उदयपुर | राजस्थान विद्यापीठ के शिक्षा संकाय लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय एवं सर्व विद्यालय केलवानी मंडल, काडी (गांधीनगर, गुजरात) के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को महाविद्यालय के सभागार में आयोजित एनवायरमेंटल अवेयरनेस फ्रॉम नॉलेज टू एक्शन पर्यावरणीय जागरूकता - ज्ञान से क्रिया तक विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ मुख्य वक्ता शिक्षाविद् एवं ‘वॉटर मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. राजेंद्र सिंह, कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत, यूनेस्को सीईओ डॉ. राम भुज, प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. वीणा पटेल, प्रो. रचना राठौड़, प्रो. बलिदान जैन ने मॉ सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पांजली एवं दीप प्रज्जवलित कर किया।
मुख्य वक्ता मैग्सेसे अवॉर्डी ‘जल पुरुष’ डॉ. राजेंद्र सिंह ने पर्यावरणीय संकट को भारतीय दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि भारत में प्रकृति से जुड़ा ज्ञान हमारे संस्कारों का हिस्सा रहा है, इसी कारण हम कभी वैश्विक शिक्षक रहे। उन्होंने “सनातन” को वैज्ञानिक अवधारणा बताते हुए प्रकृति, संस्कृति और व्यवहार के समन्वय को सतत विकास का आधार बताया। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण पर जोर देते हुए उन्होंने इसे सांस्कृतिक और संवैधानिक दायित्व बताया तथा अनुच्छेद 21, 48। और 51। के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी रेखांकित की।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि आज के समय में पर्यावरण संरक्षण मानव जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। उन्होंने कहा कि हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण को हमारी नहीं, बल्कि हमें पर्यावरण की जरूरत है। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी तो ही मानव जीवन सुरक्षित और समृद्ध रह सकेगा। प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बनाए रखना ही सतत विकास का मूल आधार है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन जैसी समस्याएं विश्व के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए केवल नीतियां बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना विकसित करें। शिक्षा के माध्यम से ही युवा पीढ़ी को यह समझाया जा सकता है कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखना उनके भविष्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है। प्रो. सारंगदेवोत ने आमजन से आह्वान किया कि वे अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण संरक्षण के छोटे-छोटे उपाय अपनाएं। जल की बचत, अधिक से अधिक वृक्षारोपण, प्लास्टिक के उपयोग में कमी तथा स्वच्छता बनाए रखना जैसे प्रयास पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
जागरूकता से एक्शन तक: पर्यावरण संरक्षण में शिक्षा और युवाओं की भूमिका अहम - - यूनेस्को सीईओ डॉ. राम भुज
विशिष्ट डॉ. रामभुज ने कहा कि पिछले 11 वर्ष इतिहास के सबसे गर्म रहे हैं, जो क्लाइमेट इमरजेंसी का संकेत है। उन्होंने जैव विविधता के ह्रास, कार्बन उत्सर्जन और प्लास्टिक प्रदूषण को गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने पेरिस समझौते के तहत त्वरित कार्रवाई, विशेषकर 2025 तक ठोस कदम उठाने पर जोर दिया। साथ ही अरावली संरक्षण में युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और शिक्षा, जागरूकता व एक्शन के समन्वय को समाधान का मार्ग बताया।
प्रारंभ में प्रो. सरोज गर्ग ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। समन्वयक प्रो. रचना राठौड़ ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि पहले दिन पर्यावरण शिक्षा और सामान्य जागरूकता, भारतीय प्राचीन तकनीकें और सतत विकास, उर्वरकों के विकल्प और नवीन तकनीकें जैव विविधता और संस्थाओं की भूमिका विषय पर तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। दो दिवसीय सेमीनार में देश विदेश के 150 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे है। चार प्रमुख विषयों पर्यावरण शिक्षा, भारतीय प्राचीन तकनीकें व सतत विकास, उर्वरकों के विकल्प, तथा जैव विविधताकृपर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।
इस अवसर पर अतिथियों द्वारा ‘लोकमान्य शिक्षक’ के भाषा, शिक्षा और संस्कृति विशेषांक का विमोचन किया गया।
संचालन डॉ. हरीश चौबीसा, डॉ. कुसुम ने किया जबकि आभार प्रो. बलिदान जैन ने जताया।
इस मौके पर प्रो. एमपी सिंह , प्रो. अमी राठौड़, प्रा.े सुनीता मुर्डि़या, प्रो. अलका सिंह, प्रो. बीएल श्रीमाली, डॉ. भाविक शाह, डॉ. शाहिद कुरैशी, डॉ. कैलाश चंद्र चौधरी, डॉ. कुसुम यादव, डॉ. फरजाना, डॉ. मनीषा सक्सेना, डॉ. पुनीत पंड्या, डॉ. जगदीश पटेल, डॉ. सरिता मेनारिया, डॉ. हरीश मेनारिया, डॉ. अमित दवे आदि की उपस्थिति रही।