण भी बन रही है । यह वाटिकाएं लोगों में पर्यावरण और पारंपरिक ज्ञान के प्रति जागरूकता पैदा करने का एक सशक्त माध्यम साबित होगी , इसमें कोई संदेह नहीं है।

इन वाटिकाओं  के शुभारम्भ अवसर के साक्षी मध्यप्रदेश विधानसभा  के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर , उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना, हिमाचल प्रदेश के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया, ओडिशा विधानसभा की अध्यक्ष सूरमा पाढ़ी और सिक्किम विधानसभा के अध्यक्ष मिंगमा नोबू शेरपा  के साथ ही राजस्थान के संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी बने।  पाँच राज्यों के ये विधानसभाध्यक्ष , लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ‌द्वारा देश के विधान मंडलों की समिति प्रणाली की समीक्षा के लिए गठित सात प्रदेशों के पीठासीन अधिकारियों की उच्च स्तरीय समिति  की द्वितीय बैठक में भाग लेने के लिए जयपुर आए थे ।


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