उदयपुर मीरा कन्या महाविद्यालय की पूर्व उपाचार्य प्रो. शांता भटट् द्वारा लिखित काव्य संग्रह पुस्तक अक्षरों का उल्लास का विमोचन रविवार को पूर्व संभागीय आयुक्त राजेन्द्र भटट्, राजस्थान विद्यापीठ विवि के कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत, पूर्व कुलपति प्रो. लोकेश भटट्, प्रो. मंजु चतुर्वेदी, डाॅ. प्रज्ञा भटट् ने किया। समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा सरस्वती की तस्वीर पर पुष्पांजली एवं दीप प्रज्जवलित कर किया।
प्रारंभ में प्रो. शांता भटट् ने अतिथियों का स्वागत करते हुए समारोह की जानकारी देते हुए काव्य संग्रह में संग्रहित कविताओं का पाठ किया।
कुलपति प्रो शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि डिजिटल युग में पुस्तक लेखन चुनौतीपूर्ण है मगर पुस्तक में कागज में सजीव विचार हैं जो हमारे मन और मस्तिष्क को संवारने का काम करते हैं। प्रो. सारंगदेवोत ने शेर पढ़ा कि कागज की ये महक, ये नशा, रूठने को है, किताबों से इश्क करने की शायद यह आखिरी सदी है। लेखिका ने अपनी पुस्तक में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश किया है। मन को आंखों से देख कर अनुभवों के प्रतिबिंबों के माध्यम से कविताओं पिराते हुए हम सबके सामने रखा है। आपने आडंबर नहीं, बल्कि भावों की शूचिता को ज्यादा महत्व दिया है। प्रो. डॉक्टर शांता भटृट की कृति केवल पुस्तक नहीं, बल्कि संवेदना, विचार और अनुभूति की साधना है। अक्षरों के उत्सव का अवसर है। आत्मबोध की साधना है, शब्दों का शोर नहीं, संवदेनाओं का मोहक संगीत है। अतर्मन की पुकार है, आत्मसंघर्ष से उपजा हुआ आत्मबोध है। करूणा,संवदेना और सत्य की अनुभूति पुस्तक के माध्यम से होती है। कविताओं के भाव पाठकों को बांधते नहीं, मुक्ति की ओर ले जाते हैं। प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि युवाओं को जीवन में पुस्तक को मित्र बनाना चाहिए। तकनीकी युग में युवा लाईब्रेरी में जाना भुल गये है। युवाओं की पुस्तक पढ़ने की प्रवत्ति प्रायः समाप्त हो गयी है वे अपना अधिकांश समय मोबाईल में निकाल देते है।
राजेंद्र भट्ट ने कहा कि प्रो. शांता भटृट की पुस्तक में हिन्दी काव्य से गहरा प्रेम झलकता है। विशाल ज्ञान और गहन चिंतन का समावेश है। पढ़कर मन आनंदित, पुलकित हो जाता है। कविताओं का संग्रह नहीं, भावों की यात्रा और गाथा है। इसमें जीवन के हर क्षेत्र को छुआ गया है। संस्कृत ज्ञान का पुट भी नजर आता है। पूरे काव्य संग्रह में हर तरह के भावोंकृअनुभवों का गुलदस्ता सजाया गया है। मन की लंबी यात्रा का सोपान है। शिव पंचामृत कविता में लेखिका के संस्कृत ज्ञान का पुट नजर आता है। थाम लो राधा को, जल में मीन प्यासी जैसी कविताएं मन को झंकृत करती हैं।
प्रो. मंजु चतुर्वेदी ने पुस्तक की समीक्षा करते हुए अपने विचार व्यक्त किए।
संचालन सह आचार्य डाॅ. प्रज्ञा भटट् ने किया।
समारेाह में प्रो. कनिका शर्मा, डाॅ. पारस जैन, डाॅ. शैलेन्द्र मेहता, हरीश आर्य, डाॅ. अर्चना शारदा, डाॅ. सुनिता सिंह, प्रो. मलय पानेरी, डाॅ. विवेक चपलोत, रूपल बाबेल, निजी सचिव कृष्णकांत कुमावत सहित शहर के साहित्यकारों ने शिरकत की।