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त्वरित टिप्पणी  : देश का पहला जौहर: चित्तौड़गढ़ में नहीं, रणथंभोर में हुआ था 

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05 Apr 26
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त्वरित टिप्पणी  :     देश का पहला जौहर: चित्तौड़गढ़ में नहीं, रणथंभोर में हुआ था 

राजस्थान का इतिहास वीरता, बलिदान और स्वाभिमान की अमिट गाथाओं से भरा हुआ है। इन्हीं गाथाओं में “जौहर” की परंपरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें युद्ध की हार निश्चित होने पर राजपूत महिलाएं अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अग्नि में कूदकर प्राण त्याग देती थीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि भारत का पहला जौहर मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी चित्तौड़गढ़ फोर्ट में हुआ था, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों की गहराई में जाएं तो संकेत मिलते हैं कि पहला जौहर संभवतः रणथंभोर फोर्ट में हुआ था। वहां न केवल अग्नि जौहर हुआ वरन जल जोहर भी हुआ।

इतिहासकारों के अनुसार, रणथंभौर के वीर शासक हम्मीर देव चौहान अपने अटल स्वाभिमान और “हमीर हठ” के लिए प्रसिद्ध थे। 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक दिन अलाउद्दीन खिलजी ने उनसे अपने शत्रु मंगोलों को सौंपने की मांग की, जो हम्मीर की शरण में आए थे। राजधर्म और शरणागत की रक्षा को सर्वोपरि मानते हुए हम्मीर ने साफ इनकार कर दिया।इस हठ से क्रोधित होकर खिलजी ने रणथंभौर पर आक्रमण कर दिया। किला घिर गया, पर हम्मीर ने आत्मसमर्पण नहीं किया। भीतर अन्न और जल की कमी होने लगी, फिर भी उन्होंने अपने वचन से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। अंततः युद्ध की अंतिम घड़ी आई—राजपूत वीरों ने केसरिया पहन रणभूमि में प्राण न्यौछावर कर दिए, और रानियों ने जौहर किया।

इस प्रकार “हमीर हठ” केवल जिद नहीं, बल्कि स्वाभिमान, वचन और धर्म के लिए अंतिम बलिदान की अमर गाथा बन गया।

 

दिल्ली सल्तनत के शक्तिशाली शासक अलाउद्दीन खिलजी ने जब रणथंभोर पर आक्रमण किया, तब वहां के शासक हम्मीर देव चौहान ने वीरतापूर्वक उसका मुकाबला किया। युद्ध लंबा चला, लेकिन अंततः परिस्थितियां ऐसी बनीं कि किले की रक्षा संभव नहीं रही। ऐसे में किले की रानियों और वीरांगनाओं ने जौहर का मार्ग चुना। इसे कई इतिहासकार राजस्थान का पहला जौहर मानते हैं।

इसके विपरीत, चित्तौड़गढ़ का पहला प्रसिद्ध जौहर 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के ही आक्रमण के दौरान हुआ, जो रानी पद्मिनी की कथा से जुड़ा हुआ है। हालांकि यह जौहर अधिक प्रसिद्ध और लोककथाओं में व्यापक रूप से वर्णित है, लेकिन कालक्रम के अनुसार रणथंभोर का जौहर इससे पहले माना जाता है। रणथंभोर का जौहर ऐतिहासिक दृष्टि से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय हुआ जब दिल्ली सल्तनत अपनी शक्ति का विस्तार कर रही थी और राजपूत राज्यों पर लगातार दबाव बना रही थी। हम्मीर देव चौहान का संघर्ष और वहां की महिलाओं का आत्मबलिदान राजपूत स्वाभिमान का प्रतीक बन गया।

इतिहास के कई स्रोत, जैसे प्राचीन ग्रंथ, स्थानीय किवदंतियां और कुछ फारसी इतिहासकारों के विवरण, इस बात की ओर संकेत करते हैं कि रणथंभोर में जौहर की घटना चित्तौड़ से पहले घटित हुई थी। हालांकि, इन स्रोतों में स्पष्टता और सर्वसम्मति का अभाव भी देखने को मिलता है, जिसके कारण यह विषय आज भी इतिहासकारों के बीच बहस का केंद्र बना हुआ है।चित्तौड़गढ़ के जौहरोंविशेषकर रानी पद्मिनी, रानी कर्मवती और अन्य वीरांगनाओं के बलिदानों—ने भारतीय जनमानस पर गहरी छाप छोड़ी है। यही कारण है कि चित्तौड़गढ़ को जौहर की परंपरा का प्रतीक स्थल माना जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य स्थानों पर हुए जौहर कम महत्वपूर्ण थे।

रणथंभोर का किला, जो आज भी अपनी भव्यता और ऐतिहासिक गौरव के लिए जाना जाता है, इस गाथा का मौन साक्षी है। यहां का जौहर इस बात का प्रमाण है कि राजस्थान की धरती पर स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा के लिए किस हद तक बलिदान दिए गए।

समकालीन इतिहासकारों का मानना है कि इस विषय पर और अधिक शोध की आवश्यकता है, ताकि स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया जा सके कि भारत का पहला जौहर कहां हुआ। फिर भी, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रणथंभोर का जौहर इस परंपरा की प्रारंभिक घटनाओं में से एक था।

अंततः, चाहे पहला जौहर रणथंभोर में हुआ हो या चित्तौड़गढ़ में, यह परंपरा भारतीय इतिहास के उस अध्याय को दर्शाती है, जहां सम्मान और स्वाभिमान के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया गया। यह गाथाएं आज भी हमें साहस, त्याग और आत्मसम्मान की प्रेरणा देती हैं।

उल्लेखनीय है कि रणथंभौर किला राजस्थान के सवाई माधोपुर में स्थित एक ऐतिहासिक दुर्ग है, जहाँ आज भी वीरता और स्वाभिमान का इतिहास जीवंत प्रतीत होता है। इसका निर्माण लगभग 10वीं शताब्दी में माना जाता है, यानी यह किला करीब 1000 वर्ष पुराना है। अरावली और विंध्य पर्वतमालाओं के संगम पर स्थित यह किला लगभग 7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है और समुद्र तल से करीब 700 फीट ऊँचाई पर स्थित है।

गाइड मनोहर लाल मीणा ने बताया कि

“रणथंभौर” नाम दो शब्दों से मिलकर बना है— “रण” (युद्ध) और “थंभ” (स्तंभ/पहाड़ी), अर्थात् युद्ध की पहाड़ी। माना जाता है कि यहाँ युद्धों की अधिकता और इसकी सामरिक स्थिति के कारण यह नाम पड़ा।

यह किला यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है और आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गाथा सुनाता है। इस ऐतिहासिक विरासत में रणक भंवर गणेश जी का त्रिनेत्र मन्दिर है जिसे चमत्कारी और जन आस्था का केन्द्र माना जाता हैं।


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