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महिला दिवस: एक आत्मचिंतन

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08 Mar 26
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महिला दिवस: एक आत्मचिंतन

अरे , आज फिर से महिला दिवस है… लेकिन मेरी आंखों में आंसू हैं, गुस्सा है, दर्द है! ये दिन क्या है? फूलों की माला, सेल्फी, हैशटैग, या वो चीख जो लाखों भारतीय माओं-बहनों की छाती से निकल रही है? सुनो, दिल से सुनो – क्योंकि ये सच इतना कड़वा है कि मुंह जल जाएगा!
नीला ड्रम! याद है वो खौफनाक कांड? मेरठ में मुस्कान रस्तोगी ने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर पति सौरभ को चाकू से गोदा, गला काटा, टुकड़े किए, नीले ड्रम में सीमेंट भरकर छिपा दिया! और अब जेल में वो बेटी को जन्म दे रही है, नाम रखा ‘राधा’! अरे, राधा? वो राधा जो कृष्ण की प्रेमिका थी, पवित्रता की मिसाल! और ये मुस्कान? ‘आजादी’ के नाम पर पति का खून बहाया, परिवार तोड़ा, बच्चे को जेल में पैदा किया! ये है क्या सशक्तिकरण?
ये तो नर्क है! ये तो दिल दहला देने वाली बर्बरता है! हमारी बेटियां ऐसी ‘फ्रीडम’ सीख रही हैं तो कल क्या होगा? हर घर में नीला ड्रम? क्या राधा का भविष्य तुमने ये करके तय कर दिया?
और ये सिर्फ एक केस नहीं! लखनऊ में बेटे ने पिता को गोली मारी, टुकड़े करके नीले ड्रम में ठूंस दिया! राजस्थान, लुधियाना – नीला ड्रम अब मौत का सिंबल बन गया!

क्यों? क्योंकि हम ‘मॉडर्न’ बनने के चक्कर में संस्कार भूल गए! ओपन रिलेशनशिप, लिव-इन, बियर पार्टी, ड्रग्स – सब ‘एम्पावरमेंट’ का नाम! लेकिन अंदर से क्या? अकेलापन, डिप्रेशन, सुसाइड!

इंडियन महिलाओं की सुसाइड रेट ग्लोबल एवरेज से दोगुनी है! 15-29 साल की लड़कियां सबसे ज्यादा सुसाइड करती हैं – दुनियाभर में! क्यों? क्योंकि हम वेस्टर्न ‘फ्रीडम’ की नकल कर रहे हैं, लेकिन वो अच्छी चीजें नहीं सीख रहे – फैमिली वैल्यूज, सपोर्ट, जिम्मेदारी! वहां अकेलापन मार डालता है, यहां हम खुद को मार रहे हैं!
मेरी मां! मेरी बहन! मेरी सहेली ! वो सच्ची सशक्त हैं! सुबह उठती हैं, चाय बनाती हैं, बच्चों को तैयार करती हैं, ताने सुनती हैं – “औरत होकर बाहर क्यों?” – लेकिन चुपचाप काम पर निकल जाती हैं! दिनभर पसीना बहाती हैं, शाम को घर लौटकर सब संभालती हैं। दहेज के नाम पर मार खाती हैं, घरेलू हिंसा सहती हैं, फिर भी अगले दिन खड़ी हो जाती हैं! डिप्रेशन आए तो चीखती हैं, रोती हैं, गुस्सा निकालती हैं – लेकिन फांसी नहीं लगातीं! दारू की बोतल नहीं थामतीं! परिवार को अकेला नहीं छोड़तीं! ये है असली ताकत! ये है भारतीय नारी का अदम्य बल!
और हमारी यंग जनरेशन? दारू पीकर बेहोश, टैक्सी में उल्टी, लिव-इन में उलझकर परिवार छोड़ देती हैं! जरा परेशानी हो तो “मर जाओ” – खुद को या रिश्तों को मार दो ! मां-बाप रोते रह जाते हैं, जिन्होंने रात-दिन एक कर दिए, सपने देखे, बलिदान दिए। एक रात की ‘पार्टी’ में सब तबाह! अरे, ये कैसी आजादी? ये तो खुद की कमजोरी की गुलामी है! नशे की, अहंकार की, अकेलेपन की!
महिला दिवस का असली मतलब है उन मिट्टी से बनी माओं को सलाम करना जो गांव में खेत जोतती हैं, शहर में बस में ठुंसी रहती हैं, फिर भी मुस्कुराती हैं। जो बेटे-बेटी में फर्क नहीं करतीं, संस्कार सिखाती हैं, लेकिन खुद कभी नहीं झुकतीं! सशक्तिकरण मतलब विद्रोह नहीं – मतलब जिम्मेदारी! मतलब इतनी मजबूत बनना कि दुनिया तोड़ने की कोशिश करे, लेकिन तुम टूटो मत – बल्कि और मजबूत हो जाओ, औरों को भी मजबूत बनाओ!

और सुसाइड?
मेरी रूह कांप जाती है NCRB के आंकड़ों को देखकर! भारत में महिलाओं की सुसाइड रेट ग्लोबल एवरेज से दोगुनी है! घरेलू हिंसा, दहेज, फैमिली प्रॉब्लम्स, इलनेस – सब वजहें! हाउसवाइव्स सबसे ज्यादा – 50% से ज्यादा महिला सुसाइड्स हाउसवाइव्स की! क्यों? क्योंकि वो चुपचाप सहती हैं, रोती हैं, लेकिन किसी से कह नहीं पातीं!
मेरी मां! वो सुबह 5 बजे उठती थीं, चाय बनाती थीं, हमें स्कूल भेजती थीं, फिर काम पर जाती थीं – ताने सुनती थीं, “औरत होकर बाहर क्यों?” लेकिन कभी नहीं रुकीं! शाम को घर लौटकर सब संभालती थीं, पापा की थकान मिटाती थीं, हमारी पढ़ाई करवाती थीं। दर्द होता था, रोती थीं रात में चुपके-चुपके, लेकिन सुबह फिर मुस्कुराती थीं! दारू नहीं पीती थीं, बेहोश नहीं होती थीं – बस सहती थीं, और हमें सहना सिखाती थीं! वो सच्ची सशक्त थीं! वो भारतीय नारी हैं – जो टॉर्चर सहकर भी अगले दिन खड़ी हो जाती हैं! बुरा लग रहा है या आत्मा जाग रही है?
तो आज रो लो थोड़ा। अपनी मां को गले लगाओ। बहन से कहो – “तू मजबूत है!” पत्नी से कहो – “तेरे बिना मैं अधूरा हूं!” और खुद से वादा करो – हम नकली ‘फ्रीडम’ नहीं, असली संस्कारों से सशक्त बनेंगे!
जब आप रेप करने वाले बेटे या पति को जब आप छोड़ देंगी, आश्रय नहीं देंगी। दारू पीकर पार्टी में नाचती बेटी को देखकर ख़ुश नहीं होंगी। अपने आप को सिर्फ़ कपड़ों से नहीं संस्कारों और विचारों से बदलेंगी। पास पड़ोस में डोमेस्टिक वायलेंस रोक पाएंगी। किसी के घर से आने वाली मार - पीट की आवाज़ सुनकर एक बार उसके दरवाज़े की घंटी बजाकर पूछ लेंगी की क्या सब ठीक है?
अपनी हेल्पर और मेड को कुछ अच्छी स्किल्स सिखा देंगी ताकि वो फिर पैसों की तंगी का सामना ना करे। तब होंगी आप असली सशक्त। फिर मनाना महिला दिवस।
अंग में उन लोगों के लिए जिन्हें सिर्फ ज़रूरत में माँ , पत्नी ,बहन, बेटी याद आती है। बिना ज़रूरत कभी पूछ लो उन्हें भी जिन्होंने कभी तुम्हें समय दिया था। जब सब लोग अपनी ज़िम्मेदारी सही तरीक़े से निभा लें तो महिला सशक्तिकरण का नारा ज़रूर देना।
(अब दिल में तूफान आ गया? आंसू आए? अगर हां, तो शेयर करो – क्योंकि ये दर्द अकेला नहीं सहा जाता। अगर नहीं, तो सोचो… क्यों?)


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